सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)

Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary

भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished44 पृष्ठ

३. अध्याय ९-१२: विश्वरूप दर्शन, शिव-माहात्म्य व भक्ति-योग

सर्वव्यापक सच्चिदानन्दस्वरूप रूपरहित उत्पत्तिशून्य आश्रय युक्त मुझ ब्रह्मरूपको शुद्ध स्फटिक मणिकी समान शरीर
और अर्धांगमे पार्वतीको धारण किये ॥२८॥
व्याघ्रचर्म ओढे, नीलकंठ, त्रिलोचन, जटाजूट धारण किये चन्द्रमा शिरपर धरे, नागोंका यज्ञोपवीत पहरे ॥२९॥
व्याघ्रचर्मकाही उत्तरीय (डुपट्टा) ओढे, सर्वश्रेष्ठ भक्तोंके अभयदाता, पीठकी ओरके ऊँचे दोनों हाथोंमें मृग और परशु
धारण किये, सब अंग में विभूति लगाये, तथा सम्पूर्ण आभूषणोंसे भूषित ॥३०॥
इस प्रकारसे आत्माकी अरणी और प्रणवको उत्तर अरणी करके उसका मथन करता हुआ मेरा ऊपर कहे अनुसार ध्यान
करे तौ यह मेरा साक्षात्कार पाता है, जब यज्ञको करते है तब अग्निके निमित्त खैर वा शमीकी दो लकडी ले ऊपर
नीचे रख अग्निके निमित्त उसे मथते है ॥३१॥
वेदवचन और शास्त्रोंके वचनसे मुझे कोई नही पा सकता परन्तु जो एकाग्रचित्तसे सदैव मेरा ध्यान करता है, मै उसे
प्राप्त होता हूँ और उसे फिर त्याग नही करता ॥३२॥
जो पापसे पराङ्मुख नही जिसकी तृष्णा शान्त नही श्रवण मनन निदिध्यासनसे जिसका मन समाधान नही है जिसका
मन चंचल है ऐसी पुरुष केवल शास्त्रके अध्ययनसे मुझे प्राप्त नही कर सकता ॥३३॥
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाका प्रपंच जिस साक्षीरूप अधिष्ठान ब्रह्मस्वरूपके द्वारा प्रकाशित होता है,
वह ब्रह्म मैं हूँ, ऐसी यथार्थ जाननेसे यह सम्पूर्ण बंधनोंसे मुक्त हो जाता है ॥३४॥
तीनों अवस्थामें जो भोग पदार्थ जो भोक्ता और जो भोग्य वस्तु है, यह तीनों ब्रह्मकी ही सत्तासे कल्पित है, इनका
प्रकाशक गति करनेहारा सदाशिव मै ही हूँ ॥३५॥
इस प्रकार निर्गुण कथन कर अब फिर मद अधिकारियोंको सगुणरूप का उपदेश करते है, मध्याहनकालके करोडों सूर्यकी
समान तेजयुक्तँ और करोडों चन्द्रमाकी समान शीतल सूर्य चंद्रमा अग्नि जिसके नेत्र है उनके मुखकमलका स्मरण करे
॥३६॥
एक ही परमात्मा सम्पूर्ण भूतोंमे गुप्त है, सर्वव्यापी और सब भूतोंका अन्तरात्मा है, सबका अध्यक्ष और सब भूतोंमें
निवास करनेवाला सबको साक्षी चित्तकी प्रेरणा करनेवाला निर्लेप और निर्गुण है ॥३७॥
स्वाधिक सब भूतोंका आत्मा वह एकही देव है, मायारूप प्रपंचका बीज प्रगट करता है, वह पुरुष मै ही हूँ मुझको जो
धीर पुरुष शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे साक्षात्कार करते है उन्हीको निरन्तर शान्ति और कैवल्य मुक्ति होती है,
दूसरों को नही ॥३८॥
जिस प्रकार से एक ही अग्नि सब संसारमें प्रविष्ट होकर उन काष्ठ लोह आदिमें सीधे टेढे चतुष्कोण आदिरूपसे उसी
वस्तुके आकारसी हो ही है, इसी प्रकार सबका अन्तरात्मा एकही है, और शरीरमें प्राप्त होनेसे उसीके आकारसा प्रतीत
होता है, यद्यपि उपाधिके वशीभूत होनेसे भिन्न २ प्रकार का प्रतीत होता है, तथापि सर्व लोकके दुःख से वह दुःखी
और सुखसे सुखी नही होता ॥३९॥
जो विद्वान ज्ञानी मुझको सर्वान्तर्यामी महान व्यापक स्वप्रकाश, मायासे रहित आत्मस्वरूप जानता है, वही संसार
बंधनसे मुक्त होता है, इसके सिवाय मुक्तिके प्राप्त होने का दूसरा उपाय नही है, तथा च श्रुति (वेदाहमेतं पुरुषं
महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात ॥ तमेव विदित्वातिमृत्युनेति नान्यः पंथा विद्यतेयनाय ) ॥४०॥
प्रथम सृष्टिके आरंभ में मै ब्रह्माको उत्पन्न करके उसके निमित्त वेद को उपदेश करना वही स्तुतिके योग्य पुराण पुरुष
मै हूँ, जो इस निश्चयसे मुझे जानते है, वे मृत्यु के मुखसे छूट जाते हैं तथा च श्रुतिः (या वै ब्रह्माणं विदधौति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै) इत्यादि श्रुतिमें प्रसिद्ध हैं ॥४१॥
इस प्रकार शान्ति आदि गुणोंसे युक्त हो जो मुझको तत्त्वसे जानता है वह दुःखोंसे छूटकर अन्तमें मुझको प्राप्त हो
जाता है ॥४२॥
इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे शिवराघवसंवादे उपासनाज्ञानफलं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥
१२॥


अध्याय १३
सूतजी बोले, बुद्धिमानोंमे श्रेष्ठ रघुनाथजी इस प्रकार श्रवण करके प्रसन्न हो गिरिजापतिसे मुक्तिका लक्षण पूछने लगे
॥१॥

श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचन्द्र बोले- हे कृपासागर भगवन् ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होकर मुक्ति का स्वरूप और लक्षण वर्णन कीजिये ॥२॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान बोले, हे राम! सालोक्य, सारूप्य, सार्ष्ट्य सायुज्य और कैवल्य यह मुक्तिके पांच भेद है ॥३॥
जो कामना रहित अज्ञानसे हीन होकर मूर्तिमें मेरा पूजन करते है वह मेरे लोकको प्राप्त होकर सालोक्य मुक्ति को प्राप्त होते है और अनेक प्रकार के इच्छित भोग भोगते है ॥४॥
और जो मेरा स्वरूप जानकर निष्काम बुद्धिसे मेरा भजन करता है वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होकर अनेक प्रकारके अभिलाषित भोगोंको भोगता है इसे सारूप्य मुक्ति कहते है ॥५॥
जो पुरुष मेरी प्रीतिके निमित्त इष्टपूर्तादिकर्मोंको करता है वह भी उसी फलको प्राप्त होता है इसमें संशय नही ॥६॥
जो कर्ता जो भोजन करता और जो अग्निमें हवन करता है जो देखता है और जो कुछ तपस्या आदि करता है, वह सब मेरे ही अर्पण करता है, वह मेरे लोक की सब लक्ष्मी जगत् के कर्तापन आदिसे व्यतिरिक्त सब दिव्य संपत्ति भोगता है, इसे सार्ष्ट्य मुक्ति कहते है ॥७॥
जो शान्ति आदि साधनसे युक्त होकर श्रवण मनन निदिध्यासनपूर्वक मुझेही आत्मारूप जानता है वह अद्वैत स्वप्रकाश ब्रह्मके तद्रूपको प्राप्त होता है, जो जीवका यथार्थ स्वरूप है इस स्वरूपसे अवस्थान करने का नाम सायुज्यमुक्ति है ॥८॥९॥
सत्य ज्ञान अनंत आनंद इत्यादि लक्षण युक्त और सब धर्मरहित मन और वाणीसे परे ॥१०॥
सजातीय और विजातीय पदार्थोंके उसमें न होनेसे इस ब्रह्मको अद्वैत कहते है ॥११॥
हे राम! यह जो शुद्ध स्वरूप का वर्णन किया है; इसे आत्मरूप जानकर सम्पूर्ण स्थावर जंगम जगतको मेरे ही रूपमें देखता है ॥१२॥
जिस प्रकार आकाशमें गन्धर्वनगर नही है और उसकी मिथ्या प्रतीति होती है इसी प्रकारसे यह अनादि अविद्यासे उत्पन्न हुआ जगत् मुझमें कल्पना किया जाता है, वास्तविक मिथ्या है ॥१३॥
जिस समय मेरे स्वरूपके ज्ञानसे अविद्या नष्ट हो जाती है तब मन वाणीसे परे एक म ही विद्यमान रहता हूँ ॥१४॥
मै नित्य परमानन्द स्वप्रकाश और चिदात्मा हूँ, काल दिशा विदिशा पंचभूत इस स्वरूपमें कुछ नही है, मेरे सिवाय दूसरी कोई वस्तू नही है, मै केवल एकही विद्यमान रहता हूँ ॥१५॥
मेरे निर्गुण स्वरूप कोईनील पीतादि आकार और वर्णका नही है और इन चर्मचक्षुसे भी कोई मुझे देखनेको समर्थ नही हो सकता, जो कोई हृदयमें बुद्धिसे मेरे स्वरूपको जानते है, वे ही ज्ञान मुक्त हो जाते है ॥१६॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचन्द्रजी बोले, हे भगवन!! ! मनुष्योंको शुद्ध ज्ञान किस प्रकारसे होता है, हे शंकर! जो आपकी कृपा मेरे ऊपर है तो इसका उपाय वर्णन कीजिये ॥१७॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान बोले, ब्रह्मलोकपर्यन्त दिव्य देहको भी नाशवत समझकर भार्या, मित्र, पुत्रादि इन सबको क्लेशदाता और अनित्य समझकर इनसे चित्तकी वृत्ति पृथक करे ॥१८॥
और श्रद्धापूर्वक ज्ञान प्राप्त होने के निमित्त मोक्षशास्त्र वेदांतमें निष्ठाशील होकर उसी के जाननेका उपाय करता हुआ ब्रह्मवेत्ता गुरुके निकट जाय ॥१९॥
उस गुरुके आगे अपने हाथमें लाया हुआ पदार्थ रखेके दंडवत नमस्कार करे फिर उठके हाथ जोड़के इच्छित अर्थका निवेदन करे ॥२०॥
बहुत कालतक सावधान हो इन्हे सेवासे संतुष्ट करे और मन लगाकर सब वेदान्तके वाक्योंका अर्थ श्रवण करे ॥२१॥
और सम्पूर्ण वेदान्तके वाक्यों का तात्पर्यभी निश्चय करले (यह नही कि अहं ब्रह्म करता फिरे) इसका नाम ब्रह्मवादियोंने श्रवण कहा है ॥२२॥

लोहमणी आदिके दृष्टान्त सदुक्तिसे जैसे कि, चुम्बककी शक्तिसे लोहा भ्रमण करता है, इसी प्रकार ब्रह्मकी सत्तासे
जगत् भ्रमण करता है श्रवणकौँ पुष्ट करके मनन करें अर्थात् उसका चिन्तन करे वाक्यार्थके विचारका ही नाम मनन
कहा है ॥२३॥
ममता और अहंकार रहित सबमें समान संगवर्जित शांति आदि साधन सम्पन्न होकर निरन्तर ध्यानयोगसे आत्माका
आत्मासेही ध्यान करनेको निदिध्यासन कहते है ॥२४॥
सम्पूर्ण कर्मके क्षय हो जानेसे जो आत्मा का साक्षात्कार है, किसी को शीघ्र और किसीको चिरकालमें होता है जिसे
प्रतिबेधक नही होता उसे शीघ्र और जिसे प्रतिबंधक होते है उसे देरमें होता है ॥२५॥
जो कुछ जीवके किये हुए और करोडों जन्मसंग्रह किये कर्म है वह ज्ञानसे ही नष्ट होते है, कर्म चाहे दशसहस्त्र
करोडँनसे नष्ट नही होते ॥२६॥
ज्ञान होने पर जो कुछ पुण्य वा पाप थोडा या बहुत किया जाता है, उससे यह प्राणी लिप्त नही होता ॥२७॥
और जो इस प्राणीके शरीर निर्माणका हेतु प्रारब्धका कर्म है, वह भोगनेसे ही नष्ट होगा, ज्ञानसे नही ॥२८॥
जिसको मो अहंकार नही है, जो सम्पूर्ण संगसे रहित है, सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मामें और सम्पूर्ण प्राणियों में जो
आत्माको देखता है इस प्रकार ज्ञानयुक्त विचरता हुआ प्राणी जीवन्मुक्त कहाता है, कारण कि वेह प्रारब्ध कर्मक्षयके
निमित्त विचरता है ॥२९॥
सांपकी केंचली सर्पसहित जिस प्रकार देखनेवालोको भय देती है और सर्पके शरीरसे छुटने पर कुछ भी भय नही देती,
इसी प्रकार मायामुक्त आत्माके होनेसे अनेक प्रकारसे संसार भय प्रतीत होते है, वहीं जीवन्मुक्त होने से फिर कही
किसी प्रकारसे भयभीत नही होता ॥३०॥
जिस समय इस प्राणीके हृदयकी वासना संपूर्ण नष्ट हो जाती है और वैराग्य प्राप्त होता है, तभीयह प्राणी अमृत हो
जाता है, यही वेदान्तशास्त्रकी मुख्य शिक्षा है ॥३१॥
जिस प्रकार कैलास वैकंठ आदि दिव्यलोक है, इस प्रकार मोक्ष कोई लोक नही है, मुक्त किसी ग्रामान्तरका निवासी
नही होता, केवल हृदयँकी अज्ञानग्रन्थिके नष्ट हो जानेसे मुक्त होता है ॥३२॥
जिसका वृक्ष अग्रभागसे चरण आगे पडता है वह उसी समय नीचे गिरता है, इसी प्रकार ज्ञानी पुरुषोंको ज्ञान होते ही
मुक्तिकी प्राप्ति हो जाती है, इस संसारसे वह तत्काल छूट जाता है ॥३३॥
जीवन्मुक्त पुरुष तीर्थमें वा चाण्डालके घरमे देह त्यागन करे अथवा ब्रह्मका चिन्तन करता हुआ देहका त्यागने करे
किंवा अचेतनँ होकर मृतक हो जाय, वह ज्ञानके बलसे मुक्तही हो जाता है ॥३४॥
जीवन्मुक्त किसी प्रकारके वस्त्र धारण करे, वा नग्न, भक्ष्य अथवा अभक्ष्य कुछभी खाय चाहे जहां शयन करे वह
प्रारब्धँकर्मके क्षय हो जानेसे मुक्त हो जाता है ॥३५॥
जिस प्रकार दुधमें से निकाला हुआ घृत यदि फिर दूधमें डालो वह घृत उसमें नही मिलता उसी प्रकार ज्ञानवान संसारसे
विरक्त होकर फिर जगतमें आसक्तँ होता नही ॥३६॥
हे रामचन्द्र! जो इस अध्यायको नित्य पढते और सुनते है वह अनायास देहबंधनसे छूट जाते है ॥३७॥
हे राम! तुम्हारा अन्तःकरण जो संशयके वश हो रहा है इस कारण तुम नित्य इस अध्याय का पाठ करो इससे
अनायास तुम्हारी मुक्ति हो जायेगी ॥३८॥
इति श्रीपद्मपुराणे शिवगीतासूपनिषत्सु० शिवराघवसंवादे त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥



अध्याय १४
श्रीराम उवाच ।
शिवजीसे ब्रह्मसाक्षात्कारकी विधि सुनकर अब दूसरे साधनोंसे प्रश्न करते हुए, रामचन्द्रजी बोले- हे भगवन् ! यद्यपि
तुम्हारा रूप सच्चिदानंदात्मक निरर्वयव क्रियाशून्ये और निर्दोष है ॥१॥
तथा सब धर्मोसे परे मन और वाणीके अगोचर तुमको सर्वव्यापक होनेसे जीव सर्वस्थानमें स्थित आत्मा स्वरूपसे देखता

है ॥२॥
आत्मविद्या और तपही जिसका मूल साधन है, जो उपनिषदोंका मुख्य तात्पर्य है, जो मूर्तिरहित सम्पूर्ण भूतोंका
आत्मा अर्थात् सब जीव जिसके अंश हैं, जो कारण का कारण अदृश्य स्वरूप है ॥३॥
जो अतिसूक्ष्म और इन्द्रियोंसे अग्राह्य है वह ब्रह्म ग्राह्य कैसे हो सकता है, उस सूक्ष्ममे चित्तकी वृत्ति किस प्रकार
हो सकती है, यह मुझे संदेह है इसी से बुद्धि व्यग्र है इसका उपाय आप वर्णन कीजिये ॥४॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीशिवजी बोले- हे महाभुज रामचन्द्र! सुनो मै इस विषयमें उपाय कहता हूँ प्रथम सगुण उपासना करते २ चित्त को
एकाग्र करे और स्थूलसौरौंभिकान्यायसे निर्गुण स्वरूपमें चित्तकी वृत्ति प्रवृत्ते करे, स्थूलसौरौंभिकान्याय इसको कहते
हैं कि, प्रियमनुष्यको जिस प्रकार मृगजलं दिखाकर रवि यथार्थ जल है ऐसा प्रतारणासे बुलाकर फिर वास्तविक जल
दिखाते है, इसी प्रकार प्राणीको प्रथम साधनादि का उपदेश कर पीछे ब्रह्मज्ञान कथन करते है ॥५॥
और इस प्रकार जाने कि इस अन्नके पिंड स्थूल देह में जन्म मृत्यु व्याधि यही दृढतासे विद्यमान है, अर्थात्
निश्चयही इसकी दशा बदलती रहती है ॥६॥
ऐसे स्थूल देहमें प्राणोको अहंभावसे जो आत्मबुद्धि दृढ हो जाती है वह नही मिटती, आत्मा कभी जन्म नही लेता और
इसका नाश भी नही होता कारण कि यह नित्यै है ॥७॥
अब शरीरकी अवस्था वर्णन करते इसकी निस्सारता प्रतिपादन करते है । उत्पत्ति (होना) अस्ति, परिपक्वता, वृद्धि,
क्षय और नाश यह छः अवस्था इस शरीर की है ॥८॥
और घटमे स्थित आकाश जिस प्रकार निर्विकार है, इसी प्रकार इस देहमें आत्मा विकार रहित है, इस प्रकार देह और
आत्मा इन दोनोंके धर्म परस्पर विरुद्ध हैं, अज्ञानी जन अविद्यासे देहको आत्मा मानते हैं, और ज्ञानी देहसे आत्मा को
पृथक् देखते है ॥९॥
घड़ियामें गला करके डाले सुवर्णकी कान्तिके समान प्राणमय कोश है, यह स्थूल देह के अन्तर प्राणादि वायुसे बद्ध
वर्तमान है, परन्तु पाय्वादि इन्द्रियोंसे युक्त चलनादि कर्मोंसे युक्त क्षुधापिपासासे व्याप्त और जड होने के कारण यह
आत्मा नही है ॥१०॥११॥
आत्मा चैतन्यरूप है जिसके द्वारा यह जीव अपने शरीरको देखता है आत्माही परब्रह्म निर्लेप और सुखका सागर है ॥
१२॥
अज्ञान इस ब्रह्मका ग्रास नही कर सकता, न ब्रह्म किसी वस्तुका ग्रास करता है अर्थात् वह अनामय परिपुर्ण सर्वत्र
सुखस्वरूप है, उसे कार्य कारण की अपेक्षा नही है, उस प्राणमय कोशके अन्तर्गत मनोमयकोश है, वह संकल्प
विकल्परूप बुद्धि और इंद्रियोंसे समायुक्त है ॥१३॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह मात्सर्य और मद यह शत्रुओंका षड्वर्ग और ममता इच्छादिक यह सम्पूर्ण मनोमयकोशके
धर्म है ॥१४॥
जो कर्मविषयीणी बुद्धि और वेदशास्त्र से निश्चित की गई है, वह ज्ञान इन्द्रियोके सहित विज्ञानमय कोशमें स्थित रहती
है ॥१५॥
इसमें कर्तृत्वपनका अभिमानी निःसन्देह वह जीव विद्यमान है । जो इस लोक तथा परलोकमें गमन करता है,
व्यवहारमें जिसको जीव कहते है ॥१६॥
आकाशादिके सात्त्विक अंशसे ज्ञानेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होता है, आकाशसे श्रोत्र, पृथ्वीसे घ्राण, जलसे जिह्वा, और
तेजसे चक्षु और वायुसे त्वचा उत्पन्न होती है इस प्रकार यह इन्द्रिय पांचभौतिक है, जीवत्वप्राप्तिके तीन शरीर है,
स्थूल, सूक्ष्म और कारण, स्थूल का अन्त सूक्ष्म और सूक्ष्मका अन्तः कारणशरीर है, सूक्ष्म शरीरकोही लिंग शरीर
कहते है, इन तीनों शरीरोंमे पाँचकोश रहते हैं, अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय, स्थूल
शरीरमें अन्नमय कोश है, सूक्ष्म शरीरमें आनंदमय कोश है, इन पांचो कोशोंमें अन्नमयकोशसे वर्णन करके लिंग
शरीरके तीनों कोश कहकर लिंगशरीरके अवयवोंका वर्णन किया है ॥१७॥१८॥
इन पांचभूतोंके सात्विकादि अंशसे बुद्धि और मन उत्पन्न होते है, जिसमें बुद्धि निश्चयात्मिका और मन संशयात्मक है
और वचन हाथ, पाद, पायु, उपस्थ यह पांच कर्मेन्द्रिय तो आकाशादिकोंकें रजोगुण अंशसे क्रमपूर्वक उत्पन्न होते है
॥१९॥
और उन सबके रजोगुण समान मिलनेसे पांच प्राणादि वायु उत्पन्न होते है, यही पांच ज्ञानेन्द्रिय, पांच कर्मेन्द्रिय,
पांच प्राण, मन और बुद्धि मिलाकर सत्रह अवयवोंसे लिंग शरीरकी उत्पत्ति होती है ॥२०॥
यह लिंगशरीर तपाये हुए लोहखण्डकी समान गोल है, इस कारण परस्परके अध्यास पड़नेसे साक्षी चैतन्यसे युक्त है ॥
२१॥

जहा साक्षी चैतन्य लिंग शरीरसे अध्यासको प्राप्त होता है, वही आनंदमयकोश है, उस आनंदमयकोशका जो
कर्तृत्वपनका अभिमानी है, वही उपासना और कर्म फलसे इस लोक तथा परलोकमें कर्मफलका भोगनेवाला कहा जाता
है ॥२२॥
और जिस समय निद्रावस्थामें यही आत्मा लिंगशरीरके अध्यासको छोड़कर केवल अपने स्वरूपमें अविद्यासंयुक्त रहता
है, तब इसकी साक्षी संज्ञा है ॥२३॥
अन्तःकरणादि इन्द्रिय और इनकी वृत्ति अनुभव और स्मृति इनका द्रष्टा होनेसे अन्तःकरणका अध्यास होनेपर
आत्माको साक्षित्व और केवल (अन्तःकरणके अध्यास नहीं ऐसा) हुआ तब भोक्तृत्व होता है ॥२४॥
इसके उपरान्त "ऋत पिबतौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च
त्रिणाचिकेताः' इस श्रुतिको कहते है, आतप बिना आच्छादित बिंबरूप ईश्वर छाया- आच्छादित बिंबरूप जीव यह दोनो
ब्रह्मए प्रकाशसे प्रकाशित है, इन दोनोंमें एकजीव भोक्ता होनेसे कर्मफलको भोक्ता है और ईश्वर द्रष्टा होनेसे भुगाता
है ॥२५॥
क्षेत्रज्ञ जीवात्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको सारथी, मनको लगाम कहते है सो तू जाना ॥२६॥
इन्द्रियोको घोड़े स्वरूप जानना और यह इन्द्रियरूपी अश्व रूपादिविषयीरूपी स्थानमें विचरते है, इन्द्रिय और मनके
सहित यह आत्मा भोक्ता कहाता है वास्तवमें उपाधि बिना यह आत्मा शुद्ध है कदाचित कर्तृत्व भोक्तृत्वको प्राप्त नही
होता, तात्पर्य यही है कि रथी तो रथ में बैठा है, सारथी और घोड़े रथ को जिधर ले जाय उधर ही जाता है और यदि
दुष्ट घोड़े हुए तो सारथी का भी कहना न मानकर रथ लेकर कही गढे में डाल देते है, इसी प्रकार दुष्ट इन्द्रिये इस
शरीररूपी रथको विषयोंमें लेजाकर पटकती है, तब सब इन्द्रियोंके सहित आत्मा दुःखी प्रतीत होता है ॥२७॥
इस प्रकारसे जो ब्राह्मण शान्ति आदिसे युक्त होकर उपासना करता है वह जिस प्रकारसे कदलीके वल्कलको बराबर
उतारते चले जाओ तो उसमें वल्कलही निकलते है पश्चात सार प्राप्त होता है, इसी प्रकार पंचकोशमें क्रम से उपासना
करते और उनसे चित्त हटाते तथा उन्हे असाररूप जानते हुए सबके अन्तःसारभूत आत्मा को प्राप्त होता है ॥२८॥२९॥
इस प्रकार मन को सावधान करके पंचकोश का ज्ञान करके जो मन स्थिर करता है, तब उसका चित्त निराकार
परमात्मामें लग जाता है ॥३०॥
तब यह मन केवल परमात्माको ही ग्रहण करता है जो केवल अदृश्य, अग्राह्य, स्थूल सूक्ष्मादि धर्म से परे है, उसमें
प्राप्त होकर निश्चल हो जाता है, फिर चलायमान नही होता ॥३१॥
श्रीराम उवाच ॥
श्रीरामचन्द्र बोल-हे भगवन्! जब श्रवणादि साधनद्वारा आत्मस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है तो वेदशास्त्रके जाननेवाले
यज्ञशील सत्यवादी उसके श्रवण करनेमें प्रवृत्त क्यों नही होते ॥३२॥
और कोई सुनकर भी आत्माको जान नही सकते, और कोई जानकर भी मिथ्या मानते है, क्या यह तुम्हारी माया है
॥३३॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीशिवजी बोले, हे महाबाहो! यह ऐसेही है इसमें कुछ सन्देह नही, मेरी त्रिगुणात्मिका मायाका उल्लंघन करना महा
कठिन है ॥३४॥
जो मेरी शरणागत आकर मुझको प्राप्त हो जाते है वे ही इस माया को तरते है, हे महाभुज! जो अभ्यभक्त है और
जिनकी श्रद्धा मेरे विषय नहीं है ॥३५॥
वे इस लोक और परलोकमें अनेक प्रकारके फलकी इच्छा करनेवाले है उनको कर्मानुसार फल मिलता है वे सुख भोगकर
भी थोड़े कालमें इस लोक में प्राप्त होते है, कारण कि, उन्हे तो कर्मफलही इष्ट है और कर्मफल क्षय होनेवाला है तथा
थोडा और ऐसे लोकोंमें उन फलोंको भोगते है जहां जहां अल्पसुख है और शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥३६॥
इस बातको न जानकर जो अधम मनुष्य कर्मों को करते है, वे माताके गर्भमें उत्पन्न होकर बारंबार मृत्यु मुखमें पडते
है ॥३७॥
अनेक प्रकार की योनियोंमें उत्पन्न हुए किसी एक प्राणीकी करोडों जन्मके संचित किये पुण्यसे मेरे विषे भक्ति होती है
॥३८॥
वही श्रद्धायुक्त मेरा भक्त ज्ञान को प्राप्त होता है और दूसरा करोडों जन्मभी कर्म करनेसे मुझे प्राप्त नही होता ॥३९॥
इस कारण हे राम! और सब त्यागकर केवल मेरी भक्ति करो । दुसरे और सब धर्मोका त्यागन करके एक मेरी शरणमें
हो मै तुमको सब पापोसे छुड़ाकर मुक्त कर दूँगा तुम सोच कुछ मंत करो ॥४०॥

हे राम! तुम कुछ कर्म करते जो भोजन करते जो हवन करते और जो देते हो तथा जो तप करते हो वह सब मेरे
अर्पण करो, हे राम ! इससे अधिक मेरेमें दृढ भक्ति होनेका दूसरा साधन नही है इसका तात्पर्य यह है कि शरीर
इन्द्रिय और प्राण तथा मनके जो जो धर्म है उनका त्याग करके मुझको आश्रित हो अर्थात् मुझे प्राप्त हो ॥४१॥४२॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीतासू० शिवराघवसंवादे पञ्चकोशोपपादनं नाम चतुर्दशोध्यायः ॥१४॥
अध्याय १५
श्रीरामचन्द्र बोले, हे भगवन! आपकी भक्ति कैसी है और वह किस प्रकार उत्पन्न होत है जिसके प्राप्त होनेसे यह
जीव निर्वाण हो जाता है ओर मुक्तपदवी प्राप्त करता है, हे शंकर ! वह आप सब वर्णन कीजिये, जिससे संसारसे
निवृत्ति प्राप्त हो ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
शिवजी बोले जो वेदाध्ययन दान यज्ञ सम्पूर्ण मेरे में अपर्णकी बुद्धिसे करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्रिय है वह इस
प्रकार है कि "आम्ता त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं पूजाते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥१॥" अर्थ यह कि,
यह शरीर शिवालय है, इसमें सच्चिदानन्द आप हो, बुद्धिरूप श्रीपार्वतीजी है, आपके साथ चलनेवाले नौकर प्राण है
और जो मै विषयान्नन्दके निमित्त खाता पिता देखता सुनता हू बोलता स्पर्श करता हूं, यही आपकी पुजा है, निद्रा
समाधि है, फिरना आपकी प्रदक्षिणा है, वचन आपकी स्तुति है, हे शिव! इस प्रकोर मै आपका आरोधन करता हूं,
आप मेरे ऊपर कृपा करो इस प्रकार आराधन करे कर्मोको ऐसे मेरे अर्पण करे ॥२॥
अग्निहोत्रकी पवित्र भस्म लाकर अथवा श्रोत्रिय ब्राह्मणके स्थानसे लाकर "अग्निरिति" भस्म इत्यादि मन्त्रोंसे यथाविधि
अभिमंत्रित कर ॥३॥
अपने शरीरमे उसे लगाकर और भस्मद्वाराही जो मेरा अर्चन करता है, हे राम! उससे अधिक मेरी भक्ति करनेवाला
दूसरा नही है ॥४॥
जो प्राणी मस्तक और कण्ठमें रूद्राक्षको धारण करता है और (नमः शिवाय) इस पंचाक्षरी विद्याका जप करता है वह
मेरा भक्त है और मुझे प्यारा है ॥५॥
भस्म लगानेवाला, भस्मपर शयन करनेवाला, सदा जितेन्द्रिय जो सदा रुद्रसूक्त जपता और अनन्य बुद्धिसे मेरा
चिन्तन करता है ॥६॥
वह उसी देहसे शिवस्वरूप हो जाता है, जो रुद्रसूक्त वा अथर्वशीर्ष मन्त्रोका जप करता है ॥७॥
कैवल्योपनिषद् वा श्वेताश्वतर उपनिषद्का जो जप करता है उससे अधिक मेरा दूसरा भक्त इस लोकमें नही है ॥८॥
धर्मसे विलक्षण, अधर्मसे विलक्षण, कार्य और कारणसे भी परे भूत और भविष्यकालसे भी परे जिसको मै कहता हूं,
सो तू सुन ॥९॥
जिस वस्तुको वेद और सब शास्त्र वर्णन करते है जो सम्पूर्ण उपनिषदोंमे से सारग्रहण किया है जैसे दहीमें से घृत ॥
१०॥
जिसकी इच्छा करके मुनिजन ब्रह्मचर्य धारण करते है, वह अकार उकार मकारात्मक हमारा पद है, सो मै तुझसे
संक्षेपसे वर्णन करता हूँ ॥११॥
यही अक्षर परब्रह्म और सगुणब्रह्म, निर्गुणब्रह्म है, इसी अक्षर ब्रह्मके जाननेसे ब्रह्मलोकको प्राप्त होकर मुक्त हो
जाता है ॥१२॥
यही उत्तम आधार हैयही उत्तम तारक है इसको जानके ब्रह्म लोकमें पूजित होता है ॥१३॥
जो वेदरूपी धेनुओंमें श्रेष्ठ है ऐसा वेदान्त प्रतिपादन करता है यही मोक्षका धारण करनेवाला और संसारसागर का सेतु है
तथा च श्रुतिः "यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपश्छन्दोभ्योऽध्यमृतात्संबभूव" इति नै० ॥१४॥
वह वस्तु क्या है अब उसका वर्णन करते है वह मेदसे आच्छादित हुए कोश अर्थात् हृदयाकाशमें जो ब्रह्म है उसे ओंकार

कहते है । यही परम मंत्र है और इसीमें सब लोक निवास करते है, तथा च श्रुतिः "सोअयमात्माऽध्यक्षरमोंकारोधिमत्रं
पादमात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकारः" इति माण्डू०। "ओमिति ब्रह्म । ओमितिदं सर्वम् ।" अर्थात् यह ओंकारही
ब्रह्म और सब कुछ है ॥१५॥
उसकी चार मात्रा है अकार उकार और मकार और अन्तकी कारणरूप आधी मात्रा है पहली अकाररूप मात्रामें भूलोक
ऋग्वेद, ब्रह्मदेव, आठ वसु, गार्हपत्य अग्नि, गायत्री छन्द और प्रातः सेवन यह आठ देव निवास करते है ॥१६॥
दूसरी उकार मात्रामें भुवर्लोक, विष्णु, रुद्र, अनुष्टुप् छन्द, यजुर्वेद, यमुनानदी, दक्षिणाग्नि, माध्यंदिन सवन यह
दैवता निवास करते हैं ॥१७॥
तीसरी प्रकार मात्रा मे स्वर्लोक, सामवेद, आदित्य, महेश्वर, आहवनीयग्नि, जगती छन्द और सरस्वती नदी ॥१८॥
और अथर्ववेद तृतीयसवन यह वास करते है और जो चौथी मात्रा है वह सोमलोक ॥१९॥
अथर्वांगिरस गाथा संवर्तक अग्नि महर्लोक, विराट्, सभ्य और आवसथ्य अग्नि, शतद्रौनदी और यज्ञपुच्छ यह देवता
निवास करते है "अमात्रश्चतुर्थो व्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आँत्मैव संविशत्यात्मनोऽात्मान् य एवं
वेद य एवं वेद" अर्थात् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीन अवस्थासे परे अमात्रिक तुरीया अवस्थारूप आत्मा ही है, यह
वाचकवाच्यरूप वाणी मनका मूल अज्ञान दूर करनेसे व्यवहारके अयोग्य है, तथा प्रपंचरहित शिवस्वरूप और अद्वैत है
। यह उच्चारण किया हुआ ॐकार आत्मा ही है ऐसे जो जानता है वह अपने आत्मासे परमार्थरूप आत्मामें प्रवेश करता
है, और जन्मके कारणोंका लय कर फिर उत्पन्न नही होता ॥२०॥
पहली मात्रा रक्तवर्ण, दूसरी भास्वर (प्रकाशयुक्त) वर्ण, तीसरी बिजलीके वर्णकी तथा चौथी मात्र शुभ वर्ण है ॥२१॥
जो कुछ उत्पन्न हुआ है और जो कुछ उत्पन्न होगा स्थावर जंगमात्मक अनेक प्रकारका यह जगत ॐकारमें ही
प्रतिष्ठित है ॥२२॥
भूत भविष्यरूप यह संसार रुद्ररूप ही है और रुद्रमें प्राण और उसमें भी ॐकार स्थित है, तात्पर्य यह है शिव और
ॐकार एकस्वरूप है ॥२३॥
वह शिवरूप सनातन ब्रह्म ॐकारने ही वर्तमान है इस कारण ॐकारका जपनेहारा निःसन्देह मुक्त हो जाता है ॥२४॥
श्रौत अग्निसे अथवा स्मार्त अग्निसे अथवा शैवाग्निसे उत्पन्न हुई भस्मको जो ॐकार से अभिमंत्रित करके ॐकारद्वारा
जो मेरा पूजन करता है, उससे अधिक संसारमें मेरा दूसरा प्रियभक्त नही है ॥२५॥
घरकी अग्नि अथवा वनकी अग्निकी भस्मको ॐकार से अभिमंत्रित करके जो अपने शरीरमें लगावे वह शुद्धभी मुक्तिको
प्राप्त हो जाता है ॥२६॥
दर्भांकुर, बिल्वपत्र तथा और भी वनके पर्वतके उत्पन्न हुए फूलोंसे ॐकार द्वारा जो मेरी नित्य पूजा करता है वह मेरा
प्रिय है ॥२७॥
पुष्प, फल, मूल, पत्र किंवा जलसे जो ओंकारयुक्त मेरे निमित्त दान करता है, वह करोड गुना हो जाता है ॥२८॥
किसी प्राणिमात्रकि हिंसा न करनी, सत्य बोलना, चोरी न करनी, बाह्याभ्यंतर शौचयुक्त, इन्द्रियनिग्रह करनेवाले,
वेदाध्ययनमें तत्पर जो मेरे भक्त है वे मेरे प्यारे है ॥२९॥
जो कोई प्रदोषके समय मेरे स्थानमें जाकर मेरी पूजा करता है, वह अत्यन्त लक्ष्मीको प्राप्त होता है, और अन्तमें
मुझमें लय होजाता है ॥३०॥
अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावास्या इन तिथियोंमें जो सर्वांगमें भस्म लगाकर रात्रिके समय मेरा पूजन करता है
वह मेरा भक्त और प्रिय है ॥३१॥
जो एकादशीके दिन व्रत रहकर प्रदोषके समय मेरा पूजन करता है और विशेष करके जो सोमवारके दिन मेरी पूजन
करता है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है ॥३२॥
जो पंचामृत, पंचगव्य, पुष्प, सुगन्धयुक्त जल अथवा कुशके जलसे मुझे स्नान कराता है उससे अधिक मेरा कोई
प्रिय नही है ॥३३॥
दूध, घृत, मधु, इक्षुरस (गन्नेका रस) पक्के आमके फल अथवा नारियलके जलसे ॥३४॥
अथवा जो गंधयुक्त जलसे रुद्रमंत्र उच्चारण करता हुआ मेरा अभिषेक करता है उससे अधिक प्यारा दूसरा मुझे नही है
॥३५॥
और जो जलमे स्थित हो सूर्यकी ओर मुख किये ऊपरको बाहें उठाये सूर्यके बिंबमें मेरा ध्यान करता हुआ अथर्वांगिरसका
जप करता है वह इस प्रकार मेरे शरीरमें प्रवेश करता है, जैसे गृहपति घरमें प्रवेश करता है और बृहद्रथन्तर वामदेव

और देवव्रत सामको ॥३६॥३७॥
तथा योग आज्यदोह मन्त्रोंका जो मेरे आगे गान करता है वह इस लोकमें परम सुखको भोगकर अन्तमें मेरे स्थानको
प्राप्त होता है ॥३८॥
अथवा जो ईशावास्यादि मंत्रोको सावधान हो मेरे सन्मुख जप करता है वह मेरी सायुज्य मुक्तिको प्राप्त हो मेरे लोकमें
अक्षय सुख भोग करता है ॥३९॥
हे रघुनाथजी! यह मैने भक्तियोग तुम्हारे प्रति वर्णन किया यह मनुष्योंको सब कामनाका देनेहारा है अब और क्या
सुननेकी इच्छा करते हो ॥४०॥
इति श्रीपद्मपुराणे उपरिभागे शिवगीता सू० शिवराघवसंवादे भक्तियोगो नाम पंचदशोध्यायः ॥१५॥
अध्याय १६
श्रीरामचन्द्र बोले - हे भगवन् ! आपने मोक्षमार्ग सम्पूर्ण वर्णन किया अब इसका अधिकारि कहिये । इसमें मुझको बड़ा
संदेह है । आप विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ॥१॥
श्रीभगवानुवाच ।
श्रीभगवान बोले - हे राम! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, ब्रह्मचारी, गृहस्थ तथा बिना यजोपवीत हुआ
ब्राह्मण ॥२॥
वानप्रस्थ, जिसकी स्त्री मृतक होगई हो, संन्यासी, पाशुपत व्रत करनेहारे इसके अधिकारी है और बहुत कहने से क्या
है जिसके अन्तःकरणमें शिवजीके पूजनकी प्रबल भक्ति हौ ॥३॥
वही इसमें अधिकारी है और जिसका चित्त दूसरी ओर लगा हुआ है वह इसमें अधिकारी नही तथा मुर्ख अंधे बहरे मूक
शौचाचाररहित, स्नान संध्यादि विहित कर्मोसे रहित ॥४॥
अज्ञोंका उपहास करनेवाले, भक्तिहीन, विभूति रुद्राक्षधारी, पाशुपतव्रतवालोंसे द्वेष करनेवाले चिह्नधारी इनमेंसे
किसीकाभी इस शास्त्रमें अधिकार नही है ॥५॥
जो मुझसे ब्रह्मके उपदेश करनेवाले गुरुसे पाशुपतके व्रत धारण करनेवालोंसे वा विष्णुसे द्वेष करता है, उसका करोड
जन्ममें भी उद्धार नही होता, आज कैलके उन पुरुषोंको इस श्लोकके ऊपर विचार करना चाहिये, जो अज्ञानवश एक
दूसरेसे द्रोह करते है । वह सब एकही रूप है । शिव तथा विष्णुमें कोइ भी भेद नही है, भेद माननेवालोंकी गति नही
हौती इसमें प्रमाण (स ब्रह्मा स शिवः स हरिः सेंद्रः सोअक्षरः पैरमः स्वराट्) अर्थात वही परमात्मा शिव हरि इन्द्र
अक्षर परम स्वराट् है (एक रूपं बहुधा यः करोति) वही एक अनेक रूपको धारण करता है और चाहे अनेक प्रकारके
यज्ञादिककर्ममें तत्पर हो, और शिवेज्ञानसे रहित हो तो शिवकी भक्ति न होनेका कारण वह संसारसे मुक्त नही होता ॥
६॥७॥
जो वेदबाह्य धर्मोमें केवल फलकी इच्छा करके आसक्त होते है, उन्हे केवल दृष्टमात्र फलकी प्राप्ति होती है वे मोक्ष
शास्त्रके अधिकारी नही है ॥८॥
काशी, द्वारका, श्रीशैल पर्वत, व्याघ्रपुर, इन क्षेत्रोंमे शरीर त्यागनेसे इस पुरुषको मेरी कृपासे तारक ब्रह्मकी प्राप्ति
होती है ॥९॥
जिसके हाथ पैर और सम्पूर्ण इन्द्रिय, तथा मन वशमें है विद्या तप और कीर्ति विद्यमान है, वही तीर्थका फल प्राप्त
करते है विकारी मनवाले तीर्थका फल प्राप्त नही कर सकते ॥१०॥
जिस ब्राह्मणका यजोपवीत नही हुआ है उसे अधिकार है परन्तु वह वेदका उच्चारण नही कर सकता केवल माता
पिताके श्राद्धकर्ममें उच्चारण कर सकता है ॥११॥
जबतक ब्राह्मणका उपनयन नही होता, तबतक वह शूद्रकी ही समान है, नाम संकीर्तन और ध्यानमें तो सब ही
अधिकारी है ॥१२॥
शिवजीमीं तादात्म्य ध्यानसे अर्थात (शिवोऽहं इस प्रकार अन्तःकरनकी एक वृत्ति करनेसे यह प्राणी संसारके पार हो
जाता है जिस प्रकार ध्यान तप वेदाध्ययन तथा दूसरे कर्म है यह ध्यान करनेके सहस्त्र भागकी भी तो समान नही हो