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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 209 of 222

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ध्वनिमय सरस, मृदुल निनादित नाद का श्रवण करते हैं, वे भी अखण्ड ज्योतिः-
स्वरूप परमात्म पद की प्राप्ति करने में असमर्थ होते हैं ।। ८७ ।।
वैराग्यात् तृणशाकपल्वलजलं कन्दं फलं मूलकं
भुक्त्वा यो वनवासमेवभजते चान्ये च देशान्तरे ।
बालोन्मत्तपिशाचमूकजडवच्चेष्टाश्च नानाविधाः
ये कुर्वन्ति पदं विना मतिबलं भ्रष्टा विमुह्यन्ति ते । ८६ ।
जो वैराग्य ग्रहण करने पर पत्ती के शाक, तृण, पल्वलजल ( जलाशय ) के
तथा कन्दमूल, फल का सेवन करते हैं, एकान्त में निवास करते हैं और अनेक
देश-देशान्तर में भ्रमण कर बालवत्, उन्मत्त, पिशाच, मूक, जड़वत् होकर अपनी
अनेक चेष्टाओं से लोगों को आश्चर्यचकित करते हैं, वे भी बिना आत्मज्ञान का
बल प्राप्त किये इस संसार में मोहित होते रहते हैं ।। ८६ ।।
कन्थादर्शनमद्भुतं बहुविधं भिक्षाटनं नाटकं
भस्मोद्धूलनमङ्गकर्कशतरं धृत्वा च वर्षं त्वरेत् ।
क्षेत्रं क्षेत्रमटन्ति दुर्गमतरे स्थित्वाऽथ सर्वेन्द्रियं
नो विन्दन्ति परं पदं गुरुमुखाद् गर्वेण कष्टाश्च ते । ६० ।
विचित्र ( रंगविरंगी ) गुदड़ी धारण कर भिक्षा माँगते हुए तथा विभूति
आदि से शरीर को उद्धूलित कर उसे कर्कश-शीत, धूप, वर्षा के आघातों को
सहने योग्य सिद्ध कर जो कितने ही वर्ष बिता देते हैं और इन्द्रियों को वश में
कर दुर्गम तीर्थक्षेत्रों और तपःस्थलियों में निवास करते हुए गुरु के शरणागत होकर
भी उनसे सद्ज्ञानोपदेश नहीं प्राप्त करते, अहंकारवश वे परमपद से वंचित होकर
कष्ट पाते हैं ।। ६० ।।
वाणीं ये च चतुर्विधां स्वरचितां सिद्धैश्च वा निर्मितां
गायत्रींचतुराश्च पाठनिरता विद्याविवादे रताः
नो विन्दन्ति तदर्थमात्मसदृशं खिद्यन्ति मोहाच्छलात्
दण्डैः कर्तरिशूलचक्रलगुडैर्भाण्डाश्च दुष्टाश्च ते । ६१ ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६७