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शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

प्रस्तावना एवं रावण-वधार्थ राम-तपस्या

अध्याय १
श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसरस्वत्यै नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥ ॐ अस्य श्रीशिवगीतामालामन्त्रस्य
श्रीवेदव्यासरूप्यगस्त्यऋषिः ॥
जगतीच्छन्दः ॥ श्रीसदाशिवः परमात्मा देवता ॥ प्रणवे बीजम् ॥ सर्वव्यापक इति शक्तिः ॥ हीं कीलकम् ॥
ब्रह्मात्मसाक्षात्कारार्थे जपे विनियोगः ॥ अथ न्यासः ॥
ॐ श्रीवेदव्यासरूप्यगस्त्यऋषिः शिरसि ॥ ॐ जगतीच्छन्द मुखे ॥ ॐ श्रीसदाशिवः परमात्मादेवता हृदये ॥ ॐ प्रणवे
बीजं नाभौ ॥ ॐ सर्वव्यापक इति शक्तिः गुह्ये ॥
ॐ हीं कीलकं पादयोः ॥ ॐ ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ॥ ॐ हीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ ॐ हूं मध्यमाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रीं
अनामिकाभ्यां नमः ॥ ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥
ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ एवं हृदयादि ॥
दोहा-गौरि गिरीश गणेश रवि, शशि सहसानन राम । सबको वंदन करत हूं, सिद्ध होहि सब काम ॥१॥
सूतजी बोले हे शौनकादिको ! इसके उपरान्त अब मै शुद्ध और कैवल्यमुक्तिदायक संसारके दुःख छुड़ाने में औषधीरुप
शिवगीतारत्नको शिवजीके अनुग्रहसे वर्णन करता हूँ ॥१॥
न कर्मो के अनुष्ठान न दान न तप से मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है किन्तु ज्ञान से ही प्राप्त होता है ॥२॥
आगे शिवजी ने दण्डकवनमें रामचन्द्रको जो शिवगीता उपदेश की है वह गुप्तसे भी गुप्त है ॥३॥
जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है जो पूर्वकाल में स्कन्दजीने सनत्कुमार से वर्णन की थी ॥४॥
वह मुनिश्रेष्ठ सनत्कुमार व्यासजीसे कहते हुए व्यासजीने कृपाकरके वह हमसे वर्णन की ॥५॥
और कहा भी था कि, यह तुम गीता किसी को नही देना, हे सूतपुत्र! ऐसा वचन पालन न करने से देव क्षुभित हो
शाप देते है ॥६॥
हे ब्राह्मणो! तब मैने भगवान् व्यासजी से पूछा हे भगवन् ! सब देवता क्यो क्षोभ करते और शाप देते है ॥७॥
उनकी इसमें क्या हानि है, जो वे देवता क्रोध करते है । यह सुनकर व्यासजी मुझसे बोले हे वत्स! तू अपने प्रश्न का
उत्तर सुन ॥८॥
जो ब्राह्मण नित्य अग्निहोत्र करते और गृहस्थाश्रममें रहते है वही सब फलों के देनेहार देवताओं को कामधेनु है ॥९॥
भक्ष्य, भोज्य, पान करने योग्य, जो कुछ पर्वोमे यज्ञ किया गया है, सो हविद्वारा अग्निमें आहुती दी गई है, वह
सब स्वर्ग में मिलती है ॥१०॥
देवताओंको स्वर्गमें इष्टसिद्धि देनेवाला और कुछ नही है जैसे गृहस्थी पुरुषों को दुही गई गाय ले जाने से केवल दुःखी
होता है ॥११॥
इसी प्रकार ज्ञानवान ब्राह्मण देवताओंको दुःखदाता ही है कारण कि, वह कर्म नही करता इस कारण इसके विषय भार्या
पुत्रादि में प्रवेश करके देवता विघ्न करते हैं ॥१२॥
इससे किसी देहधारीकी शिवमें भक्ति नही होती इस कारण मूर्खोंको शिवका प्रसाद नही मिलता ॥१३॥
और जो यथाकथञ्चित जानता भी है वह किसी कारण मध्यें ही खंडित हो जाता है और जो किसीको ज्ञान हुआ भी तो
वह विश्वास नही भजता ॥१४॥
ऋषय ऊचुः ।
ऋषि बोले जब इस प्रकारसे देवता शरीरधारियों को विघ्न करते है तो फिर इसमें किसका पराक्रम है जो मुक्तिको प्राप्त
होता है ॥१५॥
हे सूतपुत्र ! आप सत्य कहिये कि, उनका उपाय है या नही है ॥सूतजी बोले करोड जन्मके पुण्यसंचय होने से शिवमें
भक्ति उत्पन्न होती है ॥१६॥
उस भक्ति के होनेसे इष्टपूर्तादि कर्मोकी कामना छोड़कर मनुष्य शिवजीमे अर्पण बुद्धिसे यथाविधि कर्म करता है ॥१७॥
उन शिवजीकी कृपा से जब यह प्राणी दृढ भक्तिमान होता है, तब विघ्न छोड़कर भयभीत हो देवता चले जाते है ॥१८॥

उस भक्तिके करनेसे शिवजीके चरित्र श्रवण करनेकी अभिलाषा उत्पन्न होती है, सुननेसे ज्ञान और ज्ञानसे मुक्ति हो
जाती है ॥१९॥
बहुत कहनेसे क्या है, जिसकी शिवजी में दृढ भक्ति है वह करोड़ो पापोसे ग्रसा हो तो भी मुक्त हो जाता है ॥२०॥
अनादरसे, मूर्खतासे, परिहाससे, कपटतासे भी जो मनुष्य शिवभक्तिमें तत्पर है वह अन्त्यज (चांडाल) भी मुक्त हो
जाता है ॥२१॥
इस प्रकारसे भक्ति सदा सबके करने योग्य है, इस भक्ति के होतेभी जो मनुष्य संसार से न छूटै ॥२२॥
उस संसारबंधनसे न छूटनेवाले की समान दूसरा कोई भी मूर्ख नही और कुछ शिवजी भक्तिसे ही प्रसन्न नही होते जो
नियमसे केवल भक्ति या द्रोहही करते है ॥२३॥
उनपरभी प्रसन्न हो शिव मनवांछित फलप्रदान करते है बडे मोलकी वस्तु कुछ लेकर वा अल्प मोलकी वस्तु अथवा
केवल जलही लेकर ॥२४॥
जो नियमसे शिवार्पण करते है, शिवजी प्रसन्न हो उसे त्रैलोक्य देते है, और जो यह न हो सके तो नियम से नमस्कार
वा प्रदक्षिणाः ॥२५॥
जो नित्यप्रति शिवजी की करता है, उसके ऊपर भी शिवजी प्रसन्न होते है, और जो प्रदक्षिणा में असमर्थ हो केवल
मन में ही शिवजी का ध्यान करे ॥२६॥
चलते बैठते में जो उनका स्मरण करे उसकी भी अभीष्ट पदार्थ प्रदान करते है, चन्दन बेलकाष्ठ तथा वनमें उत्पन्न
हुए ॥२७॥
फल जिसके अधिक प्रीति करनेवाले है उस शिवजी की सेवा करनेमें त्रिलोकी में कौन वस्तु दुर्लभ है ? ॥२८॥
वनके उत्पन्न हुए फल मूलादिमें शिवजीकी जैसी प्रीति है वैसी ग्राम नगरके उत्पन्न हुए उत्तम उत्तम फल मूलोंमें नही
॥२९॥
जो ऐसे देवताको छोड़कर अन्य देवताका भजन सेवन करता है, वह मानो गंगा का त्याग करके मृगतृष्णाकी इच्छा
करता है ३०॥
परन्तु जिनको करोड़ो जन्मों के पाप चिपट रहे है, उनका चित्त अज्ञान अंधकार से आच्छादित हो रहा है, उनको
शिवजी की भक्ति प्रकाशित नही होती ॥३१॥
काल देश स्थल का कुछ नियम नही है जहाँ इसका चित्त रमें वही ध्यान करे ॥३२॥
शिवरूपसे अपने आत्मामें ध्यान करनेसे शिवकी ही मुक्ति को प्राप्त हो जाती है, जिसकी आयु बहुत थोड़ी लक्ष्मी से
भी हीन हो और शिवजीकी एक अंशरूपि सार्वभौमपदयुक्त ॥३३॥
'मैं राजा हूं' ऐसे अभिमान से कहनेवाले को वंशसहित संहार करते है । जो सम्पूर्ण लोकका कर्ता तथा अक्षय
ऐश्वर्यवान पुरुषभी ॥३४॥
अभिमारहित हो जो 'शिवः शिवोहं' इस प्रकार से कथन करता है उसको शिव आत्मस्वरूपके तादात्म्यभोगी अर्थात्
शिवरूपही कर देते है ॥३५॥
हे ऋषियो! जिस व्रतके करने से प्राणीके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह चारों पदार्थों हस्तगत होते है मै वह पाशुपत
व्रत तुमसे वर्णन करता हूँ ॥३६॥
विरजानामक दीक्षाको करके विभूति और रुद्राक्षको धारण कर वेदसारनामक शिवसहस्त्रनामको जप करते हुए ॥३७॥
इस मानव शरीरको त्यागकर शैवशरीर को प्राप्त होने पर लोकको कल्याण करनेहारे शंकर प्रसन्न होकर ॥३८॥
तुमको दर्शन देकर कैवल्य मुक्ति देंगे जब रामचन्द्र दण्डकारण्यमें वास करते थे, तब अगस्त्यजीने उन्हे वह उपदेश
दिया था ॥३९॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे शिवभक्त्युत्कर्षनिरूपणं नाम
प्रथमोऽध्यायैः ॥१॥
वह मैं सब तुमासे कहता हूँ, तुम भक्तियुक्त हो श्रवण करो ॥४०॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादोपक्रमे भाषाटीकायां

प्रथमोऽध्यायः ॥१॥



अध्याय २
ऋषि बोले।
अगस्त्यजी रामचन्द्रके निकट क्यों आये थे उर किस प्रकार से रामचन्द्रसे विरजा दीक्षा कराई थी इससे रामचंद्रको किस
फलकी प्राप्ति हुई सो आप हमसे कहिये ॥१॥
सूत उवाच ।
सूतजी बोले जिस समय जनककुमारी सीताको रावणने हरण किया था तब रामचन्द्रने वियोगके कारण बहुत विलाप
किया ॥२॥
निद्रा देहाभिमान और भोजन त्यागकर रातदिन शोक करते भाईसहित रामचन्द्रने प्राण त्याग करनेकी इच्छा की ॥३॥
अगस्त्यजी यह बात जानकर रामचंद्रजी के समीप आये और मुनिने रामचन्द्रको संसारकी असारता समझाई ॥४॥
अगस्त्य उवाच ।
अगस्त्यजी बोले- हे राजेन्द्र! यह क्या विषाद करते हो, स्त्री किसकी इसका विचार तो करो पृथ्वी, आप, तेज, वायु
और आकाश इन पांच महाभूतों का बना हुआ यह देह जड है इसको ज्ञान नही होता ॥५॥
और आत्मा तो निर्लेप सर्वत्र परिपूर्ण सच्चिदानन्दस्वरूप है आत्मा न कभी उत्पन्न होता न मरता दुःख भोगता है ॥६॥
जिस प्रकार यह सूर्य संपूर्ण संसारके चक्षुरूप से स्थित है और चक्षुओंके दोषसे कभी लिप्त नही होता ॥७॥
इसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का आत्माभी दुःखमें लिप्त नही होता और यह देहभी मलका पिंड तथा जड है यह जीव
कलारहित होने से जडै है ॥८॥
यह काष्ठ अग्निके संयोगसे भस्म हो जाता है, सियार आदि इसको खाजाते है, तौ भी नही जानता कि उसके वियोग
में क्या दुःख होता है ॥९॥
जिसका सुवर्णके समान गौरवर्ण, अथवा दूर्वादलके समान श्याम स्वरूप है, कुचकलश जिसके उन्नत है, मध्यभाग
सूक्ष्म है ॥१०॥
बडे नितम्ब और जांघोवाली चरणतल जिसका कमलके सदृश रक्तवर्ण है जिसका मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान है
और पके बिम्बा फलके समान जिसके अधरोष्ठ है ॥११॥
नील कमलकी समान जिसके विशाल नेत्र है, मत्त कोकिलाकी समान जिसके वचन और मत्त हाथीकी समान जिसकी
चाल है ॥१२॥
ऐसी स्त्री कामदेवकि बाणकी समान कटाक्षोंस मेरे ऊपर कृपा करती है इस प्रकारसे जो मूर्ख मानता है वही कामका
शिष्य है ॥१३॥
हे राजन! सावधान होकर सुनो मैं इसका विवेक कथन करता हुं यह जीव स्त्री पुरुष या नपुंसक नही है ॥१४॥
यह देही मूर्तिरहित सब देहों में स्थित रूपरहित सर्वव्यापी सबका साक्षी देहमें स्थित हो प्राणीको सजीव करनेवाला है
जिसको सूक्ष्मांगी सुकुमार बाला कहते है वह एक मलका पिंड और जडस्वरूप है ॥१५॥
वह न कुछ देखती न सुनती न सूंघती है जिसका शरीर चर्ममात्रका है हे रामचंद्र ! बुद्धिसे विचारो और छोडो ॥१६॥
जो प्राणोंसे भी अधिक प्यारी है वही सीता तुम्हारे दुःखका कारण होगी । पंच महाभूतोंसे उत्पन्न होनेके कारण
पांचभौतिक देह उत्पन्न होते है ॥१७॥
परन्तु उन सबमें आत्मा एक परिपूर्ण सनातन है इस विचार से कौन स्त्री कौन पुरुष सब ही सहोदर है ॥१८॥
जिस प्रकार अनेक गृह निर्माण करनेमें आकाश अबच्छिन्नताको प्राप्त होता है अर्थात उन सबमें मिल जाता है पश्चात

उन घरों के जल जानेपर कुछ हानि को भी प्राप्त नही होता ॥१९॥
इसी प्रकार देहोंमें आत्मा परिपूर्ण और सनातन है देहसम्बन्धसे अनेक प्रकारका प्रतीत होता है परन्तु उनके नाश होने
पर आत्मा नष्ट नही होता, वह एकरूप है ॥२०॥
जो मारनेवाला जानता है मैने मारा जो मरनेवाला जानता है मै मरा यह दोनों न जानने से मूर्ख है, कारण कि न यह
मारता है और न वह मारा जाता है ॥२१॥
हे राम! इस कारण अतिदुःख करनेसे खेदका कारण क्या है अपना स्वरूप इस प्रकार जानकर दुःखको त्याग कर सुखी
हो ॥२२॥
श्रीरामचंद्र बोले हे मुने! जब देहको भी दुःख नही होता और परमात्मा को भी दुःख नही होता है, तो सीताके वियोग
की अग्नि मुझे कैसे भस्म करती है ॥२३॥
जो वस्तु सदा अनुभव करी जाती है तुम कहते हो कि वह नही है । हे मुनिश्रेष्ठ! फिर इस बातमें मुझे कैसा विश्वास
हो ॥२४॥
जब सुख दुःखको भोक्ता जीव नही है, तौ कौन है? जिसके द्वारा प्राणी दुःखी होता है, सुखदुःख को भोक्ता कौन है
हे मुनिश्रेष्ठ! कहिये ॥२५॥
अगस्त्य उवाच ।
अगस्त्यजी बोले शिवजी की माया कठिनतासे जानने योग्य है । जिसने जगत को मोह लिया है उस मायाको तो प्रकृति
जानो और मायावाला महेश्वरको जानो ॥२६॥
उसीके अवयवरूप जीवोंसे सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, वह महेश्वर सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप अनन्त और सर्वव्यापी है ॥२७॥
उसीका वंश जीवलोकमें सब प्राणियों के हृदयमें स्थित हुआ है जिस प्रकार से काष्ठ के योगसे अग्निमें स्फुलिंग उठते
है इसी प्रकार जीवभी ऐसा परमात्मासे होता है ॥२८॥
यह ईश्वरांश जीव अनादिकालके कर्मबंधनपाशमें बंधे है यह अनादि वासनाओंसे युक्त है और क्षेत्रज्ञ कहलाते है ॥२९॥
मन बुद्धि चित अहंकार यह चारों अन्तःकरण के ही भेद है । इस अन्तःकरण चतुष्टयमें क्षेत्रज्ञों का प्रतिबिम्ब पडता है
॥३०॥
वही जीवपनको प्राप्त होकर कर्मफलके भोक्ता हुए है, वही जीव कर्म भोगने के स्थान देहों को प्राप्त होकर विषय
सेवन करने से सुख वा दुःख भोग करते है ॥३१॥
स्थावर जंगमके भेद से दो प्रकार का शरीर कहा जाता है ॥३२॥
वृक्ष, लता, गुल्म, यह स्थावर सूक्ष्म देह कहलाते है, और अण्डज, पक्षी, सर्प इत्यादि, स्वेदज, कृमि,
मँशकादि, जरायुज, मनुष्य गौ ओदि, यह जंगम शरीर कहलाते है ॥३३॥
कितने एक प्राणी शरीर धार के निमित्त कर्मानुसार योनियों में प्रवेश करते है और दूसरे वृक्षों का आश्रय करते है ॥३४॥
जब यह जीव विषयोंमें लिप्त होता है तब मैं सुखी हूं दुःखी हूं ऐसा मानता है, यद्यपि यह निर्लेप ज्योतिःस्वरूप है
परन्तु शिवजीकी माया से मोहित सुख दुःखका अभिमानी होती है ॥३५॥
काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य और मोह यह छः महाशत्रु अहंकार से उत्पन्न होते है ॥३६॥
यही अहंकार स्वप्न और जाग्रत अवस्था में जीवको दुःख देता है और सुषुप्तिमें सूक्ष्मरूप के होने और अहंकार के
अभाव से यह जीव शंकरता (आनन्दरूप) को प्राप्त होता है ॥३७॥
इस प्रकार यह माया में मिलने से सुख दुःखका कारण उत्पन्न करता है जिस प्रकार सूर्य की किरणों के पडने से सीपी
में चांदी भासती है इसी प्रकार शिवस्वरूप में माया से विश्व दीखता है ॥३८॥
इस कारण तत्त्वज्ञानसे तो कोई भी दुःखभागी नही है । इससे हे राम! तुम दुःखको त्याग वृथा क्यो दुःखी होते हो? ॥
३९॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचंद्र बोले, हे मुनिराज! जो तुमने मेरे सन्मुख कहा है, यह सब सत्य है तथापि भयंकर प्रारब्धदैवका दुःख मुझे
नही छोड़ता है ॥४०॥

जिस प्रकार मद्य प्राणीको मत्त कर देता है इसी प्रकार अज्ञानहीन तत्त्वज्ञानयुक्त ब्राह्मणको भी प्रारब्धकर्म नही
छोड़ता ॥४१॥
बहुत कहने से क्या है यह काम प्रारब्ध का मन्त्री है, यह मुझको दिनरात पीड़ा देता है और इसी प्रकारसे अहंकार भी
दुःख देता है ॥४२॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादे वैराग्योपदेशोनाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
जीव अत्यन्त पीडित होकर स्थूल देह को त्याग करता है । इस कारण हे ब्राह्मण! मेरे जीवन के निमित्त उपाय करो
॥४३॥
इति श्रीप० शिवगीतासू० ब्रह्मवि० यो० अगस्त्यराघवसंवादे भाषाटीकायां वैराग्योपदेशो नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥



अध्याय ३
अगस्त्यजी बोले कामक्रोधादिसे पीडित हो मनुष्य हितकारी वचन नही सुनता, उसको हितकारी वचन ऐसे अच्छे नही
लगते जैसे मरणशीलको औषधि अच्छी नही लगती ॥१॥
जिस सीता को मायावी दैत्य सागरके बीचमें ले गया है, हे राम! वह तुम्हारे निकट अब किस प्रकारसे आ सकती है ॥
२॥
जिसके द्वारपर वानरोंके यूथोंके समान सब देवता बांध लिये गये है । देवताओंकी स्त्री जिसके यहां चमर ढोरती है ॥३॥
जो शिवजी के वर से गर्वित हो सम्पूर्ण त्रिलोकी को भोगता है और भय से रहित है उसे तुम कैसे जीतोगे ॥४॥
इन्द्रजित भी उसका पुत्र शिव के वरदान से गर्वित है उसके आगे से देवता संग्राम में बहुतबार भाग गये है ॥५॥
देवताओं को भय देनेवाला जिसका भाई कुम्भकर्ण बड़ा भयंकर है और अनेक प्रकार दिव्यास्त्र धारण करनेवाला चिरंजीवी
विभीषण है ॥६॥
देव और दानवोंको दुर्गम जिसका लंकानाम दुर्ग है, और करोड़ो जिसके यहां चतुरंगिणी सेना है ॥७॥
हे राजन! फिर अकेले तुम उसे कैसे जीतोगे, तुम्हारी यह बात ऐसी है, कि जैसे कोई बालक चन्द्रमाको हाथसे लेना
चाहे इसी प्रकार तुम काम से मोहित होकर उसके जीतने की इच्छा करते हो ॥८॥
श्रीरामचन्द्रजी बोले हे मुनिश्रेष्ठ! मै क्षत्रिय हूं और मेरी भार्या राक्षसने हरण कर ली है, जो मै उसे न मारूंगा तौ मेरे
जीने से क्या फल है ॥९॥
इस कारण तुम्हारे तत्वबोधसे मुझे कुछभी प्रयोजन नही है, यह कामक्रोधादिक मेरे शरीरको भस्म किये डालते है ॥१०॥
और अपनी प्रियाके हरण होने और शत्रुसे पराभव होनेसे अहंकारभी नित्य और मेरे जीवनको हरण करनेको उद्यत है ॥
११॥
हे मुनिश्रेष्ठ! जिसको तत्त्वज्ञान की इच्छा हो वह लोकके पुरुषों में नीच है । इस कारण सागर लंघकर युद्धमे उसके
मारने के उपायको आप कहिये आपसे श्रेष्ठ और कोई मेरा गुरु नही ॥१२॥
अगस्त्य उवाच ॥
अगस्त्यजी बोले । जो ऐसी इच्छा है, तो पार्वतीके पति शिव अविनाशी की शरण में जाओ, वह भगवान प्रसन्न होकर
तुमको मन वांछित फल देंगे ॥१३॥
इन्द्रादि देवता हरि और ब्रह्माभी जिसको नही जीतसके वह शिवजीके अनुग्रह बिना तुमसे कैसा मारा जायगा ॥१४॥
इस कारण विरजामार्गसे मै तुमको दीक्षा देता हूँ इस मार्ग से तुम मनुष्यपन छोड़कर तेजोमय हो जाओगे ॥१५॥
जिसके प्रतापसे युद्धमे शत्रुओंको मारकर सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त हो जाओगे और सम्पूर्ण धरामंडलको भोगकर अन्तमें
शिवलोकको जाओगे ॥१६॥

सूत उवाच ।
सूतजी बोले, तब रामचन्द्रजी मुनिश्रेष्ठको दंडवत प्रणाम करके दुःख त्याग प्रसन्नमन हो बोले ॥१७॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचन्द्रजी बोले - हे मुने ! मै कृतार्थ हो गया, मेरे कार्य सिद्ध होगये जब समुद्र पीनेवाले आप मेरे ऊपर प्रसन्न
हो तो मुझे क्या दुर्लभ है । इस कारण हे मुनिश्रेष्ठ! आप मुझसे विरजादीक्षाकी विधि कहिये ॥१८॥
अगस्त्य उवाच ।
अगस्त्यजी बोले, शुक्लपक्षकी चौदस अष्टमी वा एकादशी सोमवार अथवा आर्द्रा नक्षत्रमें यह कार्य आरंभ करना ॥१९॥
जिनको वायुश्रेष्ठ, रुद्र, अग्नि, परमेश्वर, निरंतर जगत के नियंता सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मादिकोंसे भी परे शिव कहते है ॥
२०॥
जो ब्रह्मा, विष्णु, अग्नि, वायु इनके भी उत्पन्न करनेवाले है इस प्रकार सदाशिवका ध्यान करके, अग्निबीजसे
गार्हाग्निका ध्यान कर देह उत्पत्तिके कारणभूत, जो पंचमहाभूत है, वह वायुबीजसे पृथक है, इस प्रकार भावना करके
॥२१॥
उन महाभूतों के गुणका क्रमसे ध्यान करे कि, गार्हाग्निसे दग्ध होनेवाली भावना करावै, उसका प्रकार-मात्रा अर्थात पंच
महाभूतोंके गुण- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, और शब्द यह पांच है पृथ्वीमेम पांचही गुण रहते है, जलमें शब्द,
स्पर्श, रूप, रस यह चार तेज में शब्द, स्पर्श, रूप यह तीन, वायु मे शब्द और स्पर्श यह दो और आकाश मे शब्द
यह एक ही गुण है । इसकी उत्पत्तिका क्रम आकाशसे वायु, वायुसे तेज, तेजसे जल, जलसे पृथ्वी उत्पन्न होती है
और इससे विपरीत अर्थात् पृथ्वी जलमे, जल तेजमें, तेज वायुमें, वायु आकाशमें लय हो जाता है अधिक अधिक गुण
के भूत न्यून न्यून गुणवाले भूतों मे लय हो जाते है, और इन सबकी अमात्रा जिसका गुण नही, उन अहंकारादिकोंको
लय करे अर्थात् पंचमहाभूतोंको अहंकारमें, अहंकारका महत्तत्वमें, महत्तत्वका मायामें, मायाका सबके आधारभूत,
परमात्मामें लय करे फिर अमृतबीजसे लयके विपरीत क्रम करके यह देहोत्पत्ति विषयमें प्रवृत्त है ऐसी भावना करके मै
दिव्यदेह हूं और पूर्वदेहके उत्पन्न करने हारे सब गुण और द्रव्यका अग्निबीजसे दाह करके उसका परमात्मा मे लयकरके
अमृतबीजसे पुनरुज्जीवन करके यह देह अमृत और दिव्य है, ऐसी भावना करै । इस प्रकार भूतशुद्धि करके
पाशुपतव्रतका आरंभ करै ॥२२॥२३॥
फिर प्रातःकालही मै पाशुपतव्रतको करूंगा ऐसा संक्षेपसे संकल्प करके अपनी शाखा तथा गृह्यसूत्र से अग्नि स्थापन करे
॥२४॥
उसी दिन व्रत रखकर पवित्र हो श्वेतवस्त्र धारण करे शुक्ल यज्ञोपवीत और शुक्लमाला पहरे ॥२५॥
अन्तःकरण एकाग्र कर (प्राणापानव्यानोदानसमाना मे शुद्ध्यन्ताम् तथा (ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा)
इत्यादि विराजामंत्रके अनुवाकपर्यरन्त समिधा आज्य और चरुसे हवन करै ॥२६॥
हवनके अनन्तर (यातेअग्नियज्ञियातनूः) इस मंत्रसे अग्नि कोआत्मामें आरोपण करके अग्निके भस्मको (अग्निरिति
भस्म इत्यादि) मंत्रोसे अभिमंत्रित कर ललाटादि अंगोंमें धारण करे ॥२७॥
जिस ब्राह्मणके शरीरमें भस्म लगी होती है । वह महापातकोसे भी छूट जाता है इसमें संदेह नही ॥२८॥
जिस कारणसे कि, भस्म अग्नि का वीर्य है, मै भी अग्नीवीर्यके धारण करनेसे बलवान हो जाऊंगा ॥ इस प्रकार जो
नित्य भस्म स्नान करता तथा जितेन्द्रिय हो, भस्मपर शयन करता है ॥२९॥
वह सब पाप से मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त होता है, हे राजन ! तुम इस प्रकार करो और शिवसहस्त्रनाम मै
तुमको देता हूं इससे तुम्हारे सब मनोरथ पूर्ण होंगे ॥३०॥
सूत उवाच ।
सूतजी बोले, ऐसा कहकर अगस्त्यजीने रामचन्द्रका शिवसहस्त्रनामका उपदेश किया ॥३१॥
जो कि सब वेदोंको सार है, जो शिवजीका प्रत्यक्ष करनेवाला है उसको देकर अगस्त्यजी ने कहा हे राम! तुम इसे
दिनरात जपो ॥३२॥
तब भगवान शिवजी प्रसन्न होकर पाशुपत अस्त्र तुमको देंगे, जिससे तुम शत्रुओं को मारकर प्रियाको प्राप्त होगे ॥३३॥
उसी अस्त्र के प्रभावसे सागर को शोष सकोगे संहार कालमें शिवजी इसी ही अस्त्र से जगतको संहार करते है ॥३४॥
इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे अगस्त्यराघवसंवादे विरजादीक्षा निरुपणं नाम

तृतीयाऽध्यायः ॥३॥
उसके बिना पाये दानवोंसे जय पाना बडा दुर्लभ है । इस कारण इस अस्त्रके पानेके निमित्त शिवजीकी शरण जाओ ॥
३५॥
इति श्रीपद्मपुराणे० अगस्त्यराघवसंवादे शिवगीताभाषाटीकायां तृतीयोध्यायः ॥३॥



अध्याय ४
सूतजी बोले – अगस्त्यजी जब ऐसा कहकर आश्रम को चले गये तब रामगिरिके ऊपर गोदावरीके पवित्र आश्रममें
रामचन्द्र ॥१॥
शिवलिंग का स्थापन कर अगस्त्यजीके उपदेशानुसार विरजादीक्षा ले सर्वांग में विभूति लगाय रुद्राक्ष के आभरण पहर ॥
२॥
शिवलिंगको गोदावरीके पवित्र जलोंसे अभिषेकित कर वन के उत्पन्न हुए फूलों और फूलों से उनका पूजन कर ॥३॥
भस्म लगाये भस्मपरही शयन करते व्याघ्रचर्म के आसनपर बैठे रातदिन अनन्य बुद्धिकर शिवसहस्त्रनाम जपने लगे ॥
४॥
एक महीने तक फलाहार, एक महीने तक पात्तों का भोजन, एक महीना जलपान और एक महीना पवन को आहार
करे ॥५॥
शान्त अन्तःकरण, इन्द्रियोंको जीते, प्रसन्न मन, महेश्वर का ध्यान किये, हृदयकमलमें विराजमान, अर्द्धांग में
पार्वतीको धारण किये ॥६॥
चार भुजा तीन नेत्र बिजली के समान पीली जटा धारे करोड़ो सूर्यके समान प्रकाशमान कोटि चन्द्रमाके समान शीतल ॥
७॥
सम्पूर्ण गहने पहरे सर्पोंका यज्ञोपवीत व्याघ्रचर्म ओढे भक्तों के अभयदाता वरदायक मुद्रा धारे ॥८॥
व्याघ्रचर्मका ही उत्तरीय (दुपट्टा) ओढे, देवता और असुरोंसे नमस्कार पाये, पंचमुख चन्द्रमा मस्तकपर धारे, त्रिशूल
और डमरू लिये ॥९॥
नित्य अविनाशी शुद्ध अक्षय निर्विकार एकरूप, शिवजीका इस प्रकार नित्य ध्यान करते चार महीने बीत गये ॥१०॥
तब प्रलयकालिक समुद्रके समान भयंकर शब्द प्रगट हुआ, जिस प्रकारसे समुद्र मंथनके समय मंदराचलके बिलोनेसे
ध्वनि उठी थी ॥११॥
त्रिपुरासुरके जलानेके समय शिवजीके बाणकि अग्निके समान भयंकर महाशब्द सुनकर रामचंद्र चकित हो जबतक
गोदावरीके तटोंकी ओर दृष्टि करते हैं ॥१२॥
तबतक भयंकर महातेजःपुञ्ज विप्र रामचन्द्रके आगे उपस्थित हुआ, उसी तेजसे चकित हो रामचंद्रको दशोंदिशा न सूझी
॥१३॥
हे द्विजश्रेष्ठ! आँखे मिच जानेसे राजकुमार मोहको प्राप्त हो गये और विचार करके जाना कि यह दैत्योंकी माया है ॥
१४॥
फिर वह महावीर उठकर और अपने बडे धनुष्यको चढाकर तथा दिव्य मन्त्रोंसे अभिमन्त्रितकर तीक्ष्ण बाणोंपर दृष्टि
करने लगे ॥१५॥
आग्नेयास्त्र, वरुणास्त्र, सोमास्त्र, मोहनास्त्र, सूर्यास्त्र, पर्वतास्त्र, सुदर्शनास्त्र, महाचक्र, कालचक्र, वैष्णवास्त्र ॥
१६॥
रुद्रास्त्र, पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र, कुबेरास्त्र, वज्रास्त्र, वायवास्त्र और परशुरामास्त्र इत्यादि अनेक मन्त्रोंका रामने प्रयोग
किया ॥१७॥
परन्तु उस महातेजमें वे रामचन्द्रके अस्त्र और शस्त्र इस प्रकार लीन हो गये जैसे समुद्रमें पत्थर और ओले मग्न हो

जाते है ॥१८॥
तब एक क्षणमात्रमें धनुष जलकर रामचन्द्रके हाथसे गिरा फिर तरकस अंगुलित्राण (जो अंगुलियोंमें पहनते है) गोधा
जो प्रत्यञ्चाके आघातसे रक्षा करता है (यह चर्मके बने होते है) जलकर गिर पडे ॥१९॥
यह देखकर लक्ष्मण भयभीत और मूर्छित हो पृथ्वीमें गिरे और रामचन्द्र भी निस्तब्ध हो केवल घुटनेसे पृथ्वी में बैठ
गये ॥२०॥
और आँखे मीचे भयभीत हो शंकरकी शरण को प्राप्त हुए और ऊँचे स्वरसे शिवसहस्त्रनामका जप करने लगे ॥२१॥
और शिवजीको पृथ्वीमें दण्डप्रणाम बारम्बार किया, फिरभी प्रथमकी समान दिङ्मण्डलको शब्दायमान करनेवाला शब्द
हुआ ॥२२॥
उस घोर शब्दसे पृथ्वी चलायमान और पर्वत कंपित हुए तब फिर क्षणमात्रमें वह तेज चंद्रमाके समान शीतल हुआ ॥२३॥
जितनेमें रामचंद्र नेत्र खोलकर देखते है तब तक ही उन्होने संपूर्ण भूषण धारण किये वृषभ का दर्शन किया ॥२४॥
जिसका रंग अमृतके मंथनेसे उत्पन्न हुए मक्खनके पिंडकी नाई श्वेत है, जिसके श्रृंगाग्रमें सुवर्णमें बंधी मरकत मणि
शोभित होती है ॥२५॥
नीलमणिके समान नेत्र ह्रस्वकण्ठसामासे भूषित रत्नोंकी खोगीर से शोभित जो कि श्वेत चामरों से युक्त है ॥२६॥
घरघर शब्दवाली घंटिकाओंसे दशों दिशाओंको पूर्ण करते हुए वृषभपर चढे स्फटिक मणि के समान शुभ्रकांति महादेवजी
॥२७॥
जो कि, करोड़ों सूर्यकी समान प्रकाशमान, करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल, व्याघ्र चर्मका वस्त्रधारे, नागोंका
यज्ञोपवीत पहरे ॥२८॥
सम्पूर्ण अलंकारोंसे युक्त, बिजलीकी समान पीली जटा धारे, नीलकण्ठ, व्याघ्रका चर्म ओढे, चन्द्रमा मस्तकपर
विराजमान ॥२९॥
अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे युक्त, दश बाहु, तीन नेत्र, युवावस्था पुरुषोंमें श्रेष्ठ, सच्चिदानन्दस्वरूप ॥३०॥
तथा निकट बैठी हुई पूर्ण चन्द्रमुखी, नीलकमल के समान अथवा मरकत मणिके समान सुन्दर शरीरवाली ॥३१॥
मोतियोंके आभरणोंसे युक्त, तारोंसे युक्त रात्रिकी, समान शोभित तथा विन्ध्यपर्वतकी समान ऊँचे स्तनभार से नम्र ॥
३२॥
है वा नहीं ऐसे संदिग्ध मध्यभाग में सुन्दर है वस्त्र जिसका और दिव्य आभूषणोंसे युक्त कस्तूरी आदि दिव्य सुगन्ध
लगाये ॥३३॥
दिव्य माला धारे, नील कमलके समान नेत्र, टेढे केशोंसे शोभित मुखमें ताम्बूल खाने से शोभित अधरोष्ठवाली ॥३४॥
शिवजीके आलिंगनसे उत्पन्न हुए रोमांच शरीरवाली सच्चिदानन्द रूप त्रिलोकीकी माता ॥३५॥
सब सुन्दर पदार्थोंके सारकी मूर्तिमान पात्र पार्वतीको रामचन्द्रने देखा । इसी प्रकार अपने २ वाहनपर चढ़े आयुध हाथमें
लिये ॥३६॥
बृहद्रथन्तरादि सामगायन करते अपनी २ स्त्रियोंसे युक्त इन्द्रादि दिक्पालोंसे सेवित ॥३७॥
और सबसे आगे गरुडपर चढे, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारे, नील मेघके समान शरीरधारी, बिजलीके समान
कान्तिमान, लक्ष्मीसे युक्त ॥३८॥
एकाग्र चित्तसे रुद्राध्यायका पाठ करते हुए जनार्दन और पीछे हंसपर चढे हुए चतुर्मुख ब्रह्माजी ॥३९॥
चारो मुखों से ऋक यजुः साम और अथर्व इन चारो वेद तथा रुद्रसूक्तका जप करते बड़ी दाढी और जटा धारण किये
सरस्वती सहित महेश्वरकी स्तुति करते ॥४०॥
इसी प्रकार अथर्वशीर्ष के मंत्रो से स्तुति करते हुए मुनिमन्डल और गंगादि नदियोंसे युक्त नीलवर्ण सागर ॥४१॥
श्वेताश्वतर के मंत्रोसे शिवजीको स्तुति करते कैलास पर्वतके समान अनन्तादि महानाग ॥४२॥
रत्नोंसे विभूषित कैवल्य उपनिषद् पाठ करनेहारे स्तुति कर रहे है और सुवर्णकी छड़ी हाथमें लिये नंदीके आगे स्थित हुए
॥४३॥