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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

Page 152 of 286

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Page 152

सप्तम प्रभाव १५५
प्रच्छन्न प्रेमाभिसारिका, यथा—(कबित्त)
(२६४) लीनो हम मोल अनबोलें आई जान्यो मोह,
मोहिं घनस्याम घनमाला बोलि लाई है ।
देख्यो ह्वैहै दुख जहाँ देहऊ न देखी परै,
देखी कैसे बाट केसौ दामिनी दिखाई है ।
ऊँचे नीचे बीच-कीच कंटकनि परे पग,
साहस गयंद गति अति सुखदाई है ।
भारी भयकारी निसि निपट अकेली तुम,
नाहीं प्राननाथ साथ प्रेम जु सहाई है ।२७।
शब्दार्थ—हम = हमको । अनबोलें = बिना बुलाए । घनस्याम = हे
कृष्ण । घनमाला = काले बादलों का समूह । बोलि = बुलाकर । वाट = मार्ग ।
साहस = हिम्मत । गयंद = हाथी । गति = चाल । सहाई = सहायक ।
भावार्थ—(नायक और नायिका का संवाद ) ( नायक )—तुमने तो
मुझे मोल ही ले लिया है ? क्योंकि बिना बुलाए ही आईं । तुम्हारा प्रेम
मैंने जान लिया ।
(नायिका )—हे घनश्याम, मुझे तो काले बादलों की पंक्ति बुलाकर
लाई है ।
(नायक)—तब तो तुमने दुख देखा होगा (तुम्हें बड़ा कष्ट हुआ होगा) ।
(नायिका )—जहाँ (जिस अँधेरी रात्रि में ) शरीर भी दिखाई नहीं
देता, वहाँ दुख क्या दिखाई देगा ।
( नायक )—तो फिर उसमें तुमने रास्ता कैसे देखा ?
( नायिका )—मार्ग तो बिजली ( के प्रकाश ) ने दिखा दिया ।
( नायक )—फिर भी चढ़ाव, उतार, कीचड़ और काँटों पर पैर पड़े होंगे
जिससे कष्ट मिला होगा ।
(नायिका )—साहस रूपी हाथी की सुखदायी चाल से आई हूँ ( कष्ट
मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता ) ।
(नायक)—महा भयंकर (डरावनी) रात्रि में भला तुम अकेली कैसे आईं ।
(नायिका )—हे प्राणनाथ, साथ में आपका प्रेम मेरा सहायक जो था ।
प्रकाश प्रेमाभिसारिका, यथा—(कबित्त )
(२६५) नैननि की अतुराई बैननि की चतुराई,
गात की गुराई न दुरति दुति चाल की ।
२७—लीनो-लीने । हम-हमै । आई-आए । मोह-माहि, नेह । लाई-
ल्याई । देखी कैसे-दीखी कैसे । परे-पीड़े । गति०-की सी गति सुखदाई ।
भयकारो-यह कारी । जु-जो ।