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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 508 में से

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पृष्ठ 15

( ११ )

तेलुगु भाषा में रामकथा-संबंधी कितने ही काव्य हैं । ये काव्य प्राय दो रूपों
में मिलते हैं--प्रबंध-काव्य तथा मुक्तक-गीत । प्रबंध के रूप में प्राप्त होनेवाले काव्यों
में अधिकतर काव्य वाल्मीकि-रामायण के सरस अनुवाद-मात्र हैं । 'रंगनाथ रामायण'
तथा 'मोल्ल रामायण' ही दो ऐसे प्रबंध-काव्य हैं, जो स्वतंत्र रचना कहे जा सकते हैं
इन दोनों की कथा यद्यपि प्रधानतया वाल्मीकि-रामायण को आधार मानकर चली है,
तथापि काव्य-रचना के लक्ष्य में, कथा-वस्तु के विधान में वर्णनों में, तथा चरित्र-
चित्रण में नवीनता है । इन दोनों में 'मोल्ल रामायण' आकार में छोटी है । 'रंगनाथ
रामायण' ही आंध्र-देश में अधिक लोकप्रिय है । इसके रचना-काल तक जनता में
प्रचलित रामकथा-संबंधी कई ऐसे प्रसंग इस रामायण में मिलते हैं, जो वाल्मीकि-
रामायण में नहीं मिलते । अबतक रामकथा-संबंधी जितने प्रबंध-काव्य उपलब्ध हुए,
उनमें यही सब से प्राचीन काव्य है ।
'रंगनाथ रामायण' संबंधी चर्चा प्रारंभ करने के पहले हम एक विषय स्पष्ट कर
देना आवश्यक समझते हैं । जिस प्रकार तुलसी-रामायण उत्तर-भारत के लोक-जीवन के
पोर-पोर में व्याप्त होकर, उसके पारिवारिक सामाजिक, राजनीतिक एव सांस्कृतिक
जीवन को प्रभावित कर सकी, उसी प्रकार और उसी मात्रा में तेलुगु-भाषाभाषियों के
जीवन को तेलुगु-रामायण प्रभावित नहीं कर सकी । आंध्र-जनता के बीच वह कार्य
आंध्र-महाभारत तथा आंध्र-महाभागवत ने किया । इन दोनों ग्रन्थों ने तेलुगु-प्रदेश में
लोक-जीवन को प्रभावित ही नहीं, बल्कि अनुप्राणित भी किया है । तुलसी-रामायण
हिन्दी-भाषाभाषियों के लिए एक साथ धर्म-ग्रन्थ, पुराण, नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र तथा
लोक-जीवन का पथ-प्रदर्शक है । तेलुगु-प्रदेश में वह स्थान तेलुगु-रामायण को नहीं,
बल्कि तेलुगु-भागवत को प्राप्त है । तेलुगु-भाषाभाषियों के लिए 'आंध्र-महाभारत'
एक साथ धर्मशास्त्र, वेदान्त-ग्रन्थ, नीति-ग्रन्थ, महाकाव्य और इतिहास हैं ।
परन्तु, फिर भी राम की कथा, जो परंपरा से जनता के बीच लोक-कथाओं
तथा लोक-गीतों के रूप में प्रचलित थी, अपना अक्षुण्ण प्रभाव लोगों के जीवन पर
डालती रही । आंध्र-देश में समय-समय पर कई ऐसे भक्त हुए, जिन्होंने अपने भक्ति-रस
पूर्ण गीतों एव भजनों के द्वारा राम-भक्ति का ऐसा प्रचार लोगों में किया कि श्रीराम
आंध्रों के इष्टदेव-से हो गये । आंध्र-प्रदेश में विरला ही ऐसा कोई गांव होगा, जहाँ
श्रीराम का मंदिर न मिलता हो । तेलुगु-भाषाभाषियों में रामय्या, रामन्ना, रामराव,
रामचन्द्र राव, सीतय्या, लक्ष्मण्ना आदि नामों की तो गिनती ही नहीं है ।
किन्तु, प्रश्न यह है कि तुलसी-रामायण के समान सर्वव्यापक तथा प्रभावशाली
राम-काव्य तेलुगु में क्यो नहीं लिखा जा सका ? ऐसी बात नहीं कि तेलुगु-प्रदेश में
इसके लिए आवश्यक प्रतिभा का अभाव था । यदि ऐसी बात होती, तो महाभारत एव
भागवत जैसे प्रौढ एव सरस महाकाव्यों की रचना ही तेलुगु में नही होती । अतः इसका
कारण जानने के लिए हमें इतिहास का आश्रय लेना पड़ेगा ।
यह सर्वविदित है कि भगवान् बुद्ध की धार्मिक क्रान्ति से वैदिक धर्म को बड़ा
भारी धक्का लगा । बौद्धधर्म कई शताब्दियों तक उत्तर-भारत के राजाओं के द्वार