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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

DevanagariHindipublished286 pages

Page 172 of 286

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Page 172

अष्टम प्रभाव १७५
ताल तें बागिन बाग तें तालनि ताल तमाल की जात न सीवैं ।
कैसी हैं केसव वे जुवतीं सुनि ऐसी दसा पिय की पल जीवैं ।३३।
शब्दार्थ—मेघनि ज्यों० = जैसे बादल हंसों को नहीं देखता ( वर्षा आने
पर हंस मानसरोवर चले जाते हैं ) वैसे ही वे हँसकर ( प्रसन्नतापूर्वक ) हंसों
को नहीं देखते । हंसनि ज्यों० = जैसे हंस बादल का रूप (रस) पान नहीं करते
वैसे ही वे भी बादलों को नहीं देखते । कंजनि ज्यों० = जैसे कमल मन से
चंद्रमा को नहीं चाहते वैसे ही वे भी चंद्रमा को नहीं देखते । चंद ज्यों० =
जैसे चंद्रमा किसी प्रकार'कमलों की नहीं छूता (कमल चंद्रोदय होने पर बंद हो
जाते हैं) वैसे ही वे भी कमलों को नहीं छूते । न छीवैं = नहीं छूते । ताल
तें० = न ताल से बाग में आते हैं और न बाग से ताल की ओर ( जैसे पहले
जाया आया करते थे, वे अब सुखद नहीं लगते ) । ताल तमाल की० = जहाँ
ताल और तमाल के वृक्ष हैं वहाँ ( संकेतस्थल समझकर मारे क्लेश के )
जाते ही नहीं । सीवैं = सीमा में, निकट । पल = क्षण भर भी ! जीवैं =
जीती हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उद्वेग, यथा—( सवैया )
(३१५) सोचि सखी भरि लेत बिलोचन, काँपत देखत फूले तमालहि ।
भूले से डोलत बोलत नाहिंन बाग गए किधौं तेरे ही तालहि ।
देख्यो जौ चाहति देखि न आवति ऐसे में हौं न दिखैहौं री लालहि ।
आजु कहा दिखसाध लगी जब देख्यो सुहाइ कछू न गुपालहि ।३४।
शब्दार्थ—सोचि = स्मरण करके । बिलोचन = दोनो नेत्र । काँपत०=फूले
तमालों को देखकर वे काँपने लगते हैं । भूले० = भूले से फिरते रहते हैं, चुप-
चाप । बाग गए० = ( कभी ) तेरे बाग या (कभी) ताल पर जाया करते हैं ।
देख्यो जु० = यदि उन्हें देखना ही चाहती है तो देख क्यों नहीं आती ? मैं तो
ऐसी दशा में लाल को दिखलाने स्वयम् न जाऊँगी । दिखसाध = देखने की
उत्कंठा । जब देख्यो = जब गोपाल को कोई वस्तु देखने पर अच्छी नहीं लग
रही है तब तुझे देखने की लालसा जगी है ।
अथ प्रलाप-लक्षण—( दोहा )
(३१६) भँवंत रहै मन भौर ज्यों, है तन-मन-परिताप ।
बचन कहै प्रिय पक्ष सों, तासों कहत प्रलाप ।३५।
शब्दार्थ—परिताप = ( परि + ताप ) अत्यंत ताप । वचन कहै=प्रिय
पक्ष की ही बातें कहे, प्रियतम की ही बातें करे ।
३४—दो लोचन-दो लोचन । तेरे हों-तेरई । जौ-जु । दिखैहौं-दिखाऊँ ।
३५—भँवत-भ्रमत । परिताप-परिताप ।