ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 731 of 1855
Read in contextसूक्त—३१ देवता—इंद्र
कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा. कया शचिष्ठया वृता.. (१)
सदा बढ़ते हुए, पूजनीय एवं मित्ररूप इंद्र किस तर्पण के कारण हमारे सामने आएंगे? वे
किस विचारपूर्ण कर्म के कारण हमारे अभिमुख होंगे? (१)
कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः. दृळहा चिदरुजे वसु.. (२)
हे इंद्र! पूजनीय, सत्य एवं अतिशय मदकारक कौन सा सोमरस तुम्हें शत्रुओं का धन
नष्ट करने के लिए प्रमुदित करेगा? (२)
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्. शतं भवास्यूतिभिः.. (३)
हे इंद्र! तुम मित्ररूप स्तोताओं के रक्षक बनकर अनेक प्रकार से रक्षा करते हुए हम
लोगों के सामने आओ. (३)
अभी न आ ववृत्स्व चक्रं न वृत्तमर्वतः नियुद्भिर्श्चर्षणीनाम्.. (४)
हे इंद्र! तुम हम सेवक लोगों की स्तुति से प्रसन्न होकर हमारे चारों ओर गोल चक्कर के
रूप में स्थित रहो. (४)
प्रवता हि क्रतूनामा हा पदेव गच्छसि. अभक्षि सूर्ये सचा.. (५)
हे इंद्र! तुम यज्ञकर्म के स्थान में अपना स्थल जानकर ही आते हो. हम सूर्य के साथ
तुम्हें स्मरण करते हैं. (५)
सं यत्त इन्द्र मन्यवः सं चक्राणि दधन्विरे. अध त्वे अध सूर्ये.. (६)
हे इंद्र! तुम्हारे लिए बनाई हुई स्तुतियां एवं परिक्रमाएं जब हमारे द्वारा धारण की जाती
हैं, तब वे सबसे पहले तुम्हारे प्रति और बाद में सूर्य के प्रति होती हैं. (६)
उत स्मा हि त्वामाहुरिन्मघवानं शचीपते. दातारमविदीधयुम्.. (७)
हे शचीपति इंद्र! लोग तुम्हें धन का स्वामी, स्तोताओं को मनोवांछित फल देने वाला व
दीप्तिशाली कहते हैं. (७)
उत स्मा सद्य इत्परि शशमानाय सुन्वते. पुरू चिन्नमंहसे वसु.. (८)
हे इंद्र! तुम स्तुतिकारी और सोमाभिषवकारी यजमान को पल भर में बहुत सा धन देने
वाले हो. (८)
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