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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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इच्छा, श्री, ज्ञान, वैराग्य, कीर्ति, ऐश्वर्य, धर्म और मोक्ष
ये ८ भग कहलाते हैं, इनकी शक्तियों से युक्त भगवान
कहलाता है ।
परिस्स्रुता हविषा भावितेन प्रसंकोचे गलिते वैमनस्कः ।
शर्वः सर्वस्य जगतो विधाताधर्ता हर्ता विश्वरूपत्वमेति ॥१५॥
अर्थः—मदिरा की हविद्वारा अर्थात् आनन्दावेशरूपी हवि-
द्वारा भावना करने से प्रसंकोच के गलित होने पर अर्थात्
जीवभाव का त्याग करके वैमनस्क उनमनी भाव को प्राप्त होता
है । और कल्याण स्वरूप सारे जगत का विधाता धर्ता और
हर्ता उसको विश्वरूप में दिखने लगता है ।
इयं महोपनिषत् त्रैपुर्या यामक्षयं परमोर्गीर्भिरीट्टे ।
एषर्ग्यजुःपरमेतच्च सामायमथर्वेयमन्या च विद्या ॥१६॥
अर्थः—यह त्रिपुरा का महोपनिषत् है, जो अक्षय और
परम है, जिसको, यहां वाणी द्वारा कहा गया है । यह ऋक्
यजुर् है और वह परंसाम है, यह ही अथर्व और अन्य विद्या
स्वरूप है ।
ॐ ह्रीमोँ ह्रीमित्युपनिषत् । वाङ्मे मनसीति शांतिः ॥ हरिःॐ तत्सत्
इति ऋग्वेदीया श्रीत्रिपुरोपनिषत् समाप्ता ॥