शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)
Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary
गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ शिवमहिम्नस्तोत्रम्
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगता-
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनाहृत्य भवति ॥
अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो
यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥
हे अमर वर ! यह सावयव लोक अवश्य ही जन्य है तथा इसका
कर्ता भी कोई न कोई है, परन्तु वह कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा
कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना
की सामग्री दूसरे के पास होना असम्भव है । इसलिये अज्ञानी लोग
ही आपके विषय में सन्देह करते हैं ॥६॥
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति ।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ॥
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां ।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥७॥
हे अमर वर ! वेदत्रयी, सांख्य, योग, शैव मत और वैष्णवमत
ऐसे भिन्न-भिन्न मतों में कोई वैष्णवमत और कोई शैव मत को अच्छा
कहते हैं, परन्तु रुचि की विचित्रता से टेढ़े-सीधे मार्ग में प्रवृत्त हुए
मनुष्यों को अन्त में एक आप ही साक्षात् या परम्परा प्राप्त होते
हैं, जैसे कि नदियाँ टेढ़ी-सीधी बहती हुई साक्षात् या परम्परा से
समुद्र में ही जा मिलती हैं ॥ ७ ॥