ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 730 of 1855
Read in contextशतक्रतु इंद्र ने अग्रु के पुत्र परावृक्त को स्तोत्रों का भागी बनाया. (१६)
उत त्या तुर्वशायदू अस्नातारा शचीपतिः. इन्द्रो विद्वाँ अपारयत्.. (१७)
शचीपति एवं विद्वान् इंद्र ने ययाति के शाप के कारण अभिषेकहीन तुर्वश एवं यदु
नामक राजाओं को अभिषेक योग्य बनाया. (१७)
उत त्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः. अर्णाचित्ररथावधीः.. (१८)
हे इंद्र! सरयू के पार रहने वाले राजा और्व और चित्ररथ स्वयं को आर्य कहते थे. तुमने
उनका वध तुरंत किया. (१८)
अनु द्वा जहिता नयोऽन्धं श्रोणं च वृत्रहन्. न तत्ते सुम्नमष्टवे.. (१९)
हे वृत्रनाशक इंद्र! तुमने सभी संबंधियों द्वारा त्यागे गए अंधे और लूले पर कृपा की थी.
तुम्हारे द्वारा दिए हुए सुख को कोई नष्ट नहीं कर सकता. (१९)
शतमश्मन्मयीनां पुरामिन्द्रो व्यास्र्यत्. दिवोदासाय दाशुषे.. (२०)
इंद्र ने पत्थरों के बने हुए सौ नगर हव्य देने वाले दिवोदास को दिए. (२०)
अस्वापयद्दभीतये सहस्रा त्रिंशतं हथैः. दासानामिन्द्रो मायया.. (२१)
इंद्र ने दभीति के कल्याण के लिए अपनी शक्ति द्वारा तीस हजार राक्षसों को अपने
आयुध से मार डाला था. (२१)
स घेदुतासि वृत्रहन्त्समान इन्द्र गोपतिः. यस्ता विश्वानि चिच्युषे.. (२२)
हे शत्रुनाशक, गायों के पालक एवं सभी यजमानों को समान समझने वाले इंद्र! तुमने
इन सभी शत्रुओं को हराया था. (२२)
उत नूनं यदिन्द्रियं करिष्या इन्द्र पौंस्यम्. अद्या नकिष्टदा मिनत्.. (२३)
हे इंद्र! तुमने अपनी शक्ति को सामर्थ्यपूर्ण बना लिया है, इसलिए आज तक कोई भी
तुम्हें नहीं हरा पाया है. (२३)
वामंवामं त आदुरे देवो ददात्वर्यमा.
वामं पूषा वामं भगो वामं देवः करूळती.. (२४)
हे शत्रुविदारक इंद्र! पूषा देव तुम्हें उत्तम धन दें. बिना दांतों वाले पूषा एवं भग तुम्हें
उत्तम धन दें. (२४)
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