शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
२. त्रिगुणातीत शिव एवं विश्व-सृष्टि (श्लोक ११-२०)
भाषा-टीका-सहितम् १३
नर मुण्डों की माला पहिनना आदि वीभत्स कर्मों से यद्यपि आपका
चरित अमंगल मय लगता है, तथापि स्मरण करने वालों को हे
वरद ! आप परम मंगलरूप हैं ॥ २४ ॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः ।
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमदसलिलोत्संगितदृशः ॥
यदालोक्याह्लादं हृद इव निमज्ज्यामृतमये ।
यधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥२५॥
हे वरद ! जिस प्रकार अमृतमय सरोवर में अवगाहन [से (स्नान
करने से] प्राणिमात्र तापत्रय से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियों
से पृथक् करके मन का स्थिर कर, विधि पूर्वक प्राणायाम से, पुलकित
तथा आनन्दाश्रु से युक्त योगीजन ज्ञानदृष्टि से जिसे देखकर परमा-
नन्द का अनुभव करते हैं, वह आपही हैं ॥ २५ ॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वंहुतवह-
स्त्वमापस्त्वं व्योमतवमुधरणिरात्मा त्वमिति च ॥
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतिगिरम् ।
न विद्मस्तत्तत्त्वंवयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥२६॥
हे वरद, आपके विषय में ज्ञानीजनों की यह धारणा है "क्षिति
हुत वह क्षेत्रज्ञाम्भः प्रभंजन चन्द्रमस्तपनवियदित्यष्टो मूर्तिर्नमोभव-
१४ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
बिभ्रते ।” इस श्रुति के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल,
आकाश, पृथिवी और आत्मा भी आपही हैं, किन्तु मेरे विचार से ऐसा
कोई स्थान नहीं है, जहाँ आप न हों ॥ २६ ॥
त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रिभुवनमथोत्रीनपिसुरा ।
नकाराद्यै वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः ॥
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः ।
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ।२७।
हे शरणद ! व्यस्त [अ, उ, म, ] 'ॐ' पद, शक्ति द्वारा तीन वेद
[ऋग्, यजुः और साम], तीन वृत्ति [जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति], त्रिभुवन
[भूर्भुवः स्वः] तथा तीनों देव [ब्रह्मा, विष्णु, महेश], इन प्रपञ्चों से
व्यस्त आपका बोधक है और समस्त 'ॐ' पद, समुदाय शक्ति से सर्व
विकार रहित अवस्थात्रयसे विलक्षण अखण्ड, चैतन्य आपको सूक्ष्म
ध्वनि से व्यस्त करता है ॥ २७ ॥
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोद्य्रः सह महां-
स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ॥
अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देवः श्रुतिरपि ।
प्रियायास्मैधाम्नेप्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥२८॥
हे देव ! भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव, भीम और ईशान-
यह जो आपके नाम का अष्टक है, इस प्रत्येक नाम में वेद और
भाषा-टीका-सहितम् १५
देवतागण [ब्रह्मा] आदि विहार करते हैं, इसलिये ऐसे प्रियधाम
[आश्रय भूत] आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ २८ ॥
नमोनेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो ।
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ॥
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो ।
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः ॥२६॥
हे प्रियदव ! [निर्जन वन-विहरण शील], नेदिष्ठ [अत्यन्त समीप]
दविष्ठ [अत्यन्त दूर], क्षोदिष्ठ [अति सूक्ष्म], महिष्ठ [महान्], वर्षिष्ठ
[अत्यन्त वृद्ध], यविष्ठ [अतियुवा], सर्वस्वरूप और अनिर्वचनीय
आपको नमस्कार है ॥ २६ ॥
बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः ।
प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नमः ॥
जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौमृडाय नमो नमः ।
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥
हे शिवजी ! जगत् की उत्पत्ति के लिये परम रजोगुण धारण
किये भव [ब्रह्मा] रूप आपको बार-बार नमस्कार है और उस जगत्
के संहार करने में तमोगुण को धारण करने वाले हर [रुद्र], आपके
लिए पुनः-पुनः नमस्कार है, जगत् के सुख के लिए सत्त्व गुण का
१६ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
धारण करने वाले मृड (विष्णु), आपको बार-वार नमस्कार है ।
तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से परे जो अनिर्वचनीय पद से विशिष्ट
हैं, ऐसे आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ३० ॥
कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्यं क्व चेदम् ।
क्व च तव गुणसीमोल्लङ्घिनीशश्वदृद्धिः ॥
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधा-
द्वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥३१॥
हे वरद ! कहाँ तो रागद्वेष आदि से कलुषित तथा तुच्छ मेरा
मन, कहाँ आपकी अपरमित विभूति, तिसपर भी आपकी भक्ति ने
मुझे निर्भय बनाकर इस वाक्रूपी पुष्पाञ्जलि को आपके चरण-
कमलों में समर्पण करने के लिये वाध्य किया है ॥ ३१ ॥
असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे ।
सुरतरुवरशाखा लेखनीपत्रमुर्वी ॥
लिखत यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालम् ।
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ॥३२॥
हे ईश ! असित अर्थात् काले पर्वत के समान कज्जल (स्याही)
समुद्र के पात्र में हो, सुरवर (कल्पवृक्ष) के शाखा की उत्तम लेखनी हो
और पृथ्वी कागज हो, इन साधनों को लेकर स्वयं शारदा यदि सर्वदा
ही लिखती रहें तथापि वे आपके गुणों का पार नहीं पा सकतीं, तो मैं
कौन हूँ ॥ ३२ ॥
भाषा-टीका-सहितम् १७
असुरसुरमुनीन्द्रै र्चितस्येन्दुमौले-
र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गु णस्येश्वरस्य ।
सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥
असुर, सुर और मुनियों से पूजित तथा विख्यात महिमा वाले
ऐसे ईश्वर चन्द्रमौलि के इस स्तोत्र को अलघुवृत्त अर्थात् बड़े [शिख-
रिणी] वृत्त में सकल गुण श्रेष्ठ पुष्पदंत नामक गन्धर्व ने बनाया
॥ ३३ ॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्-
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः ।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४
शुद्धचित्त होकर अनवद्य महादेवजी के इस स्तोत्र को जो पुरुष
प्रतिदिन परम भक्ति से पढ़ता है, वह इस लोक में धन-धान्य, आयु
से युक्त, पुत्रवान् और कीर्तिमान होता है और अन्त में शिव-लोक में
जाकर शिवस्वरूप हो जाता है ॥ ३४ ॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः ।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् । ३५।
१८ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
महादेवजी से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं है, महिम्न से श्रेष्ठ कोई
स्तोत्र नहीं है, अघोर मंत्र से श्रेष्ठ कोई मन्त्र नहीं है और गुरु से
श्रेष्ठ कोई तत्त्व (पदार्थ) नहीं है ॥ ३५ ॥
दीक्षादानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नरतव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥३६॥
दीक्षा, दान, तप, तीर्थादि तथा ज्ञान और यागादि क्रियाएँ इस
शिवमहिम्नस्तोत्र के पाठ की सोलहवीं कला को भी नहीं प्राप्त कर
सकती हैं ॥ ३६ ॥
कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः
शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः ।
स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्-
स्तवनमिदमकार्षीद्दिव्यदिव्यं महिम्नः ॥३७॥
सभी गंधर्वो के राजा पुष्पदंत भाल में चन्द्रमा को धारण करने
वाले देवाधि देव महादेवजी के दास थे, वे सुरगुरु महादेवजी के क्रोध
से अपनी महिमा से भ्रष्ट हुए, तब उन्होंने शिवजी की प्रसन्नता के
लिए इस परम दिव्य शिवमहिम्न स्तोत्र को बनाया ॥ ३७ ॥
सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुम्
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेताः ।
भाषा-टीका-सहितम् १६
व्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥
यह पुष्पदंत का बनाया हुआ अमोघ स्तोत्र श्रेष्ठ देवताओं तथा
मुनियों से पूज्य और स्वर्ग तथा मोक्ष का कारण है। इसे जो मनुष्य
अनन्य चित्त से हाथ जोड़कर पढ़ता है, वह किन्नरों द्वारा स्तुत्य होकर
शिवजी के समीप जाता है ॥ ३८ ॥
श्रीपुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन
स्तोत्रेण किल्विषहरेण हरप्रियेण ।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ॥३९॥
श्रीपुष्पदंत के मुख से निकले हुए इस पापहारी तथा महादेवजी
के प्रिय स्तोत्र को सावधानी से कण्ठस्थ करके पाठ करने से प्राणी
मात्र के स्वामी श्रीमहादेवजी प्रसन्न होते हैं ॥ ३६ ॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारि शिवमीश्वरवर्णनम् ॥४०॥
अनुपम और मन को हरने वाला यह ईश्वर वर्णनात्मक, एवं
पुष्पदंत गंधर्व का कहा हुआ स्तोत्र अब समाप्त हुआ ॥ ४० ॥
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वरः ।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ॥४१॥