रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 508 में से
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प्रत्येक युग का सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है--
पुराण-युग --वैदिक धर्म तथा उसके समर्थक पुराणो के प्रचारार्थ इस युग में
साहित्य-साधना का प्रारंभ हुआ। महाकवि नन्नया ने 'महाभारत' की रचना प्रारंभ की
और अरण्य-पर्व का अर्द्ध भाग लिख भी न पाये कि उनका स्वर्गवास हो गया । उसके
दो सौ वर्ष के पश्चात् तिक्कना सोमयाजी ने विराट् पर्व से प्रारंभ कर शेष पंद्रह पर्वो की
रचना की। उसके पश्चात् एर्रना प्रग्गडा ने अरण्य-पर्व का अधूरा अंश पूरा किया । इस
तरह महाभारत की रचना तीन कवियो के द्वारा लगभग तीन सौ वर्षो में पूरी हुई ।
इन तीन महाकवियो को 'कवित्रय' कहते हैं । आन्ध्र-महाभारत तेलुगु-भाषाभाषियो के
लिए एक साथ, धर्मशास्त्र, नीति-ग्रन्थ, पुराण तथा महाकाव्य हैं। उसका प्रभाव तेलुगु-
जन-जीवन पर अक्षुण्ण हैं ।
इसी युग में रामायण की रचना भी हुई । गोनबुद्धराजु ने देशज छन्द 'द्विपदा'
में रामायण की रचना की, जो साधारण जनता के बीच अत्यंत प्रिय हुई, जिसका
हिन्दी-अनुवाद उपस्थित है। 'भास्कर रामायण' की रचना भी इसी युग में हुई,
किन्तु वह केवल पंडितों के बीच समादृत हुई । महाभारत तथा रामायण के
अलावा इस युग में शैव काव्यो की रचना अत्यधिक मात्रा में हुई । नन्नेचोड़ कवि कृत
'कुमारसम्भव', पालकुरिकि सोमनाथ-कृत 'वसवपुराणमु' तथा 'पंडिताराध्यचरित्र'
इस युग की श्रेष्ठतम शैवभक्तिपरक रचनाएं हैं, जो तेलुगु-साहित्य के उज्ज्वल आभूषणों की
भांति शोभायमान हैं। इस युग के एक और प्रसिद्ध कवि नाचन सोम हैं, जिनका 'उत्तर-
हरिवंश' एक बडी ही सुंदर कृति हैं।
श्रीनाथ-युग-- इस युग के प्रसिद्ध कवियो में श्रीनाथ तथा पोतना अग्रगण्य हैं।
श्रीनाथ राजदरबार के महाकवि तथा महापंडित थे । उन्होने कविता-शैली में क्रांतिकारी
परिवर्त्तन किया । उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं—'काशीखंडमु', 'शृंगारनैषधम्' तथा 'पलनाटि
चरित्रमु' । इनमें 'काशीखंडमु' और 'शृंगारनैषधम्' संस्कृत के काव्यो के अनुवाद हैं
और 'पलनाटिचरित्रमु' ऐतिहासिक वीर-काव्य हैं । श्रीनाथ के अनुवाद की शैली भी
निराली हैं । मूल ग्रन्थ को आधार मानते हुए, उसके समस्त काव्य-सौंदर्य को तेलुगु की
मुहावरेदार भाषा में मूर्त्तिमान् करने की उनकी क्षमता अद्भुत हैं। उनके समकालीन कवि
पोतना, तेलुगु-भाषाभाषियों के हृदय-पीठ पर सर्वदा विराजमान रहेंगे। उनकी उत्कृष्ट
रचना 'आन्ध्र-महाभागवत' हैं, जिसका प्रचार गरीब की झोपड़ी से अमीरो के
महलो तक में है । पोतना राम के भक्त थे, किन्तु उन्होने कृष्ण-प्रधान काव्य की रचना की ।
उनकी भक्ति विलक्षण थी । राम-कृष्ण, शिव-केशव में उन्होने कोई भेद नहीं किया।
उनकी भागवत के कुछ भाग, जैसे प्रह्लाद-चरित्र, गजेन्द्रमोक्ष तथा कृष्ण-लीलाएँ आदि
तेलुगु-प्रदेश में इतने प्रसिद्ध हैं कि लोग उन्हें जबानी याद करके समय-समय पर भक्ति-
भाव से गाते रहते हैं ।
प्रबन्ध-युग --यह युग तेलुगु-साहित्य का स्वर्ण-युग माना जाता है। विजयनगर-
साम्राज्य के विख्यात राजा श्रीकृष्णदेवराय का प्राश्रय पाकर तेलुगु-साहित्य ने अभूतपूर्व