सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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बोली जाने वाली भाषा कभी नहीं रही है। फिर भी संस्कृत में लिखा यह
बुद्धचरित न केवल भारत में अपितु भारतेतर देशों में भी अपना प्रचुर प्रभाव
डालता रहा है। प्रथम पाँच सर्ग, आठवें तथा तेरहवें सर्ग के मार-विजय का
कुछ अंश काव्य की दृष्टि से ललित, आकर्षक एवं सुन्दर है। शेष अंश दार्शनिक
ग्रंथ की तरह नीरस है। इसे काव्य की अपेक्षा धार्मिक नीतिवादी ग्रंथ कहना
ही अधिक उपयुक्त होगा।
( २ ) सौन्दरनन्द
यह अट्ठारह सर्गों का एक महाकाव्य है। नेपाल के राजकीय पुस्तकालय
में प्राप्त दो पाण्डुलिपियों के आधार पर महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने
इसका प्रकाशन 1910 में Appendix to Bibliotheca. में करवाया।
सौन्दरनन्द में गौतम बुद्ध के वैमात्रेय भाई नन्द एवं उसकी पत्नी सुन्दरी की
कथा का काव्यात्मक वर्णन पूर्वार्द्ध में है और इसका उत्तरार्द्ध नन्द की प्रव्रज्या
से सम्बन्धित है। इसका सर्गतः कथासार परिशिष्ट में लिखा जा चुका है।
अतः उसकी यहाँ पुनरावृत्ति अनपेक्षित है।
इस सम्पूर्ण महाकाव्य की गरिमा बौद्धदर्शन के काव्यात्मक वर्णन में है।
इसका मूल वर्ण्य विषय बुद्धकालीन भारतीय संस्कृति है। अश्वघोष ने इस
ग्रन्थ में भगवान् बुद्ध के तत्त्वों पर प्रकाश डाला है। तथागत के तत्त्वज्ञान के
दो महास्तम्भ हैं—महाप्रज्ञा और महाकरुणा। प्राणिमात्र को समष्टि-स्वरूप
देखने की क्षमता प्रज्ञा के द्वारा मिलती है। करुणा प्राणिमात्र के प्रति प्रत्येक
व्यक्ति का क्या कर्त्तव्य है—यह सिखाती है। सौन्दरनन्द में स्थान-स्थान पर
इन दोनों तत्त्वों को काव्यमाला में परिभाषित करने की कवि ने सफल चेष्टा
की है।
मर्त्य-मानव संसार की नश्वरता से पूर्ण अवगत होकर भी अपने को अमर्त्य
समझता है। संसार दुःखमय क्यों होता है—इसका विवेचन आकर्षक ढंग से
इस काव्य में अश्वघोष ने किया है। बौद्धों का दूसरा मौलिक सिद्धान्त यह है
कि प्रत्येक वस्तु की क्षण-क्षण में उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की अव्याहत
परिणति होती है, जिस घटना को वे 'क्षणिकता' कहते हैं। इस क्षणिकता
को भी अश्वघोष ने आकर्षक रूप दिया है। 'प्रतीत्यसमुत्पाद' सिद्धान्त में कहा
गया है कि उत्पत्ति, स्थिति और विनाश की श्रृंखला आगे-आगे हेतु और प्रत्यय
से बढ़ती जाती है। समुत्पाद का अर्थ गत परिस्थिति है और प्रतीत्य का अर्थ
कारणाश्रित्य है। अश्वघोष ने अनेकों बार इस शब्द की पुनरावृत्ति कर यह
कहना चाहा है कि संसार में जो कुछ होता है उसके विषय में इन दो तत्त्वों के
बीच का रास्ता ही प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के अनुसार
शान्त, संतुष्ट, तत्त्वज्ञ और दार्शनिक को आसानी से विवेक की उपलब्धि होती
है और मद-मान-अनासक्त बुद्धि वाले को आसानी से वैराग्य होता है—