शिवदृष्टि (सोमानन्दनाथ - उत्पलदेवाचार्य वृत्ति सहित काश्मीर प्रत्यभिज्ञा मूल दर्शन सटीक)
Shivadrishti of Somanandanatha with Utpaladeva Vritti
by सोमानन्दनाथ (वृत्ति: उत्पलदेव)
प्रारंभिक पृष्ठ एवं सोमानन्दनाथ शैव परम्परा भूमिका
शिवदृष्टिः
आचार्यकृष्णानन्दसागरः
JACL-KRC
005333
5333
केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, जयपुर
पुस्तकालय
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Chaukhamba Sanskrit Pratishthan
38 U, A. Jawaharnagar, Bunglow Road
Delhi-110007
SV-2024
9.2 R .
इ 333
केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, जयपुर
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शिवदृष्टिः
SHIVADRISHTI
Shri Shivoham Sagar Granthmala's Eighth Puspa-
ॐ • सत्यं परं धीमहि •
SHRI SOMANANDAPADA'S
SHIVADRISHTI
with the VRITTI
by
Shri Utpaldevacharya
& with Notes
Shri Madhu Sudan Kaul
Published by
Sarvadarshnacharya
Shri Krishnanand Sagar
Edited with Introduction
Under Direction from
1008 Mahamandaleshwar
Shri Swami Akhandanand Sagar Maharaj
श्रीशिवोऽहंसागरग्रन्थमालाया अष्टमं पुष्पम्-
महामाहेश्वराचार्य-श्रीसोमानन्दपादविरचिता
शिवदृष्टिः
श्रीमदुत्पलदेवाचार्यकृतवृत्त्युपेता
श्रीमघुसूदनशास्त्रिकृतटिप्पणसमलङ्कृता च
अनन्तश्रीविभूषित १००८ महामण्डलेश्वर-
श्रीमदखण्डानन्दसागरमहाराजानां
निदेशेन
सर्वदर्शनाचार्यश्रीकृष्णानन्दसागरेण
भूमिकया सह सम्पाद्य
प्रकाशिता
Published by
PRTYABHIGYAN PRAKASHAN
for
Acharya Krishnanand Sagar
B. 37/48-A-1-2, Birdopur
VARANASI–221010
&
Shri Madhvanand Ashram
P. O.–Dharmaj : Distt –Kheda
GUJARAT.
All right riserved by the publisher
First Edition
1985
Price Rs. : 75/-
We Certified That The Price of
bookcharged according to Publisher's Price
For Chaukhambha Sanskrit Pratishthan
JACL-KRC 005333
Printed by
JYOTI PRESS
Madhyameshwar, Varanasi.
भूमिका
श्रीसोमानन्दप्रभुपाद द्वारा विरचित इस 'शिवदृष्टिः' नामक प्रस्तुत
ग्रन्थरत्न में सात आह्निक हैं और कुल ७२१ श्लोक अनुष्टुप् छन्द में
विद्यमान हैं।
प्रथम आह्निक में स्वात्मस्वरूप परमशिव के प्रति नमस्कार के
अनन्तर 'आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निर्वृतचिद्विभुः। अनिरुद्धेच्छाप्रसरः
प्रसरद्दृक्क्रियः शिवः' ।। १-२ ।।
एक ही श्लोक में सूत्ररूप से समस्त शास्त्रार्थ का सयुक्तिक
प्रतिपादन कर, परमशिवदशा से लेकर घट-पटादि पर्यन्त शिवरूपता की
स्थिति का उल्लेख किया गया है। परमशिवतत्त्व का स्वरूप, उसका
विश्वोत्तीर्णदशा में भी विश्वात्मक रूप से अवस्थान, शैवकारणवाद एवं
सृष्टिप्रक्रिया आदि का विवेचन किया गया है।
द्वितीय आह्निक में ईश्वर अद्वयवाद ही युक्तियुक्त अनुभवसिद्ध है।
वैयाकरणों के शब्दाद्वैत का स्वरूप कथन और उसका युक्तिपूर्वक निराकरण
किया है तथा इसमें विवर्तवाद का खण्डन किया गया है एवं भर्तृहरि को
पश्यन्ती को परा मानने का खण्डन है।
तृतीय आह्निक में भट्ट प्रद्युम्न द्वारा स्वीकृत शाक्तवाद,
शिवाद्वायवाद के प्रतिपक्षी द्वैतवादी शैव और पातञ्जल मत के अनुयायियों
के सहित इक्कीस मत-मतान्तरों का दोषोद्भावनपूर्वक खण्डन एवं अपने
शैव अद्वैत सिद्धान्त का युक्तिपूर्वक मण्डन किया है।
चतुर्थ आह्निक में अन्य दर्शनों की प्रत्यभिज्ञादर्शन के विषय में
संभावित शङ्काओं का निराकरण कर 'अथेदानीं प्रवक्तव्यं यथा सर्वं
शिवात्मकम्'। इत्यादि पद्यों से परमशिव की सर्वरूपता का विवेचन करते
हुए शैवसिद्धान्त के मूलभूत तत्त्व तथा शैव सर्वेश्वरवाद को दिखाया है
यह सारा विश्व प्रपञ्च का विस्तार शिव द्वारा ही आभासित होता है।
पञ्चम आह्निक में 'अथ चेत् सर्वभावानां न विना तत्त्वमेककम् ।
समन्वयोऽस्ति तदिदं कथमैक्यं विभेदितम्' ।। ५-१ ।। इत्यादि श्लोकों
द्वारा एक परमतत्त्व प्रमाता ही समस्त वेद्यवस्तुओं में 'सूत्रे मणिगणा इव'
अनुस्यूत है एवं सर्वेश्वरवाद का ही विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।
२
षष्ठ आह्निक में वेदान्त, पाञ्चरात्र, जैन, सांख्य, न्याय, वैशेषिक
और बौद्ध आदि दर्शनों की परसत्तासम्बन्धी सिद्धान्तों को अनुपयुक्तता
दिखायी है। इस प्रकार कुछ ज्ञात एवं कुछ अज्ञात कालकारणिक और
सद्धामवादी सम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए खण्डन किया है। इस प्रकार
शैव द्वैतवाद एवं द्वैताद्वैतवाद का खण्डन है।
सप्तम आह्निक में मोक्ष-साधक तान्त्रिक सिद्धान्त, साधन और
शैवयोग को दिखाते हुए सभी भाव-पदार्थों में व्याप्त परमशिवतत्त्व
की प्रतिपत्ति का रहस्य एवं उससे उपलब्ध होने वाली सर्वनिर्भरा
चिदानन्ददशा तथा पूर्ववर्त्ती शैवदर्शन के आचार्यों की वंश-परम्परा का
वर्णन है। जैसा कि इन्होंने कहा है—
'करोमि स्म प्रकरणं शिवदृष्ट्यभिधानकम्। (७-१२१)
इन्होंने जिन मौलिक सिद्धान्तों को प्रस्तुत ग्रन्थ में रत्नवत् गूँथे हैं, वे सब
शिवसमाविष्ट होकर ही किये हैं। इसका प्रणयन नवम शताब्दी के उत्तरार्ध
में हुआ है।
'शिवदृष्टिः' पर श्री उत्पलदेव कृत वृत्ति चतुर्थ आह्निक के ७४
श्लोक पर्यन्त ही उपलब्ध है। आगे की वृत्ति उपलब्ध न होने से प्रकाशित
नहीं की जाती है।
किन्तु वर्तमान प्रकाशित 'शिवदृष्टिः' में पूर्ववत् कश्मीर ग्रन्थावली
के प्रसिद्ध संपादक श्री मधुसूदन कौल शास्त्री की विशिष्ट टिप्पणियों का
भी समावेश किया गया है।
शिवसूत्र, स्पन्दकारिका आदि ग्रन्थों में शैवदर्शन का मौलिक
सिद्धान्त निरूपित किये गये हैं। श्री सोमानन्दप्रभुपाद ने प्रौढ दार्शनिक
स्वरूप देने के लिये प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का एक नूतन निर्माण किया है।
पूर्ववर्त्ती शास्त्रीय पक्षों का दोषोद्भावन के साथ खण्डन-मण्डन कर
शैवाद्वैत सिद्धान्त की दार्शनिक तर्कों द्वारा स्थापना 'शिवदृष्टिः' आदि
ग्रन्थों में देखी जाती है।
दुर्वासामुनि से लेकर श्रीसोमानन्दपाद पर्यन्त शैवदर्शन का
अध्ययन-अध्यापन कार्य मौखिक और वंशपरम्परागत ही सीमित रहा है।
किन्तु इन्होंने इस शैवागम दर्शन की धारा को एक नूतन दिशा में मोड़
दिया और वह नूतन धारा आज भी विश्व में प्रत्यभिज्ञादर्शन के रूप में
प्रवाहित होकर मुमुक्षुजनों को स्वरूपदर्शन कराती हुई आप्लावित
कर रही है। श्रीसोमानन्दपाद ने शैवदर्शन के मुख्य सिद्धान्तों को
दार्शनिक शैली में प्रतिपादन कर सर्वप्रथम 'शिवदृष्टिः' इस प्रस्तुत
ग्रन्थरत्न का सूत्रपात किया है।
साम्प्रदायिक जनश्रुति के अनुसार श्रीवसुगुप्तपाद श्रीसोमानन्दपाद
के गुरु थे। यह श्रीअभिनवगुप्तपाद ने क्रमकेलि की व्याख्या में
श्रीसोमानन्दपाद को श्रीगोविन्दराज का शिष्य दिखाया है। श्री-
गोविन्दराज को क्रमदर्शन का उपदेश उत्तरपीठाधीश्वर श्री शिवानन्दनाथ
की शिष्या पीठेश्वरी 'श्रीकेयूरवती' से प्राप्त हुआ है। श्रीअभिनवगुप्तपाद
क्रमदर्शन में श्रीगोविन्दराज के सब्रह्मचारी श्रीभानुक की शिष्या
पीठेश्वरी श्रीमदनिका की शिष्य परम्परा सन्तति में गिने जाते हैं।
यह सब वृत्तान्त तन्त्रालोक (४-१७३) की व्याख्या में जयरथ द्वारा
उद्धृत अभिनवगुप्तपाद विरचित क्रमकेलि व्याख्या के सन्दर्भ से अवगत
होता है।
श्री सोमानन्दपाद के प्रमुख शिष्य श्री उत्पलदेव थे। अपनी
तर्कपूर्ण शैली से मौलिक ग्रन्थों के निर्माण द्वारा इस दर्शन के साहित्य
संवर्धन प्रणाली को बृहत् रूप दिया है। इन्होंने शैवदर्शन पर स्वतन्त्र
रूप से ग्रन्थ लिखे और पूर्ववर्त्ती आचार्यों की मौलिक कृतियों पर वृत्तियाँ
लिखी हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ पर वृत्ति लिख कर प्रत्यभिज्ञादर्शन का व्यापक
विस्तार किया है। इसी शिवदृष्टिः के आधार पर ईश्वरप्रत्यभिज्ञा,
सिद्धित्रयी, शिवस्तोत्रावली आदि ग्रन्थों का निर्माण किया है और इन
पर व्याख्याएँ लिखी हैं। अत एव प्रत्यभिज्ञादर्शन की इस स्वतन्त्र
विचार शैली को आज भी महापुरुषों ने विच्छिन्न होने नहीं दिया है
और यह किसी भी उन्नतदेश के गौरव का कारण हो सकती है, इसलिये
प्रत्यभिज्ञादर्शन का साहित्य उच्चकोटि का है और महत्त्वपूर्ण है।
विजयादशमी
२०४२
कृष्णानन्द सागर
२
षष्ठ आह्निक में वेदान्त, पाञ्चरात्र, जैन, सांख्य, न्याय, वैशेषिक
और बौद्ध आदि दर्शनों की परसत्तासम्बन्धी सिद्धान्तों को अनुपयुक्तता
दिखायी है। इस प्रकार कुछ ज्ञात एवं कुछ अज्ञात कालकारणिक और
सद्भाववादी सम्प्रदायों का उल्लेख करते हुए खण्डन किया है। इस प्रकार
शैव द्वैतवाद एवं द्वैताद्वैतवाद का खण्डन है।
सप्तम आह्निक में मोक्ष-साधक तान्त्रिक सिद्धान्त, साधन और
शैवयोग को दिखाते हुए सभी भाव-पदार्थों में व्याप्त परमशिवतत्त्व
की प्रतिपत्ति का रहस्य एवं उससे उपलब्ध होने वाली सर्वनिर्भरा
चिदानन्ददशा तथा पूर्ववर्त्ती शैवदर्शन के आचार्यों की वंश-परम्परा का
वर्णन है। जैसा कि इन्होंने कहा है—
'करोमि स्म प्रकरणं शिवदृष्ट्यभिधानकम् । (७-१२१)
इन्होंने जिन मौलिक सिद्धान्तों को प्रस्तुत ग्रन्थ में रत्नवत् गूँथे हैं, वे सब
शिवसमाविष्ट होकर ही किये हैं। इसका प्रणयन नवम शताब्दी के उत्तरार्ध
में हुआ है।
'शिवदृष्टिः' पर श्री उत्पलदेव कृत वृत्ति चतुर्थ आह्निक के ७४
श्लोक पर्यन्त ही उपलब्ध है। आगे की वृत्ति उपलब्ध न होने से प्रकाशित
नहीं की जाती है।
किन्तु वर्तमान प्रकाशित 'शिवदृष्टिः' में पूर्ववत् कश्मीर ग्रन्थावली
के प्रसिद्ध संपादक श्री मधुसूदन कौल शास्त्री की विशिष्ट टिप्पणियों का
भी समावेश किया गया है।
शिवसूत्र, स्पन्दकारिका आदि ग्रन्थों में शैवदर्शन का मौलिक
सिद्धान्त निरूपित किये गये हैं। श्री सोमानन्दप्रभुपाद ने प्रौढ दार्शनिक
स्वरूप देने के लिये प्रत्यभिज्ञाशास्त्र का एक नूतन निर्माण किया है।
पूर्ववर्त्ती शास्त्रीय पक्षों का दोषोद्भावन के साथ खण्डन-मण्डन कर
शैवाद्वैत सिद्धान्त की दार्शनिक तर्कों द्वारा स्थापना 'शिवदृष्टिः' आदि
ग्रन्थों में देखी जाती है।
दुर्वासामुनि से लेकर श्रीसोमानन्दपाद पर्यन्त शैवदर्शन का
अध्ययन-अध्यापन कार्य मौखिक और वंशपरम्परागत ही सीमित रहा है।
किन्तु इन्होंने इस शैवागम दर्शन की धारा को एक नूतन दिशा में मोड़
दिया और वह नूतन धारा आज भी विश्व में प्रत्यभिज्ञादर्शन के रूप में
३
प्रवाहित होकर मुमुक्षुजनों को स्वरूपदर्शन कराती हुई आप्लावित
कर रही है। श्रीसोमानन्दपाद ने शैवदर्शन के मुख्य सिद्धान्तों को
दार्शनिक शैली में प्रतिपादन कर सर्वप्रथम 'शिवदृष्टिः' इस प्रस्तुत
ग्रन्थरत्न का सूत्रपात किया है।
साम्प्रदायिक जनश्रुति के अनुसार श्रीवसुगुप्तपाद श्रीसोमानन्दपाद
के गुरु थे। यह श्रीअभिनवगुप्तपाद ने क्रमकेलि की व्याख्या में
श्रीसोमानन्दपाद को श्रीगोविन्दराज का शिष्य दिखाया है। श्री-
गोविन्दराज को क्रमदर्शन का उपदेश उत्तरपीठाधीश्वर श्री शिवानन्दनाथ
की शिष्या पीठेश्वरी 'श्रीकेयूरवती' से प्राप्त हुआ है। श्रीअभिनवगुप्तपाद
क्रमदर्शन में श्रीगोविन्दराज के सब्रह्मचारी श्रीभानुक की शिष्या
पीठेश्वरी श्रीमदनिका की शिष्य परम्परा सन्तति में गिने जाते हैं।
यह सब वृत्तान्त तन्त्रालोक (४-१७३) की व्याख्या में जयरथ द्वारा
उद्धृत अभिनवगुप्तपाद विरचित क्रमकेलि व्याख्या के सन्दर्भ से अवगत
होता है।
श्री सोमानन्दपाद के प्रमुख शिष्य श्री उत्पलदेव थे। अपनी
तर्कपूर्ण शैली से मौलिक ग्रन्थों के निर्माण द्वारा इस दर्शन के साहित्य
संवर्धन प्रणाली को बृहत् रूप दिया है। इन्होंने शैवदर्शन पर स्वतन्त्र
रूप से ग्रन्थ लिखे और पूर्ववर्त्ती आचार्यों की मौलिक कृतियों पर वृत्तियाँ
लिखी हैं। प्रस्तुत ग्रन्थ पर वृत्ति लिख कर प्रत्यभिज्ञादर्शन का व्यापक
विस्तार किया है। इसी शिवदृष्टिः के आधार पर ईश्वरप्रत्यभिज्ञा,
सिद्धित्रयी, शिवस्तोत्रावली आदि ग्रन्थों का निर्माण किया है और इन
पर व्याख्याएँ लिखी हैं। अत एव प्रत्यभिज्ञादर्शन की इस स्वतन्त्र
विचार शैली को आज भी महापुरुषों ने विच्छिन्न होने नहीं दिया है
और यह किसी भी उन्नतदेश के गौरव का कारण हो सकती है, इसलिये
प्रत्यभिज्ञादर्शन का साहित्य उच्चकोटि का है और महत्त्वपूर्ण है।
विजयादशमी कृष्णानन्दसागर
२०४२
९
निर्देशिका
पृष्ठ संख्या
प्रथम आह्निक १
द्वितीय आह्निक २६
तृतीय आह्निक ७२
चतुर्थ आह्निक १०६
पञ्चम आह्निक १४०
षष्ठ आह्निक १४६
सप्तम आह्निक १५६
ॐ सच्चिदानन्दाय नमः
अथ
शिवदृष्टिः
श्रीमत्सोमानन्दविरचिता
श्रीमहामाहेश्वरोत्पलदेवाचार्यविरचितवृत्त्योपेता
प्रथमाह्निकम्
चिदाकाशमये स्वाङ्गे विश्वालेख्यविधायिने ।
सर्वार्द्भुतोद्भवभुवे नमो विषमचक्षुषे ॥ १ ॥
१ विषमचक्षुषे इति—यद्धि प्रमाणप्रमेयलक्षणं विश्वं तद्भेदाभासेन
मिथ्यैवेति नेत्रद्वितयेन द्योत्यते भगवता । परमार्थतस्तद्गतायामपि स्वात्म-
स्फुरत्तामात्ररूपत्वादस्य विश्वस्य न कापि भेदकलङ्कदोषकल्पनेति तृतीय-
नेत्रेण द्योत्यत इति । तच्च भगवत एवान्यस्य तु न भेदाधिष्ठातृत्वादिति ।
ततश्च तत्रैव नमस्कारो युक्तः, अन्यत्र तु किं फलमिति वाक्यार्थसमन्वय-
दीपिकायां निर्णीतमिति । तदेव समर्थयति 'स्वाङ्गे विश्वालेख्यविधायिने'
इति । स्वाङ्ग इति न तु व्यतिरिक्ते क्वचन । यदुक्तं पूर्वगुरुणा—
'निरुपादानसंभारमभित्तावेव तन्वते ।
जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाध्याय शूलिने ॥' ( स्त० चि० ५ )
इति । भगवता वीरेण व्यासेनापि—
'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥' ( भ० गी० १४।३ )
इति । कालिकाकारविश्वचित्रेणापि नास्य स्वरूपान्यथाभाव इत्याकाश-
साम्यं व्यतिरेकध्वनिश्च । निमित्तावेव चित्रविधानमिति महदाश्चर्यम् ।
२ शिवदृष्टिः [ आ०-१
विभ्रमाकरसंज्ञेन स्वपुत्रेणास्मि चोदितः ।
पद्मानन्दाभिधानेन तथा सब्रह्मचारिणा१ ॥ २ ॥
ईश्वरप्रत्यभिज्ञोक्तविस्तरे गुरुनिर्मिते ।
शिवदृष्टिप्रकरणे करोमि पदसंगतिम् ॥ ३ ॥
प्रकृतशास्त्रानुसारेणेष्टदेवतानमस्कारं२ करोति शास्त्रकारः--
अस्मद्रूपसमाविष्टः स्वात्मनात्मनिवारणे ।
शिवः करोतु निजया नमः शक्त्या ततात्मने ॥ १ ॥
योऽहं नमस्करोमि स शिवोऽस्मद्रूपेणैक्यं प्राप्तः । वस्तुस्थित्या हि
सर्वतत्त्वविग्रहो वक्ष्यमाणनीत्या शिवः । स३ संसारार्थं मायाशक्तिप्रकृतैक्या-
ख्यात्या भावानात्मस्थानाभासयति ईश्वरप्रत्यभिज्ञा प्रपञ्चितन्यायेन ।
ततस्तान्४ प्राणादीन् पुनः कांश्चिल्लोकयात्रासु५ अस्मद्रूपप्रमातृभेदेन
स्थापयिष्यन् भिन्नीकृतान्प्रमेयानपि घटपटादिवैलक्षण्येनात्मभेदेन पश्यन्
समाविशति इत्युच्यते । यावत्या च मात्रया समावेशस्तावन्मात्रसिद्धि-
संभवः । प्रथमस्तावत् कर्तृत्वानुसारी ज्ञानक्रियायोगः । यथोक्तं
स्पन्दशास्त्रे--
नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते ।
अपि त्वात्मबलस्पर्शात्पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ (१।८)
१ ‘एकब्रह्मव्रताचारा मिथः सब्रह्मचारिणः’ इति कोशः । २ प्रकृत-
शास्त्रं शैवाद्वयनयः । अयमत्र सूक्ष्मार्थः—शास्त्रादौ ‘श्रेयांसि बहुविघ्नानि’
इति नयेनावश्यं तदुत्पुंसनार्थं नमस्कारो विधेयः । येन प्रस्फुरत्तन्महौजसा
विघ्नाः कुण्ठशक्तयो न प्रभवन्ति । तत्र सर्वस्योर्पार्काशत्वेनासिद्धया
किं केन कस्य निरसनमित्याशयेनाह प्रकृतेत्यादि । तथा च विश्वात्मनो
विततरूपस्यानन्तशक्तेर्नमस्करणीयत्वम् । संकुचितसदाशिवादिज्ञानशक्ति-
स्वरूपपश्यन्तीधामासूत्रितस्वांतन्त्र्यहानिस्वातन्त्र्याबोधात्मकस्य पशोस्त-
त्कर्तृत्वं तस्यैव संकुचितस्यापि तद्गुणीकारस्वरूपेण विश्रमेण गृहीतस्पन्द-
स्वरूपशाक्तमहिम्नोऽपि करणत्वमिति । ३ स इति मायाशक्तिप्रकृतैक्याख्याति-
भाजनभूतास्मद्रूपप्रमातृभूमौ समाविष्टः । ४ ततं इति अनात्मस्थत्वे ।
५ प्रमेयभेदेनैव प्रमातृभेद इत्याशयं सूचयति लोकयात्रासु इत्यादिना ।
यात्रा—व्यवहारः ।
आ०-१ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता ३
इति। तथाप्यत्रोक्तम् 'ऐश्वरी प्रवृत्तिः' इति। अनयैव¹ दृष्ट्या तत्तद्दृढचर्य-
मधिकतरः समावेशोऽभ्यसनीयः स्वप्रयत्नेनापीत्येतदपि सूचितम्। समा-
विष्टश्च शिवोऽपीत्युच्यते देवदत्तादिरपि च उभयोरैक्यगमनाविशेषात्।
स तथाविधः शिवस्ततात्मने परापररूपभगवत्सदाशिवादिप्रसरणमुखेना-
नन्तविस्ताराय निजस्वरूपाय परमशिवसंज्ञाय नमस्करोतु। लोट् निमन्त्र-
णादौ² नमस्तेऽस्तु इतिवत्। वयं शिवात्मानः परमेश्वराय नमस्करवामे-
त्यर्थः। परत्वेन प्रथमपुरुषप्रयोगोऽकिंचिद्रूपत्वेन कृत्रिमाहंभावस्य कर्तृता-
मात्रं तत्त्वमिति दर्शनार्थः। सर्वं च शिवमियमिति नमस्कारे वाङ्मनसादि
करणमपि शिव एव। तदाह स्वात्मना इति। विघ्ना अपि तदात्मान एव
निवार्याः। तदाह आत्मनिवारणे इति। नमस्कारे चास्मदीयेच्छादिशक्तिः
शैव्येवेत्याह निजया शक्त्या इति। एतेन³ सर्वा एव क्रियाः सकारकाः
सफलाश्च गमनभोजनादिका एवमेवानुगन्तव्या इति दर्शितम्॥ १॥
इदानीं समस्तशास्त्रार्थं संक्षेपेण सयुक्तिकं⁴ प्रतिजानीते--
आत्मैव सर्वभावेषु स्फुरन्निवृत्तचिद्विभुः⁵।
अनिरुद्धेच्छाप्रसरः⁶ प्रसरद्दृक्क्रियः⁷ शिवः⁸॥ २॥
१ यथा भिन्नीकृतानपि प्राणादीन्प्रमेयानात्माभेदेन पश्यति तथैव
सर्वमपि व्याप्यमित्यर्थः।
२ नियोगकरणं निमन्त्रणमावश्यके प्रेरणेत्यर्थः। ततश्चाप्रवृत्तप्रैष
इति फलितोऽर्थः, तेन प्रेषणानवकाश एवेत्यर्थः। तदुक्तं हरिणा--
'अप्रवृत्तस्य हि प्रैषे पृच्छादेर्लोङ्विधीयते।
प्रवृत्तस्य यदा प्रैषस्तदा स विषयो णिचः॥'
इति। तेन करोत्वित्यत्रान्यप्रेरकत्वमिति न भ्रमितव्यम्।
३ एतेनेति--अयं श्लोको नमस्कारैकपरमार्थोऽपि प्रयुक्त इहो-
दाहरणीकृत एव मन्तव्य इत्याह गमनभोजनादिका इति। तेन अभ्यव-
हारगमनजल्पसंवेशनादिकं कारकभेदप्रथाभासकं फलेन च कार्यकारण-
भावाभासकं तत्सर्वं तस्यैव ततात्मनः स्फुरणमात्रमेव मन्तव्यमिति भावः।
४ अनुभवानुसारी तर्को युक्तिः।
५ स्वप्रकाश एव। ६ अहंप्रथात्मत्वेन स्वातन्त्र्यात्। ७ घटादीनां
यत्पार्यन्तिकं पारमार्थिकं रूपं, स एव।
८ अयमर्थः--सर्वभावानां य आत्मा वेद्यतारूपः स एव शिव इति
तं विना 'प्रागिवार्थोऽप्रकाशः स्यात्' इति नीत्या सर्वान्ध्यप्रसंगः। अत
४ शिवदृष्टिः [ आ०-१
सर्वभावेषु स्वात्मैव शिव इति व्यवहर्तव्यमिति प्रतिज्ञा¹। निर्वृत-
चिदित्यादिविशेषणकलापो हेतुः²। स्फुरन्निति धर्मिणो³ हेतोश्च⁴ स्वसंवे-
दनप्रत्यक्षं प्रमाणम्⁵। अत एव स्फुरन्निति पृथक्पदम्। निर्वृतचित्त्वाच्चैव⁶
च शिवत्वमित्यर्थाच्चिद्वलक्षणमपि दर्शितम्। तस्मिंश्च सिद्धे विषये, शिव-
त्वव्यवहारमात्रं तद्विषयं साध्यत ईश्वरप्रत्यभिज्ञोक्तक्रमेण। यथा च
चिन्निर्वृतीच्छाज्ञानक्रिया घटपटपर्यन्तसर्वभावेषु भासमानेषु स्फुरन्ति,
एव च न बाह्यं नाम किंचन परमार्थतो विद्यते। एवं चार्थस्य प्रकाशत्वे
प्रकाशोऽप्यर्थः अर्थोऽपि प्रकाश इति भावगर्भीकारेण व्यासमुनिना
गीतासूक्तं—
'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।' (६।३०)
इति। तथा—
'सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।' (६।२९)
इति च। वृत्तिकृता चान्यत्रोक्तम् 'अर्थानां प्रकाशात्मतया परमात्मत्वेन
विश्वरूपत्वात्'। अन्यत्रोक्तम् 'एकैकत्र च तत्त्वे षट्त्रिंशत्तत्त्वरूपता विद्यते'
इति। तथा वेदान्तिनोऽपि प्राहुः—
'प्रदेशोऽपि ब्रह्मणः सार्वरूप्यमनतिक्रान्तोऽविकल्प्यश्च।'
इति। अत एव च शरीरमेव च ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं शिवरूपतया पश्यन्ति
अर्चयन्ति, तेऽपि च सिद्ध्यन्ति घटादिकमपि वा तथाभिनिविश्य पश्यन्तीति
नास्त्यत्र विवादः।
१ परप्रतीतौ पञ्चावयवं वाक्यमुदाहरणीकरोति प्रतिज्ञेति, ससाध्यं
पक्षकथनं प्रतिज्ञा। २ लिङ्गवाचको हेतुः। ३ स्वात्मैव शिव इत्यस्य।
४ निर्वृतचिदित्यस्य। ५ अनुमानं हि प्रत्यक्षमूलम्। ६ निर्वृतिः
स्वप्रकाशस्वरूपविश्रान्तिरानन्दलक्षणा, तत्र नित्ययोगे मत्वर्थेऽच् प्रत्ययः।
तेन चितः समासकरणं वृत्तौ पदानामेकार्थीभावादत्यन्ता वियोगमेकार्थी-
भूततां च प्रकाशानन्दयोर्दर्शयद्विज्ञानानन्दरूपस्य भगवतो धर्मित्वं कथयति।
उक्तं चेश्वरप्रत्यभिज्ञायां—
'किंतु मोहवशात्तस्मिन्दृष्टेऽप्यनुपलक्षिते।
शक्त्याविष्करणेनेयं प्रत्यभिज्ञोपदर्श्यते॥' (१।१।३)
इति।
आ० - १ ] उत्पलदेवकृतवृत्त्योपेता ५
तथाग्रतो¹ वक्ष्यते । शक्ति²शक्तिमतोर्भेदाच्छक्तिमतश्चैक्यात्³ शक्तिपञ्चकं
परापरावस्था⁴ व्यवहर्तृप्रमात्रपेक्षयेतीश्वरप्रत्यभिज्ञोक्तनीत्या⁵ पुरस्ता-
द्द्रक्ष्यते । निर्वृता वेद्यनिराकांक्षा पूर्णा चिद्यस्य सः, तथा विभुरात्मसात्कृत-
समस्तवेद्यार्थः, अनिरुद्ध⁶ इच्छाप्रसरो यस्य, प्रसरन्त्यौ दृग्ज्ञानं⁷ क्रिया च
यस्य स तथालक्षणः शिवः सर्वेष्वात्मैव ॥ २ ॥
एवं सर्वं शिवरूपमिति स्वसंवेदनसिद्धे व्यवहारमात्रं साध्यमिति
स्थिते वाद्यन्तरविमतिं⁸ निराकरिष्यन् परदशातः प्रभृति घटपटादिस्थिति-
पर्यन्तमेवंरूपशिवतावस्थितिसादृश्यप्रतिपादनं प्रस्तौति—
स यदास्ते चिदाह्लादमात्रानुभवतल्लयः ।
तदिच्छा तावती तावज्ज्ञानं तावत्क्रिया हि सा ॥ ३ ॥
सुसूक्ष्मशक्तित्रितयसामरस्येन वर्तते ।
चिद्रूपाह्लादपरमो निर्विभागः परस्तदा ॥ ४ ॥
शिवैक्याख्यातिरूपभ्रान्तिमयसंसारावस्था यावन्नोन्मिषति, तावदपि
तावत्येवोक्तरूपशिवता९ । तथाच शक्तिपञ्चकमपि तदानीमेकरूपमपि व्यव-
हारापेक्षया कार्यसंभवादस्त्येव१० । तथा¹¹ हि परापरावस्थायां योऽहमिति
सहजप्रत्यवमर्शात्मा प्रकाशः, स एव परानपेक्षः पूर्णत्वादानन्दरूपो निर्वृत-
चिन्मयः स्थित एव । सैव स्वतन्त्रा मुख्या शिवता । तदुक्तं चिदाह्लादेति ।
पूर्णचिदानन्दमात्रेऽनुभवः प्रकाशनं नतु बाह्ये, तत¹² एव तत्रैव लयो यस्य
१ 'घटादिग्रह' इत्यादौ । २ अत्र शक्तिपञ्चकेनैव भेदमाशङ्क्याह ।
३ तस्य स्वात्मन्यपि भेदमाशङ्क्याह । ४ सदाशिवत्वमुद्रेकादित्यादौ ।
५ ऐक्ये सिद्धे पूर्णत्वस्य बलादेव लाभ इति व्यतिरिक्ताकांक्षावैकल्यात्—
प्रकाशस्यात्मविश्रान्तिरहंभावो हि कीर्तितः ।
उक्ता च सैव विश्रान्तिः सर्वापेक्षानिरोधतः ॥
स्वातन्त्र्यमथ कर्तृत्वं मुख्यमीश्वरतापि च ।' (अ. प्र. सि. २३ का.)
इति परमानन्दस्वभाव इत्यर्थः ।
६ यतः सर्वभावेषु आत्मा अहमिति स्वतन्त्रस्तत एव । ७ प्रकाशो
विमर्शश्च ।
८ वेदान्तानां भिन्नवेद्यवादिनां च । ९ कथितव्याप्तिका । १०
कार्येण कारणानुमानम् । ११ तत्रादौ परापरावस्थायाः चिदानन्दतां समर्थ-
यति । १२ चिदानन्दमात्रव्यतिरिक्तस्य भिन्नज्ञानवदभावात्तत एव प्रकाश-
स्तत्रैव लयश्च ।
६ शिवदृष्टिः [ आ०-१
स तथा। अनेन निवृत्तचित्कथिता। इच्छाज्ञानक्रियास्तु भिन्नविषयाद्य-
पेक्षया¹ स्फुटीभवन्ति। परावस्थायां पुनः पूर्णोऽहमित्येव स्वस्वभावः
प्रकाशते, तावत्प्रकाशत्वात् तदेव ज्ञानं, संरम्भरूपत्वात्² सैव क्रिया, तत्स्व-
भावत्वेन तदभ्युपगमादिच्छापि स्थितैवेत्याह तदिच्छा तावतीति। तावच्च
स्वरूपं क्रियेति योज्यम्। अथवा तावज्ज्ञानमिति तावच्छब्दः³ क्रियायां
स्त्रीलिङ्गः परिणमनीयः। द्वितीयस्त्वन्ते तावच्छब्दः क्रमार्थः परापरा⁴-
द्यवस्थापेक्षः। अत एव भिन्नविषयाभावेऽपि अभ्युपगमप्रकाशसंरम्भाणां
सर्वदा प्रकाशमयत्वेनाविचलनादिच्छादिव्यवहारयोग्यतैवेत्युक्तं⁵
सुसूक्ष्मेति⁶। सुसूक्ष्मत्वमेषितव्याद्यभावेन विभागापरिकल्पनात्। अत एव
शक्तिसामरस्यं पूर्णचिन्मात्रप्रकाशनात्मकत्वात् चिद्रूपाह्लादपरत्वं चोक्तम्।
सैव च निर्विभागता परावस्था यदैवमास्ते परस्तदेत्युक्ता ॥ ३-४ ॥
अन्यदशायामपि⁷ सा तथाभूतज्ञेयादिशून्यशुद्धपरशिवावस्थास्ती-
त्याह—
न⁸ परं तदवस्थायां व्यवस्थैषा व्यवस्थिता।
यावत्समग्रज्ञानाग्रज्ञातृस्पर्शदशास्वपि । ५ ।।
स्थितैव लक्ष्यते सा च तद्विश्रान्त्या तथा फले।
१ तेन न भिन्नविषयाप्रविभागदशायां व्यभिचार इति भावः।
अनेन संविदानन्दात्मनः सर्वत्रैकरूपत्वेनानपायित्वेन धर्मिरूपेण शक्तिमदा-
त्मनावस्थितस्य भगवतः स्वातन्त्र्योद्रेकबलेनोन्मेष्यमाणानां चेच्छादीनां
शक्तित्वं द्योतितम्। २. स्वात्मोच्छलता।
३ तावती क्रियेत्यर्थः। ४ परावस्थायां क्रमाभावात्। अभ्युपगम
इच्छा। प्रकाशो ज्ञानम्। संरम्भः क्रिया। ५ अव्यभिचारात्। ६ सुसूक्ष्मेति
सूक्ष्मतयैवात्र स्थूलदर्शिनां विशुद्धबोधात्मवादिनां विकल्पपक्षीकृतविमर्शानां
भ्रान्तिरित्यर्थः। ७ घटपटादिरूपभेदप्रथारूपायाम्। ८ ननु पूर्वम् ‘आत्मैव
सर्वभावेषु’ इत्यनेन सर्वपदार्थानामात्माकार एव वेद्यतारख्योऽस्ति
शिव इति स्थापितं तदेव समर्थनीयं, कृतमनयोक्त्या ‘स यदास्ते’ इत्या-
दिकया' यतः प्रकृतमपहायान्यद् ब्रुवत उन्मत्तभाषणमिति प्रकृतविघाताख्यं
दोषमाशङ्क्याह न परमिति। तत्रादौ शक्तिमत्स्वरूपमेव व्यवस्थापितं,
तस्मिंश्च सिद्धे मूलकारणेऽन्यद्वर्ण्यमानं निर्भित्तिचित्रन्यायेनान्यथा घटमानं
सेत्स्यतीति भावः।