सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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सृण्येव सितया विश्वचर्षणिः पाशेनैव प्रतिबध्नात्यभीकाम्।
इषुभिः पंचभिर्धनुषा च विधत्यादिशक्तिररुणा विश्वजन्या ॥१३॥
अर्थः—शर्करा के अंकुश से विश्व का आकर्षण करने
वाली, पाश से क्रूरता का दमन करती है पांचबाणों से और
धनुष से वहं विश्व जननी आदि शक्ति अरुणा सबको नियन्त्रण
में रखती है।
भगवती के चारों हाथों में अंकुश पाश, पांच बाण और
धनुष हैं। और उसका वर्ण लाल है, इसलिये उसका नाम
अरुणा है। अंकुश शर्करा का बना है, बाण फूलों के और
धनुष ईख का। क्रोध को अंकुश, मोह को पाश, शब्द स्पर्श-
रूपरसगंध को पांच बाण और मन को धनुष समझना चाहिये।
मोह भी माधुर्य लिये होता है, भगवती का क्रोध भी मीठा होता
है। मन में आनंद रूपी रस भरा रहता है और पांचों विषयों
में भी मधुरता होती है।
भगः शक्तिर्भगवान्काम ईश उभा दातारविह सौभगानाम।
समप्रधानौ समसत्त्वौ समोजौ तयोः शक्तिरजरा विश्वयोनिः ॥१४॥
अर्थः—भग शक्ति है, भगवान् कामेश दोनों यहां सौभाग्य
के देने वाले हैं, दोनों समान रूप से प्रधान हैं, समान सत्व
वाले हैं, और समान ओजस्वी हैं, ओजरा उनकी शक्ति है जो
विश्व का कारण है।