शिव गीता (पद्म पुराण - राम-शिव ज्ञान संवाद सटीक)
Shiva Gita from Padma Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन घरों के जल जानेपर कुछ हानि को भी प्राप्त नही होता ॥१९॥
इसी प्रकार देहोंमें आत्मा परिपूर्ण और सनातन है देहसम्बन्धसे अनेक प्रकारका प्रतीत होता है परन्तु उनके नाश होने
पर आत्मा नष्ट नही होता, वह एकरूप है ॥२०॥
जो मारनेवाला जानता है मैने मारा जो मरनेवाला जानता है मै मरा यह दोनों न जानने से मूर्ख है, कारण कि न यह
मारता है और न वह मारा जाता है ॥२१॥
हे राम! इस कारण अतिदुःख करनेसे खेदका कारण क्या है अपना स्वरूप इस प्रकार जानकर दुःखको त्याग कर सुखी
हो ॥२२॥
श्रीरामचंद्र बोले हे मुने! जब देहको भी दुःख नही होता और परमात्मा को भी दुःख नही होता है, तो सीताके वियोग
की अग्नि मुझे कैसे भस्म करती है ॥२३॥
जो वस्तु सदा अनुभव करी जाती है तुम कहते हो कि वह नही है । हे मुनिश्रेष्ठ! फिर इस बातमें मुझे कैसा विश्वास
हो ॥२४॥
जब सुख दुःखको भोक्ता जीव नही है, तौ कौन है? जिसके द्वारा प्राणी दुःखी होता है, सुखदुःख को भोक्ता कौन है
हे मुनिश्रेष्ठ! कहिये ॥२५॥
अगस्त्य उवाच ।
अगस्त्यजी बोले शिवजी की माया कठिनतासे जानने योग्य है । जिसने जगत को मोह लिया है उस मायाको तो प्रकृति
जानो और मायावाला महेश्वरको जानो ॥२६॥
उसीके अवयवरूप जीवोंसे सम्पूर्ण जगत व्याप्त है, वह महेश्वर सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप अनन्त और सर्वव्यापी है ॥२७॥
उसीका वंश जीवलोकमें सब प्राणियों के हृदयमें स्थित हुआ है जिस प्रकार से काष्ठ के योगसे अग्निमें स्फुलिंग उठते
है इसी प्रकार जीवभी ऐसा परमात्मासे होता है ॥२८॥
यह ईश्वरांश जीव अनादिकालके कर्मबंधनपाशमें बंधे है यह अनादि वासनाओंसे युक्त है और क्षेत्रज्ञ कहलाते है ॥२९॥
मन बुद्धि चित अहंकार यह चारों अन्तःकरण के ही भेद है । इस अन्तःकरण चतुष्टयमें क्षेत्रज्ञों का प्रतिबिम्ब पडता है
॥३०॥
वही जीवपनको प्राप्त होकर कर्मफलके भोक्ता हुए है, वही जीव कर्म भोगने के स्थान देहों को प्राप्त होकर विषय
सेवन करने से सुख वा दुःख भोग करते है ॥३१॥
स्थावर जंगमके भेद से दो प्रकार का शरीर कहा जाता है ॥३२॥
वृक्ष, लता, गुल्म, यह स्थावर सूक्ष्म देह कहलाते है, और अण्डज, पक्षी, सर्प इत्यादि, स्वेदज, कृमि,
मँशकादि, जरायुज, मनुष्य गौ ओदि, यह जंगम शरीर कहलाते है ॥३३॥
कितने एक प्राणी शरीर धार के निमित्त कर्मानुसार योनियों में प्रवेश करते है और दूसरे वृक्षों का आश्रय करते है ॥३४॥
जब यह जीव विषयोंमें लिप्त होता है तब मैं सुखी हूं दुःखी हूं ऐसा मानता है, यद्यपि यह निर्लेप ज्योतिःस्वरूप है
परन्तु शिवजीकी माया से मोहित सुख दुःखका अभिमानी होती है ॥३५॥
काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य और मोह यह छः महाशत्रु अहंकार से उत्पन्न होते है ॥३६॥
यही अहंकार स्वप्न और जाग्रत अवस्था में जीवको दुःख देता है और सुषुप्तिमें सूक्ष्मरूप के होने और अहंकार के
अभाव से यह जीव शंकरता (आनन्दरूप) को प्राप्त होता है ॥३७॥
इस प्रकार यह माया में मिलने से सुख दुःखका कारण उत्पन्न करता है जिस प्रकार सूर्य की किरणों के पडने से सीपी
में चांदी भासती है इसी प्रकार शिवस्वरूप में माया से विश्व दीखता है ॥३८॥
इस कारण तत्त्वज्ञानसे तो कोई भी दुःखभागी नही है । इससे हे राम! तुम दुःखको त्याग वृथा क्यो दुःखी होते हो? ॥
३९॥
श्रीराम उवाच ।
श्रीरामचंद्र बोले, हे मुनिराज! जो तुमने मेरे सन्मुख कहा है, यह सब सत्य है तथापि भयंकर प्रारब्धदैवका दुःख मुझे
नही छोड़ता है ॥४०॥