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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

Page 153 of 286

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Page 153

१५६ रसिकप्रिया

आपने चरित्रनि के चित्रत विचित्र चित्र,
चित्रिनी ज्यों सोहै साथ पुत्रिका गुवाल की।
चंद्र के समान चारु चाय सों चढ़ाएँ फिरै,
करिकै तिहारे मृगनैननि की पालकी।
कीजै पयपान अरु रखै पान प्रानप्यारे,
आई है जु आई अलबेली ग्वालि काल की।२८।

शब्दार्थ—अतुराई = आतुरता, तत्परता। न दुरति = छिपती नहीं।
द्युति = द्युति। चित्रत = बनाती हैं। पुत्रिका = पुत्री। गुवाल = ग्वाला।
चारु = सुंदर। चाय = प्रेम। पयपान = जलपान। काल की = कलवाली,
जिसकी चर्चा कल मैंने की थी, या आपने जिसे कल देखा था।

प्रच्छन्न गर्वाभिसारिका, यथा—( सवैया )
(२६६) लाड़िली लीली कलोरी लुरी कहँ लाल लुके कहँ अँग लगाइकै।
आजु तौ केसव कैसहूँ लेरुवै लागन देति न देखहु आइकै।
बेगि चलौ उठि आई लिवावन दौरि अकेलियै हौं अकुलाइकै।
भूलिहू गोकुल गाँव में गोबिंद कीजै गरूर न गाइ चराइकै।२६।

शब्दार्थ—लाड़िली = प्यारी। लीली = नीली, श्यामवर्णा की। कलोरी =
बिना बरदाई या ब्याई जवान गाय। लुरी = नवप्रसवा, थोड़े दिन की ब्याई हुई।
कहँ = को। लाल = हे कृष्ण। लुके = छिपे। कहँ = कहाँ। अंग लगाइकै = अपने
अंग लगाकर, अपने हाथ की करके। लेरुवै = बछड़े को। लागन देति न = थन
छूने ( पीने ) नहीं देती। अकेलियै॥ अकेले ही। गोविंद = गऊ के स्वामी
गोपालक। गरूर = गुमान, अभिमान।

प्रकाश गर्वाभिसारिका, यथा---( कवित्त )
(२६७) चंदन चढ़ाइ चारु अंबर के उर हारु,
सुमन-सिंगार सोहै आनंद के कंद ज्यों।
वारौ कोरि रतिनाथ बीन में बजावै गाथ,
मृगज मराल साथ धानी जगबंद ज्यों।
चौंकि चौंकि चकई सी सौतिन की दूती चलीं,
सौतैं भईं दीनी अरबिंद द्युतिमंद ज्यों।
तिमिर बियोग भूले लोचन चकोर फूले,
आई ब्रजचंद चलि चंदावलि चंद ज्यों।३०।


२८- अतुराई-आतुरई। दुरति-दुराई जात। के-कौ। चित्र-गति।
चढ़ाएँ०-चढ़ी फिरति। प्रानप्यारे-प्राननाथ। अलबेली-अनबोली। २६-
सवैया-कमल छंदु। कहं-कहु। कहं-कहाँ। अंग-आंग, आँगि। देखहु कैसहूँ।
उठि-चलि। लिवावन-बुलावन। अकेलियें-अकेलियों। ३०--के उर-को उर।
कोरि-क्रोरि। बीन-बीना। मृगज-मृगय। दीनी-दीन। द्युति-गति।