Skip to content
SarvaKosh
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 346 of 415

Read in context
Page 346

२९६ सौंदर्य लहरी
मत्त्वेनोज्जृम्भते, अऋचटतपयशन् सृजते । तस्मादीश्वरः
कामोऽभिधीयते, तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति ।
अर्थः—वह एक शिव रूपी देव दृश्य के रूप में विकसित होता
है । यतियों में, यज्ञों में, योगियों में कामना करता है । इस प्रकार
काम उत्पन्न होता है । वह निरंजन कामना रहित ब्रह्म जंभुहाई लेता
है (विकसित होता है ।) अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग,
प वर्ग, य वर्ग और श वर्गों की सृष्टि करता है । इसलिये ईश्वर को
काम कहते हैं । उसकी परिभाषा करने से काम ककार में व्यापक
माना जाता है ।
सृजन शक्ति आद्योपान्त काम शक्ति ही है, सामान्य इच्छा के
रूप में उसे कामना कहते हैं और प्रजनन वासना को काम वासना
कहते हैं । वह शिव की प्रभवाभिमुखी शक्ति है । परन्तु जब वह
प्रति प्रसव रूपा होती है, तब उसे शिवा कहते हैं । प्रभव और लय
क्रम दोनों उसके विपरित भाव होने के कारण एक दूसरे के प्रति-
बन्ध और शत्रु हैं । समाधि काल में काम शिव का शत्रु हैं, परन्तु
सृष्टिकाल में वह ही शक्ति के रूप में शिव की अर्धांगिनी का
सहयोगी बन जाता है । समाधि काल में जिस काम को शंकर
अपने तीसरे नेत्र को खोलकर भस्म कर देते हैं, वह ही उनके
प्रभवाभिमुख होने पर मानो उनका उपहास करता है ।
भगवती के नूपुरों के श्रृंगार रस परिपूर्ण कण २ शब्द की ध्वनि
में मानों कामदेव के उक्त उपहास का व्यंग व्यक्त हो रहा है ।
नृत्य के समय नूपुर ध्वनि अथवा गान वाद्य के साथ मंजीरों का