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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

by महाकवि केशवदास

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DevanagariHindipublished286 pages

Page 151 of 286

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Page 151

१५४ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—उदधिजात = चंद्रमा । गात = गात्र, शरीर । पता = पत्ता,
पंखुड़ी । बनाइ कै = भली-भाँति मन लगाकर । टारि = हटाकर, दूर करके ।
मारि = पीटकर । बगराइ कै = बिखेरकर, फैलाकर । दीह = दीर्घ । बिलास =
प्रसन्नता की चेष्टाएँ । सेइकै = अर्थात् वहाँ रहकर । ऊनो = उदास भाव की
बातें । दूनो = दोनो ही । दूनो = दूना, अत्यधिक ।
सूचना—इस कवित्त के प्रथम चरण के लेख के बारे में अनेक अटकलें
लगाई गई हैं । सरदार ने बड़ा लंबा चौड़ा वाग्विस्तार किया है । सीधी बात
इतनी ही है कि चंद्रमा को देखकर उसके शरीर में जो कामोद्दीपन हो रहा
था उसी के लिए उसने चंपकदल पर राहु का चित्र अंकित किया, जिससे
उसका तेज मंद पड़े । चंपकदल चुनने का कारण यह है कि उसके शरीर के
रंग से उसका साम्य है ।
अथ अभिसारिका-लक्षण—( दोहा )
(२६२) हित तें कै मद मदन तें, पिय पै मिलै जु जाइ ।
सो कहियै अभिसारिका, बरनी त्रिविध बनाइ ।२५।
शब्दार्थ—हित तें = प्रेम से (प्रेमाभिसारिका) । मद तें = गर्व से (गर्वा-
भिसारिका ) । मदन तें = काम से ( कामाभिसारिका ) ।
अथ स्वकीया अभिसारिका-लक्षण—( दोहा )
(२६३) अति सलज्ज पग मग धरै, वलत बधून के संग ।
स्वक्रिया को अभिसार यह, भूषन भूषित अंग ।२६।
सूचना—निम्नलिखित चार दोहे हस्तलिखित प्रति में नहीं हैं। सरदार
ने इन्हें अन्य का माना है--
परकीया अभिसारिका, यथा—( दोहा )
जनी सहेली सोभही, बंधूबधू सँग चार ।
मग में देइ बराइ डग, लज्जा को अभिसार ॥
सामान्या को अभिसार, यथा—( दोहा )
चकित चित्त साहस सहित, नीलवसनजुत गात ।
कुलटा संध्या अभिसरै, उत्सव तम अधिरात ॥
चहूँ ओर चितवै हँसै, चित चोरै सबिलास ।
अंगराग-रंजित नितहि, भूषन-भूषित भास ॥
कुसुम कंजु कर मंदगति, सखी-संग मग चार ।
सखी सहेली साथ बहु, बरनि नारि-अभिसार ॥
२५—पै-सों, को । २६—सलज्ज-सुलज्ज । पग०-पग डग धरै, डगमग
धरी, डगमग धरै । चलत-धरति । बधून-वधू । स्वक्रिया-स्वीया । यह-वह,
इह ।