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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

About this granth

The Siddha Siddhanta Paddhati (सिद्धसिद्धान्तपद्धति) is a principal Sanskrit text of the Nath tradition, ascribed to Guru Gorakhnath (Goraksha). It sets out the philosophy of the Nath yogis in systematic form, centred on the idea that the body (pinda) and the cosmos are two forms of one reality, so that the yogi can realise the highest state within his own body.

It has six teachings (upadeshas): the origin of the body, tracing the unfolding of Shakti from the supreme state; reflection on the body; awareness of the holy places and deities within it; its supports, namely nine chakras, sixteen adharas, three lakshyas and five voids; the harmony of body and the supreme; and the marks of the avadhuta yogi.

This edition with Hindi translation is published by the Gorakhnath Temple, Gorakhpur. It opens with a picture of the perpetual flame in the temple's sanctum, believed to have been lit by Gorakhnath, followed by a verse in praise of Ganapati from the sixth teaching with its Hindi meaning. The translator is not named in the opening pages. It runs to 222 pages.

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अधौली बहुलीहवासनमथो घण्टावसन्नौलिका
ये कुर्वन्ति च कारयन्ति च सदा भ्राम्यन्ति खिद्यन्ति ते । ८६ ।
योगशास्त्र में निरूपित तथा आचार्यद्वारा निर्दिष्ट ज्ञान के बल से जो
पहले पृथ्‍वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की पाँच धारणाओं में आकाशधारणा,
पराकाशधारणा और महाकाश-धारणा तथा तत्वाकाश ( सम्पूर्ण पाँच तत्वों की )
धारणा पूरी कर ध्येय ( आत्मस्वरूप परम लक्ष्य ) में दृष्टि स्थिर करते हैं तथा
षट्कर्म—अधौली ( धौति ), वासन ( वस्ति ) नेति, नौलि, कपालभाति तथा
त्राटक आदि करते और दूसरों से भी इनका अभ्यास कराते हैं, वे भी सत्स्वरूप
निरुत्थान की प्राप्ति से वंचित रह कर भ्रमित और खिन्न रहते हैं ।। ८६ ।।
शङ्खक्षालनमन्तरं रसनया ताल्वोष्ठनासारसं
वान्तेरुल्लुठनं कपाटममरीपानं तथा खर्परी ।
वीर्यद्रावितमात्मजं पुनरहो ग्रासं प्रलेपश्च वा
ये कुर्वन्ति जडास्तु ते नहि फलं तेषां तु सिद्धान्तजम् । ८७ ।
शंखनाड़ी का शोधन कर रसना से तालु, ओष्ठ और नासारस को निकाल
कर इस तरह भीतर के समस्त चक्रों का शोधन करने के उपरान्त, कपाट मुद्रा-
भेदन के अभ्यास में तत्पर होकर खर्पर धारण कर अमरीपान करनेवाले तथा
उसका शरीर में लेप कर स्फूर्ति प्राप्त करनेवाले जड़बुद्धि भी इस तरह स्थित
रहकर सामरस्यरूप परमात्मपद की प्राप्ति से वंचित रहते हैं ।। ८७ ।।
घण्टाकोहलकालमार्दुलमहाभेरीनिनादं यदा
सम्यङ्नादमनाहतध्वनिमयं शृण्वन्ति चैतादृशम् ।
पिण्ड सर्वगतं निरन्तरतया ब्रह्माण्डमध्येऽपि वा
तेषां सिद्धपदं ततः समुचितं नैवं परं लभ्यते । ८८ ।
जो प्राणायाम की सिद्धि कर प्राण, बिन्दु और मन को ऊर्ध्वगामी कर
शिवशक्ति के साक्षात्कार के लिये उनका पारस्परिक लय सम्पादित कर व्यष्टि
पिण्ड और ब्रह्माण्ड में निरन्तर घण्टा, कोहल, कांस्य, ढोल, महाभेरी के अनाहत
१६६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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ध्वनिमय सरस, मृदुल निनादित नाद का श्रवण करते हैं, वे भी अखण्ड ज्योतिः-
स्वरूप परमात्म पद की प्राप्ति करने में असमर्थ होते हैं ।। ८७ ।।
वैराग्यात् तृणशाकपल्वलजलं कन्दं फलं मूलकं
भुक्त्वा यो वनवासमेवभजते चान्ये च देशान्तरे ।
बालोन्मत्तपिशाचमूकजडवच्चेष्टाश्च नानाविधाः
ये कुर्वन्ति पदं विना मतिबलं भ्रष्टा विमुह्यन्ति ते । ८६ ।
जो वैराग्य ग्रहण करने पर पत्ती के शाक, तृण, पल्वलजल ( जलाशय ) के
तथा कन्दमूल, फल का सेवन करते हैं, एकान्त में निवास करते हैं और अनेक
देश-देशान्तर में भ्रमण कर बालवत्, उन्मत्त, पिशाच, मूक, जड़वत् होकर अपनी
अनेक चेष्टाओं से लोगों को आश्चर्यचकित करते हैं, वे भी बिना आत्मज्ञान का
बल प्राप्त किये इस संसार में मोहित होते रहते हैं ।। ८६ ।।
कन्थादर्शनमद्भुतं बहुविधं भिक्षाटनं नाटकं
भस्मोद्धूलनमङ्गकर्कशतरं धृत्वा च वर्षं त्वरेत् ।
क्षेत्रं क्षेत्रमटन्ति दुर्गमतरे स्थित्वाऽथ सर्वेन्द्रियं
नो विन्दन्ति परं पदं गुरुमुखाद् गर्वेण कष्टाश्च ते । ६० ।
विचित्र ( रंगविरंगी ) गुदड़ी धारण कर भिक्षा माँगते हुए तथा विभूति
आदि से शरीर को उद्धूलित कर उसे कर्कश-शीत, धूप, वर्षा के आघातों को
सहने योग्य सिद्ध कर जो कितने ही वर्ष बिता देते हैं और इन्द्रियों को वश में
कर दुर्गम तीर्थक्षेत्रों और तपःस्थलियों में निवास करते हुए गुरु के शरणागत होकर
भी उनसे सद्ज्ञानोपदेश नहीं प्राप्त करते, अहंकारवश वे परमपद से वंचित होकर
कष्ट पाते हैं ।। ६० ।।
वाणीं ये च चतुर्विधां स्वरचितां सिद्धैश्च वा निर्मितां
गायत्रींचतुराश्च पाठनिरता विद्याविवादे रताः
नो विन्दन्ति तदर्थमात्मसदृशं खिद्यन्ति मोहाच्छलात्
दण्डैः कर्तरिशूलचक्रलगुडैर्भाण्डाश्च दुष्टाश्च ते । ६१ ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६७

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जो परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी वाणी में अनुभूतियुक्त हैं, अथवा सिद्ध
पुरुषों द्वारा अथवा अपने ही द्वारा रचित स्तोत्र, सिद्धान्त आदि में पारंगत हैं,
गायत्री मन्त्र के जप में तत्पर हैं, स्तोत्रादि का पाठ करते रहते हैं, शास्त्रार्थ में
तत्पर रहते हैं, वे भी यथार्थ अखण्ड आत्मज्ञान--व्यष्टिपिण्ड और ब्रह्माण्ड में
व्याप्त परमात्म स्वरूप को न जानकर खेद करते हैं तथा हाथ में दण्ड, कुल्हाड़ी,
त्रिशूल, चक्र और लाठी आदि धारण करते हैं और मिथ्या स्वाँग बना कर विदूषक
का आचरण करते हैं, वे भांड़ और दुष्ट हैं, क्योंकि यथार्थ अखण्ड स्वरूप में
उनका प्रवेश नहीं हो पाता है ॥ ६१ ॥
एवं शून्यादिशून्यं परमपरपदं पञ्चशून्यादिशून्यं
व्योमातीतं ह्यनाद्यं निजकुलमकुलं चाद्भुतं विश्वरूपम् ।
अव्यक्तं चान्तरालं निरुदयमपरं भासनिर्नाममैक्यं
वाङ्मात्राद् भासयन्तोबहुविधमनसोव्याकुलाभ्रामितास्ते । ६२।
( महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि शून्यवादी केवल वाणी मात्र से
शून्यवाद का प्रतिपादन कर और दूसरों के प्रति उसका कथन कर यथार्थ आत्म-
तत्व का स्पर्श तक नहीं कर सकते हैं । ) शून्यादि शून्य परमपर पद पञ्च-
शून्यादिशून्य है ( पाँच भूतों में पृथ्वी और जल में शून्य है, जल और तेज के
मध्य में शून्य है, तेज और वायु के मध्य में शून्य है, वायु और आकाश के मध्य
में शून्य है और आकाश शून्यरूप है ), व्योमातीत, अनादि, अकुल, कुल, अद्भुत,
विश्वरूप, अव्यक्त, अन्तर्व्याप्त, ( सब में व्याप्त ), सूक्ष्म, उत्पत्तिरहित, नामरूप
से रहित है--इस तरह वे केवल कथन करते रहते हैं और दूसरों को शून्यवाद
का उपदेश देते हैं, ऐसे लोग मन में व्याकुल और भ्रमित रहते हैं, क्योंकि वे
परमपद से वञ्चित रहते हैं ॥ ६२ ॥
आज्ञासिद्धिकरं सदा समुचितं सम्पूर्णभाभासकं
पिण्डे सर्वगतं विधानममलं सिद्धान्तसारं वरम् ।
भ्रान्तेर्निर्हरणं सुखातिसुखदं कालान्तकं शाश्वतं
तन्नित्यं कलनोज्झितं गुरुमयं ज्ञेय निरुत्थं पदम् । ६३।
१६८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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निरुत्थानरूप अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविवर्जित स्वसंवेद्य परमपद ही ज्ञेय
है। यह पद अन्योपदेश-निरपेक्ष अखण्डस्वरूप है, स्वानुभवैकगम्य है, अच्युत है,
ध्रुव है, समस्त प्रकाशों--सूर्य, चन्द्र आदि का प्रकाशक है, व्यष्टि-पिण्ड और
ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापक है, रागद्वेषरहित, निर्विकार, सत्सिद्धान्तस्वरूप है, संसाररूप
भ्रम का निवारक है, नित्यस्वरूप मोक्षानन्द प्रदान करनेवाला है, नित्य—अकाल,
महाकालरूप परमेश्वर है, शाश्वत है, सनातन है, संकल्पातीत है, परमात्मस्वरूप
गुरु द्वारा ज्ञेय है--गुरुज्ञानस्वरूप है। यह परमपद ही परमाश्रय है ॥ ६३ ॥
आदेश का स्वरूप
आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति विचारणे ।
त्रयाणामैक्यसंभूतिरादेश इति कीर्तितः । ६४ ।
आदेश इति सद्वाणीं सर्वद्वन्द्वक्षयापहाम् ।
यो योगिनं प्रति वदेत् स यात्यात्मानमैश्वरम् । ६५ ।
( जिसके प्रति 'आदेश' शब्द व्यवहृत होता है, उसकी 'आदेश' के उच्चारण
द्वारा ब्रह्मस्वरूपता का प्रतिपादन होता है ।) आत्मा, परमात्मा, और जीवात्मा
के सम्बन्ध में विचार करने पर ज्ञात होता है कि तीनों की एकता की सम्भूति--
उत्पत्ति ( अभिन्न सत्ता ) ही 'आदेश' के रूप में प्रसिद्ध है। 'आदेश' परमात्म
स्वरूप का प्रतिपादन करने वाली सद्वाणी है, इसके उच्चारण मात्र से जरा-
मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि समस्त प्रपंचात्मक द्वन्द्वों का क्षय--नाश हो
जाता है। जो प्राणी योगी के प्रति 'आदेश, आदेश' शब्द का व्यवहार करता है,
वह परमात्मा और आत्मा के अभिन्न स्वरूप को तत्वतः जान लेता
है ॥ ६४-६५ ॥
विशेष—अपने प्रापंचिक विचार में हम आत्मा, परमात्मा और जीवात्मा
में भेद करते हैं। तीनों की एकता ही सत्य है और इस सत्य का अनुभव या
दर्शन ही आदेश कहलाता है। 'आदेश' के उच्चारणपूर्वक अभिवादन से योगी
निरन्तर एक-दूसरे को जीवात्मा और परमात्मा के तादात्म्य का स्मरण
कराते हैं।
'आदेश' का क्या उपदेश है, इस सम्बन्ध में महायोगी गोरखनाथ ने अपने
गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के चरण में जिज्ञासा की तो गुरु ने कहा--
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६६

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'अवधू आदेस का अनूषम उपदेस'
( मच्छींद्र-गोरष-बोध-६ )
इसका तात्पर्य यह है कि आदेश सूक्ष्मातिसूक्ष्म परमात्मपद का प्रतिपादक
परम उपदेश है ।
'गोरखबानी' में 'रहरासि' नामक अत्यन्त लघु रचना में गोरखनाथजी
का कथन है :
'ॐ आदेस आदेस अलष अतीतं'
केन उपनिषद् में आदेश को परमात्मतत्व का सांकेतिक उपदेश स्वीकार
किया गया है :
'तस्यैष आदेशो यदेतद्'
( केन उ० ४ । ४ )
श्रीगोरखनाथजी ने जोधपुराधीश महाराज मानसिंह को आदेश का स्वप्न
में तत्त्वोपदेश दिया था--
नाथार्थोऽस्तु तवादेशो विदेशश्चास्तु वैरिणाम् ।
प्रदेशश्चास्तु भक्तानामुपदेशस्तु मे सदा ॥
नृसिंहोत्तरतापिनी-उपनिषद् में भी आदेश के सांकेतिक तत्वस्वरूप शान्त,
अद्वैत शिवस्वरूप का प्रतिपादन हुआ है ।
'अथ तस्यायमादेशी मात्रश्चतुर्थो व्यवहार्य प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वै त
ॐकार आत्मैवसंविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ।'
[ नृसिंहोत्तरतापिनी खण्ड २ ]
आशादहनं भसितं कुण्डलयुगलं विचारसन्तोषः ।
कौपीनं स्थिरचित्तं खर्परमाकाशमात्मनो भजनम् । ६६।
जिस योगी ने आशा-तृष्णा को जलाकर भस्मरूप कर दिया है, उसके अंग में
तृष्णादहनरूप भस्म ही विभूति-धारण है, उसके कान के दोनों कुण्डलरूप में
आत्मविचार और संतोष ही विशोभित हैं, स्थिरचित्त होना ही उसके द्वारा
१७० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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कौपीन धारण है, हृदयाकाश में स्वरूप-चिन्तन ही उसके द्वारा हाथ में खर्पर का
धारण है, आत्मा में अवस्थान—स्वरूपावस्थान ही उसके लिये भजन है, परमपद
का वेध है।
सिद्धसिद्धान्तरूप योगशास्त्र
एतच्छास्त्रं महादिव्यं रहस्यं पारमेश्वरम् ।
सिद्धान्तं सर्वसारस्य नानासङ्केतनिर्णयम् । ९७ ।
सिद्धानां प्रकटं सिद्धं सद्यः प्रत्ययकारकम् ।
आत्मानन्दकरं नित्यं सर्वसन्देहनाशनम् । ६८ ।
न देयं परशिष्येभ्यो नान्येषां सन्निधौ पठेत् ।
न स्नेहान्नबलाल्लोभान्नमोहान्नाताच्छलात् । ६६ ।
न मैत्रो भावनाद्दानान्नसौन्दर्यान्न चासनात् ।
पुत्रस्यापि न दातव्यं गुरुशिष्यक्रमं विना । १०० ।
सिद्धसिद्धान्तरूप यह सत्योगशास्त्र महादिव्य है, अपने-आप में निगूढ़ रहस्य
है, परमेश्वरस्वरूप है, समस्त तत्त्वों का एकमात्र सुनिश्चित सिद्धान्त है और
अनेक तत्सम्बन्धी संकेतों का निश्चयात्मक निर्णय है, सिद्धों द्वारा प्रत्यक्ष किया
गया महायोग ज्ञान है, स्वसंवेद्य पद — स्वरूपावस्थान में प्रतिष्ठित करनेवाला है,
स्वरूपानन्द प्रदान करता है, यह नित्य, सनातन ज्ञान है, समस्त सन्देहों—तत्त्व
के विषय में शंकाओं का उच्छेद करनेवाला है । इस योगशास्त्र का उपदेश उनको
नहीं देना चाहिये, जो अन्य मार्गी हैं, इसका ऐसे लोगों के समक्ष पाठ तक नहीं
करना चाहिये, जो दूसरे मत-मतान्तरों में भ्रमित हैं । किसी के प्रति अपार
स्नेह हो, उसे भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । कोई बलपूर्वक अथवा लोभ
दिखा कर अथवा मुग्ध कर अथवा छल प्रकट कर भी इसको ग्रहण करना चाहे,
उसके लिये भी यह निषिद्ध है । मैत्री-भावना के वश होकर, किसी के रूप-सौन्दर्य
या सत्कार से भी आकृष्ट होकर इसका उपदेश नहीं देना चाहिये । अपने प्रिय
पुत्र तक को भी इस योगज्ञान का उपदेश नहीं देना चाहिये, जब तक वह सिद्धमत
की विधि से गुरुमन्त्र ग्रहण कर उपदेश प्राप्त करने का पात्र नहीं बन
जाता है ॥ ६७—१०० ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७१

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सत्यवन्तो दयाचित्ता दृढभक्ताः सदाचलाः ।
निस्तरङ्गा महाशान्ताः सदा ज्ञानप्रबोधकाः । १०१ ।
भयदैन्यघृणालज्जातृष्णाशोकविवर्जिताः ।
आलस्यमदमात्सर्यदम्भमायाच्छलोज्झिताः । १०२ ।
अहंकारमहामोहरागद्वेषपराङ्मुखाः ।
क्रोधेच्छाकामुकासूयाभ्रान्तिलोभविवर्जिताः । १०३ ।
निःस्पृहा निर्मला धीराः सदाऽद्वैतपदेरताः ।
तेभ्यो देयं प्रयत्नेन धूर्त्तानां गोपयेत्सदा । १०४ ।
जो सत्स्वरूप आत्मज्ञान का आदर करनेवाले सत्यवादी हैं, दूसरों के दुःख से
द्रवित होनेवाले दयालु हैं, परमात्मा में श्रद्धा रखते हैं तथा अपने स्वरूप में अचल
( निष्ठा रखनेवाले ) हैं, जो इन्द्रियों और मन को वश में रखनेवाले शान्त और
ज्ञान की चर्चा में रत रहते हैं, जो भय, दीनता, घृणा, लज्जा, तृष्णा, शोक
आदि से रहित हैं, आलस्य, मद, मत्सर ( द्वेष ), दम्भ और दिखावट आदि से
दूर हैं, जो अहंकार, मोह, राग, द्वेष आदि से रहित हैं, जिनमें क्रोध, कामुकता,
परछिद्रान्वेषणवृत्ति ( दोष-दर्शन की प्रवृत्ति ), भ्रान्ति, लोभ आदि नहीं हैं,
जो निःस्पृह, निर्मल चित्त वाले और योगसाधन में निष्ठावान् हैं तथा अखण्ड
आत्मस्वरूप अद्वैतपद में स्थित हैं, उन्हीं को यह योगज्ञान प्रयत्नपूर्वक प्रदान करना
चाहिये । धूर्तों से इस ज्ञान को गुप्त रखना चाहिये ।। १०१--१०४ ।।
निन्दका ये दुराचाराश्चुम्बका गुरुतल्पगाः ।
नास्तिका ये शठाः क्रूरा विद्यावादरतास्तथा । १०५ ।
योगाचारपरिभ्रष्टाः ते निद्राकलहप्रियाः ।
स्वस्यकार्ये परानिष्ठा गुरुकार्येषु निःस्पृहाः । १०६ ।
एतान् विवर्जयेद् दूरे शिष्यत्वेनागतानपि । १०७ ।
सच्छास्त्रं सिद्धमार्गञ्च सिद्धसिद्धान्तपद्धतिः ।
न देयं सर्वदा तेभ्यो यदोच्छेच्चिरजीवनम् । १०८ ।
गोपनीयं प्रयत्नेन तस्करेभ्यो धनं यथा ।
१७२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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तेषां यो बोधयेन्मोहादपरीक्षितमन्दधीः । १०६ ।
नहि मुक्तिर्भवेत्तस्य सदा दुःखेन सीदतः ।
खेचरी भूचरी चैव शाकिनी च निशाचरी । ११० ।
एतासामद्भुतं शापः सिद्धानां भैरवस्य च ।
मस्तके तस्य पतति तस्माद् यत्नेन रक्षयेत् । १११ ।
जो योगमार्ग के निन्दक हैं, दुराचारी और कामुक हैं, गुरु के घर में निवास
कर उसकी पत्नी आदि में कामासक्त हैं, जो वेदशास्त्र और परलोक में अनास्था
रखनेवाले ( नास्तिक ) हैं, जो शठ, क्रूर और व्यर्थ वाद-विवाद में समय का
दुरुपयोग करते हैं, जो अपने स्वार्थ-साधन में ही व्यस्त रहते हैं और गुरु द्वारा
निर्दिष्ट कार्यों की अवहेलना करते हैं, यदि ऐसे लोग शिष्यत्व ग्रहण कर ज्ञानोपदेश
प्राप्त करने के लिये शरणागत हों, तो इनको अपने पास नहीं आने देना चाहिये,
दूर से ही ऐसे अश्रद्धालुओं का त्याग कर देना चाहिये । इनको सिद्धसिद्धान्त
प्रक्रियारूप सिद्धमार्ग और सच्छास्त्र नहीं प्रदान करना चाहिये । यदि दीर्घकाल
तक जीवित रहने की इच्छा हो तो इनसे सच्छास्त्र — सिद्धसिद्धान्त की उसी तरह
रक्षा करनी चाहिये, जिस तरह चोरों से धन की रक्षा की जाती है । जो इन
शिष्यों को मोहवश बिना परीक्षा लिये ( समझे ) ही मन्दबुद्धि गुरु-ज्ञान प्रदान
करता है, वह मुक्ति नहीं प्राप्त करता और सदा दुखी रहता है । खेचरी, भूचरी,
निशाचरी, शाकिनी आदि के शाप से ग्रस्त हो जाता है और सिद्ध है, तो भैरव
का शाप उसके मस्तक पर पड़ता ही है, इसलिये यत्नपूर्वक महायोगज्ञान की
रक्षा करनी चाहिये ॥ १०५—१११ ॥
गुरुपादाम्बुजस्थायपरीक्ष्य प्रवदेत्सदा ।
कुतो दुःखञ्च भोतिश्च तत्वज्ञस्य महात्मनः । ११२ ।
कृपयाैव प्रदातव्यं सम्प्रदायप्रवृत्तये ।
सम्प्रदायप्रवृत्तिर्हि सर्वेषां सम्मता यतः । ११३ ।
मायाशङ्करनाथाय सिद्धसिद्धान्तपद्धतिम् ।
लिखित्वा यः पठेत् भक्त्या स याति परमां गतिम् । ११४ ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७३

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विद्धात्वर्थनिचयं भक्तानुग्रहमूर्तिमत् ।
स्मरानन्दभरं चेतो गाणपत्यभिधं महः । । ११५ ।
गुरु के चरणकमल में प्रणत शिष्य की अच्छी तरह परीक्षा कर ( कि वह
ज्ञानोपदेश का सत्पात्र है ) उसे सिद्धसिद्धान्त—योगज्ञान प्रदान करना चाहिये,
तत्वज्ञ महात्मा को न तो दुःख होता है, न किसी से शापित होने का भय ही
रहता है । जो सिद्धमत में निष्ठा और आस्था रखता है, उसी को सत्सम्प्रदाय की
रक्षा के लिये कृपापूर्वक योगोपदेश प्रदान करना चाहिये । सम्प्रदाय की प्रवृत्ति—
रक्षा सर्वसम्मत है । जो शक्तिसहित शिव को प्रसन्न करने के लिये सिद्धसिद्धान्त
पद्धति की रचना लिख कर श्रद्धा और भक्ति से इसका पाठ करता है, वह परम
गति को प्राप्त करता है । भक्तों पर अनुग्रह करने वाले तथा स्मरण मात्र से ही
चित्त में आनन्द का अनुभव करनेवाले गणपति नामक मूर्तिमान् तेज इस शास्त्र के
अनुयायियों को चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ काम और मोक्ष से सम्पन्न
करे ।। ११२-११५ ।।
इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ षष्ठोपदेशः ॥
१७४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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नाथ निरंजन की आरती
नाथ निरंजन आरती साजै ।
गुर के सबदूं झालरि बाजै ॥ टेक ॥
अनहद नाद गगन में गाजै ।
परम जोति तहां आप विराजै ॥ १ ॥
दीपक जोति अखंडत बाती ।
परम जोति जगै दिन राती ॥ २ ॥
सकल भवन उजियारा होई ।
देव निरंजन और न कोई ॥ ३ ॥
अनत कला जाकै पार न पावै ।
संष मृदंग धुनि बेनि बजावै ॥ ४ ॥
स्वाति बूंद लै कलस बंदाऊँ ।
निरति सुरति ले पहुप चढ़ाऊँ ॥ ५ ॥
निज तत नांव अमूरति मूरति ।
सब देवां सिरि उदबुदि सूरति ॥ ६ ॥
आदिनाथ नाती मच्छेन्द्रनाथ पूता ।
आरती करै गोरष अवधूता ॥ ७ ॥
[ गोरखबानी पद—६२ ]

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