Skip to content
SarvaKosh
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished222 pages

Page 207 of 222

Read in context
Page 207

उनके लिये भी अखण्ड ज्ञानस्वरूप निरुत्थान-पद की प्राप्ति कठिन है, क्योंकि वे
परमात्मध्यान की अवस्था में रह कर फिर प्रपञ्च-लोकव्यवहार में उतर
आते हैं ।। ८३ ।।
बन्धं भेदञ्च मुद्रां गलबिलचिबुकाबद्धमार्गेषु वह्नि
चन्द्रार्कासामरस्यं शमदमनियमानादबिन्दुं कलान्ते ।
ये नित्यं मेलयन्ते ह्यनुभवमनसाप्युन्मनीयोगयुक्तास्ते
लोकान्भ्रामयन्ते निजसुखविमुखाः कर्मदुःखाध्वभाजः । ८४ ।
मूलबन्धादि, षट्चक्रभेदन और मुद्रा के अभ्यास से ठोड़ी को वक्षःस्थल से
जालन्धरबन्धपूर्वक संयत कर कण्ठ-छिद्र के प्रतिरोध से समस्त नाड़ीमार्गों के रुक
जानेपर प्रज्वलित अग्नि तथा चन्द्र और सूर्य ( इडा-पिंगला में प्रवाहित अपान
और प्राण ) के सुषुम्णा में मेल से शमदमादिनियमोंके पालन और नादबिन्दु
कलाओं के अन्तस्वरूप सहस्रार में शिव-शक्ति के ऐक्यपूर्वक उन्मनी अवस्था की
सिद्धि करने पर भी जो योगी निजस्वरूप - परमपदरूप निरुत्थान के सुख से
विमुख होकर ज्ञानोपदेश द्वारा लोगों को भ्रमित करते हैं, वे स्वरूपबोध न होने
से नितान्त दुःखी रहते हैं ।। ८४ ।।
अष्टाङ्ग योगमार्गं कुलपुरुषमतं षण्मुखीचक्रभेदं
ऊर्ध्वाश्रो वायुमध्ये रविकिरणनिभं सर्वतोव्याप्तिसारम् ।
दृष्ट्या ये वीक्ष्यन्ते तरलजलसमं नीलवर्णं नभो वा
एवं ये भावयन्ते निगदितमतयस्तेऽपि हा कष्टभाजः । ८५ ।
जो यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिरूप अष्टांगयोग
का अभ्यास कर आचार्य-गुरुके द्वारा विधिपूर्वक उपदिष्ट मूलाधारचक्र, स्वाधिष्ठान,
मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा चक्र का भेदन कर प्राण-अपान वायु को
सुषुम्ना मार्ग से उर्ध्वमुख करते हुए सूर्य की प्रभा के समान अखण्ड ज्योति को
सम्पूर्ण रूप से नासाग्रदृष्टि स्थिर कर ध्यान में देखते हैं तथा नीले रंग वाले
आकाश का ध्यान करते हैं, ऐसे प्रसिद्ध योगसाधक भी निरुत्थानरूप परमपद की
प्राप्ति से वञ्चित रहकर दुःखी होते हैं ।। ८५ ।।
आदौ धारणशङ्खधारणमतः कृत्वा महाधारणाम्
सम्पूर्णं प्रतिधारणं विधिबलाद् दृष्टिस्तथा निर्मला ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति [ १६५