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सर्वकोश
परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 320 में से

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पृष्ठ 197

श्यामाक्रमः १५५
में अन्तर्भूत पञ्चदशी के तीनों कूटों के एक वर्ण की तरह छः आदिवर्णों को
एक वर्ण और स्वाहान्त २७ वर्णों को मिलाकर अष्टाविंशत्यक्षर मानने पर मिट
जाता है॥२०॥
आवरणपूजा
पश्चादावरणपूजां कुर्यात् ।।२१।।
पश्चादितीदं सूत्रं व्यर्थमिव दृश्यते, तथापि तथा न मन्तव्यम्। तथा
हि— इदमावरणपूजोत्पत्तिवाक्यम्। अग्रिमवाक्यानि तदितिकर्तव्यता-
प्रपञ्चरूपाणि ।।२१।।
यह शङ्का नहीं करनी चाहिये कि, यह सूत्र अनावश्यक है। वस्तुतः यह
महत्त्वपूर्ण सूत्र आवरण-पूजा का मानो प्रवर्त्तन-सा करता हुआ प्रतीत हो रहा
है। यह तो एक प्रकार का 'उत्पत्तिवाक्य' ही है। आगे के एतद्विषयक सूत्र तो
मात्र इतिकर्त्तव्यता के प्रपञ्च मात्र हैं॥२१॥
अथ सर्वोपयोगिनीं काञ्चित् परिभाषामाह
सर्वचक्रदेवताऽर्चनानि वामकराङ्गुष्ठानामिकासन्दष्टद्वितीय-
शकलगृहीतश्रीपात्रप्रथमबिन्दुसहपतितैः दक्षकराक्षतपुष्पक्षेपैः
कुर्यात् ।।२२।।
सर्वचक्रदेवता गणपत्यादिपरान्ताः सामान्यपद्धत्या यक्ष्यमाणा अन्याश्च।
श्रीपात्रं विशेषार्घ्यपात्रम्। सहपतितैरित्यनेन बिन्दुपुष्पाक्षतयोः पतनम् एककाले,
इति सूचितम् ।।२२।।
‘गणपति’ से प्रारम्भ कर ‘परा’ पर्यन्त समस्त चक्र-देवता वर्ग का अर्चन
बाँयें हाथ के अँगूठे और अनामिका से दृढ़तापूर्वक गृहीत विशेषार्घ्य-पात्र से करे।
दक्ष हस्त के सहयोग से एक साथ जल-बिन्दुवों, फूलों और अक्षतों को नीचे
छोड़ने की विधि अपनाये॥२२॥
प्रथमावरणदेवतास्तत्स्थानं चाह
त्रिकोणे रतिप्रीतिमनोभवान् ।।२३।।