सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
by महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र)
Page 9 of 496
Read in contextHere is the line-by-line transcription of the page:
भूमिका
'महाकवि अश्वघोष'
'कृपावृष्टिस्फीतात् तव हृदयपीयूषसरसः
प्रवाहो निर्गत्य श्रमशमिरम्यः करुणया ।
तृषार्तानामीषद्विततिमधुरान्तःप्रतिगति-
प्रणालीभिः पञ्चाभवदिति किमन्यद् भुजकरात् ॥'
—सुभाषितरत्नकोषे त्रिलोचनस्य
संस्कृतवाङ्मय के प्राचीनतम कवियों में अश्वघोष उन इने-गिने मनीषियों
मे हैं, जिनके रचनाकाल के विषय में विद्वानों में अधिक मतभेद नहीं है ।
इनका व्यक्तित्व एक साथ कवि, उपदेशक, आचार्य और संन्यासी के रूप में
ऊर्जस्वित हैं । ये प्रकाण्डपण्डित ही नहीं, संस्कृत वाङ्मय की प्राचीन परम्परा
में विपुलवाङ्मय के निर्माणकर्त्ता भी हैं । इनकी ग्रन्थसंख्या लम्बी कतार में
हैं, जिनमें से कई एक महाविद्यालयों में पाठ्यक्रम के लिए निर्धारित किये गये
हैं । ये शब्दसृष्टि के ईश्वर हैं । योग और भोग जन्य विविध कलाओं के अनेक
क्षेत्रों में इनकी प्रतिभा