सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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परिशिष्ट (३)
अथ अथर्ववेदीया भावनोपनिषत् का हिन्दी अनुवाद !
स्त्राविद्यापदतत्कार्यं श्रीचक्रोपरि भासुरम् ।
बिन्दुरूपंशिवकारं रामचन्द्रपदं भजे ॥
ॐ भद्रंकणेभिः शृणुयामदेवा भद्र पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिररङ्गै स्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः । स्वस्तिन
इन्द्रो वृद्धश्रवाः, स्वस्तिनः पूषाविश्ववेदाः, स्वस्ति नस्ताक्षर्यो
अरिष्टनेमिः, स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु । ॐ शान्तिः ३॥
हरिः ॐ ॥ आत्माका चारों ओर सकल ब्रह्माण्डमण्डल
को घेरेहुए, अखण्ड मण्डलाकार स्वयं प्रकाशमान ध्यान करना
चाहिये । ॐ श्रीगुरु सबकी कारणभूता शक्ति है । उससे ९ रंध्र
(छिद्र) वाला देह बनता है, वह ही ९ शक्ति स्वरूप श्रीचक्र
है । (जैसे देह में २ नेत्र, २ कान, २ नाक के छिद्र, १ मुख,
१ पायु और १ उपस्थ ये ९ छिद्र हैं वैसे ही श्रीचक्र में ४
श्रीकंठ और ५ शिव युवतियों वाले ९ प्रकृति स्वरूप त्रिकोण
हैं), (सौ. ल. श्लोक ११) । वाराही शक्ति पितृ रूपा है ।
(सौ. ल. श्लोक ३) और कुण्डलिनी शक्ति मातृ रूपा
है (सौ. ल. श्लोक ९), पुरुषार्थ सागर हैं, देह नवरत्नद्वीप
(सौ. ल. श्लोक ८), आधर नवक मुद्रा शक्तियां हैं (त्रैलोक्य