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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 508 में से

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जो शोध-कार्य हुआ है, उससे यह प्रमाणित हो गया है कि तेरहवीं सदी में बूदपुर
(ऐतिहासिक बोयान नगर) के आसपास राज करनेवाले सूर्यवंशी राजा विट्ठलराजु के
आदेशानुसार उनके पुत्र गोनबुद्ध राजा ने इसकी रचना की है। इसका उल्लेख कवि
स्वयं काव्य के प्रारंभ में कर चुके हैं। प्रकाशित एवं अप्रकाशित शिलालेखों के आधार पर
यह प्रमाणित हो चुका है कि इस काव्य की रचना लगभग १३८० ई० में हुई थी।
'रंगनाथ रामायण' की विशेषता यह है कि उसकी रचना उस समय तक जनता
में प्रचलित राम-कथा के आधार पर हुई है, जो संस्कृत-रामायण से कईस्थानो में भिन्न है।
यद्यपि, रामायण आर्यावर्त्त या उत्तरापथ के राजा राम की कथा है, तथापि वह
परंपरागत लोक-कथाओं के रूप में सारे दक्षिण में अति प्राचीन काल से व्याप्त थी।
अब यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका है कि दक्षिण की भाषाएं, तमिल,
तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम--जो संस्कृत भाषा-परिवार से सर्वथा भिन्न परिवार की हैं--
अपनी प्रारंभिक अवस्था में संस्कृत से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखती थीं।
ऐसी दशा में यह आशा नहीं की जा सकती कि इन भाषाओ के बोलनेवाले वाल्मीकि
रामायण की मूलकथा का ज्ञान प्राप्त करें। उन्होंने स्थूल रूप में कथा को ग्रहण किया
होगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तित्वों ने भिन्न-भिन्न युगों में उस कथा का अपने ढंग से मोड़-
तोड़कर प्रचार किया होगा। यह कोई आश्चर्य नहीं, यदि घर-घर में इस कथा का प्रचार
हो गया हो और उत्सुक बालक-बालिकाओं के मनोरंजन के लिए तथा उनमें राम तथा
उनकी पत्नी सीता के आदर्श जीवन में प्रतिबिम्बित आर्य-धर्म को प्रतिष्ठित करने के
उद्देश्य से घर के बड़े-बूढ़े, रामायण के इतिवृत्त का छोटी-छोटी कहानियों के रूप में
प्रसार किया हो। हमारे यहाँ ऐसी प्रथा रही भी है। महाकवि कालिदास अपने मेघदूत
में कहते हैं कि कौशांबी नगर में ग्रामवृद्ध अपने पोते-पोतियों को उदयन की कथा
सुनाते थे। स्वयं कालिदास-कृत रघुवंश में वर्णित राम-कथा कुछ स्थानो में मूलकथा
से भिन्नता रखती है।
राम की कथा त्रेतायुग की होने के कारण उदयन की कथा से भी अधिक प्राचीन है
और कदाचित् उसने द्रविड़ों के हृदय एवं प्रतिभा पर अमिट प्रभाव डाला होगा।
इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि रामायण के दो प्रधान पात्रों में रावण
दक्षिण का था। लंका का राज्य, राम के विजय प्राप्त करने के पश्चात् भी बना रहा
और विभीषण उसका पालन करता रहा। आधुनिक युग की भाँति यदि राम भी लंका
को जीतने के पश्चात् अपने किसी भाई को अपनी तरफ से लंका का राज्य चलाने के
लिए नियुक्त करते, तो कदाचित् दक्षिणापथ का इतिहास कुछ बातो में भिन्न होता।
तेलुगु-भाषा तमिल के मुकाबले में प्राचीन न होने पर भी कुछ हद तक प्राचीन
ही कही जा सकती है; उस भाषा के बोलनेवालो में बहुत समय तक वाल्मीकि रामायण
की अपेक्षा लोक-कथाओं के द्वारा प्रचलित राम-कथा का ही आदर होता रहा। क्रमशः
तेलुगु-भाषाभाषी संस्कृत के प्रति आकृष्ट हुए और उस भाषा के प्रकांड पंडित बन गये।
'रंगनाथ रामायण' और 'भास्कर रामायण' के कवि संस्कृत के महान् पंडित थे और