शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
प्रस्तावना एवं स्तोत्र मंगलाचरण
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शिव महिम्न स्तोत्र
भाषा-टीका सहितम्
सम्पादक :—
आचार्य पं० राजेश दीक्षित
प्रकाशक :—
कमल पुस्तकालय
१६७७ नई सड़क, दिल्ली-६
१९८५ ई० मूल्य २)५०
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शिवमहिम्न स्तोत्रम्
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महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी ।
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ॥
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन् ।
ममाप्येष स्तोत्रे हर ! निरपवादः परिकरः ॥१॥
हे हर ! (सभी दुःखों के हरने वाले) आपकी महिमा के अन्त को
न जानने वाले मुझ अज्ञानी द्वारा की गई स्तुति यदि आपकी महिमा
के अनुकूल न हो, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि
ब्रह्मा आदि भी आपकी महिमा के अन्त को नहीं जानते हैं । अतः
उनकी स्तुति भी आपके योग्य नहीं है । "स वाग् यथा तस्य गुणान्
गृणीते" के अनुसार मेरी यथामति स्तुति उचित ही है । "नमः
पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः" इस न्याय से मेरी स्तुति आरम्भ करना
क्षम्य हो ॥ १ ॥
अतीतं पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो-
रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।
२ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः ।
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥
हे हर ! आपकी निर्गुण और सगुण महिमा मन तथा वाणी
के विषय से परे है, जिसे वेद भी संकुचित होकर कहते हैं। अतः
आपकी उस महिमा को स्तुति करने में कौन समर्थ हो सकता है ?
फिर भी भक्तों के अनुग्रहार्थ धारण किया हुआ आपका नवीन रूप
भक्तों के मन और वाणी का विषय हो सकता है ॥ २ ॥
मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत-
स्तवब्रह्मन्किंवागपि सुरगुरोर्विस्मय पदम् ॥
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः ।
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥
हे ब्रह्मन् ! जब कि आपने मधु के सदृश मधुर और अमृत के
सदृश जीवनदायिनी वेदरूपी वाणी को प्रकाशित किया है, तब
ब्रह्मादि द्वारा की गई स्तुति आपको कैसे प्रसन्न कर सकती है ? हे
त्रिपुरमथन ! जब ब्रह्मादि भी आपके स्तुति-गान करने में असमर्थ
हैं, तब मुझ तुच्छ की क्या सामर्थ्य है ? मैं तो केवल आपके गुण-
गान से ही अपनी वाणी को पवित्र करने की इच्छा रखता हूँ ॥३॥
तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत् ।
त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥
भाषा-टीका-सहितम् ३
अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयाममणीम् ।
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥४॥
हे वरद ! आपके ऐसे ऐश्वर्य की—जो संसार की सृष्टि, रक्षा
तथा प्रलय करने वाला है, तीनों वेदों द्वारा गाया गया है, तीनों
गुणों (सत्, रज, तम) से परे है, एवं तीनों शक्तियों (ब्रह्मा, विष्णु,
महेश) में व्याप्त है, कुछ नास्तिक लोग अनुचित निन्दा करते हैं।
इससे उन्हीं का अधःपतन होता है, न कि आपके सुयश का ॥ ४ ॥
किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम् ।
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ॥
अतर्क्यैश्वर्येत्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः ।
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥
“अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्” के अनुसार
कल्पना से बाहर, अपनी अलौकिक माया से सृष्टि करने वाले आपके
ऐश्वर्य के विषय में नास्तिकों का यह कुतर्क कि वह ब्रह्मा सृष्टि कर्ता
है, किन्तु उसकी इच्छा, शरीर, सहकारी कारण, आधार और
समवायी कारण क्या है ? जगत् के कतिपय मन्द-मति वालों को
भ्रान्ति करने वाला है ॥ ५ ॥
४ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगता-
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनाहृत्य भवति ॥
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो
यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥
हे अमर वर ! यह सावयव लोक अवश्य ही जन्य है तथा इसका
कर्ता भी कोई न कोई है, परन्तु वह कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा
कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना
की सामग्री दूसरे के पास होना असम्भव है । इसलिये अज्ञानी लोग
ही आपके विषय में सन्देह करते हैं ॥६॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति ।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ॥
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां ।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥७॥
हे अमर वर ! वेदत्रयी, सांख्य, योग, शैव मत और वैष्णवमत
ऐसे भिन्न-भिन्न मतों में कोई वैष्णवमत और कोई शैव मत को अच्छा
कहते हैं, परन्तु रुचि की विचित्रता से टेढ़े-सीधे मार्ग में प्रवृत्त हुए
मनुष्यों को अन्त में एक आप ही साक्षात् या परम्परा प्राप्त होते
हैं, जैसे कि नदियाँ टेढ़ी-सीधी बहती हुई साक्षात् या परम्परा से
समुद्र में ही जा मिलती हैं ॥ ७ ॥