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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

Akath Kahani Prem Ki (Kabir's Tales of Love)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

द्वारा लिखित पत्र

पूज्य महाराज श्रीजी के
पावन सानिध्य
द्वारा लिखित पत्र

पूज्य महाराज श्री के सानिध्य प्राप्त करने वाले साधकों के लिए इनका लिखा एक पत्रक
यहाँ पर उद्धृत कर रहे हैं। जिसका उद्देश्य मात्र यह है कि जीवन रूपी बगिया को महकाने के
लिए क्या करना है?

विषय रस विष त्यागो, हरि रस पीयो रे। नाम रूपी नौकापर जो मनुष्य चढ़े वे पार
हो ही जाते हैं। नाम नामी एक है। नाम रूपी नौका में बैठकर भी अविश्वास करे नामी, भगवान पर
शंका करे विश्वासहीन नाम का आलम्बन ले प्रभुपर जो शंका व भयभीत हो वह पार कैसे हो सकता
ऐसा शंका निवारण के लिए ही कहा है, भगवान केवल विश्वास स्वरूप ही रूप धारण कर
ही पार कर सकते हैं, ऐसा दृढ़ निश्चय ही साधक को पार ले जाता है।
हे साधक तुम आगे बढ़--भगवान का आश्रय लेकर सत्य मार्ग रूपी नौकापर जो भी
चढ़ा व तरे; प्रभु नाम नौका पर जो चढ़ा पार-पार हो गया सो तर गये; प्रभु शरण व नाम,
नाम व रूप।
विश्वास फल का वक्रीव का फल अवश्य होगा, जो संशय करेगा सो तो डूबा
निश्चय ही पार उतरे बिना नहीं; ज्ञान विज्ञान तो मात्र एक; सो ज्ञान उपदेशप्रद
मात्र पथ मात्र ही प्रभु नाम रूपी नौका रूप पद प्रभु का ध्यान ही नौका व प्रभु का
ध्यान नाम नौका, नाम नामी दोनों एक। केवल ज्ञान से पार नहीं व ज्ञान विज्ञान
ही है, ज्ञान से कर्म से कर्तव्य तो पार होना ही कठिन ही पार बिना कर्म, ज्ञान
का अधिकार ही क्या व कहाँ।
विश्वास ही पार रूप साधन ही शरण मात्र रूप ही कर्तव्य का फल;
बिना ज्ञान के आचरण व्यर्थ है। अज्ञानता से ज्ञान ही श्रेष्ठ है। ज्ञान से भी अधिक
कर्म जो निष्काम रूप से या श्रेष्ठ कर्म फल त्याग से ध्यान रूप ज्ञान श्रेष्ठ से
श्रेष्ठ ही ध्यान से श्रेष्ठ कर्म फल त्याग जिससे परम शांति प्राप्त हो। शांति
शांति से कर्तव्य का त्याग नहीं कर्म फल का त्याग, सो संन्यास व सो ही
प्रभु शरण सो ही स्वरूप प्राप्ति? प्रभु शरण से कोई वंचित नहीं व न ही
भक्ति से वंचित रहा? केवल कर्म से पार न साधन रूप से केवल व न
ही मात्र कर्तव्य त्याग ही से केवल कर्म-संन्यासियों को शांति प्राप्त हो,
संन्यास स्वरूप त्याग कर्मफल के त्याग रूप संन्यास रूप प्रभु शरण ही
प्राप्ति रूप ही स्वरूप का ज्ञान ही कर्तव्य मात्र श्रेष्ठ सत्य है।
एक बात व कर्तव्य ज्ञानपूर्वक ध्यान युक्त निष्काम ही कर्म संन्यास का
स्वरूप ही कर्तव्य मात्र ही अधिकार मात्र कर्तव्य से ही फल मात्र प्राप्त हो
कर्तव्य रूप कर्तव्य कर्म त्याग रूप ही कर्तव्य त्याग से ज्ञान त्याग से श्रेष्ठ
है, तो सो सो ही, तो फिर ज्ञान त्याग से संन्यास ही श्रेष्ठ है; तो श्रेष्ठ सो श्रेष्ठ
कर्म; त्याग श्रेष्ठ तो फिर श्रेष्ठ व प्रभु--का रूप ध्यान ध्यानपूर्वक श्रेष्ठ साधन ही
श्रेष्ठ; ध्यानपूर्वक ध्यान ही श्रेष्ठ, श्रेष्ठ, तो फिर श्रेष्ठ; श्रेष्ठ प्रभु व सो श्रेष्ठ ही
हो जाता श्रेष्ठ ही श्रेष्ठ रूप प्रभु का ध्यान।
केवल त्याग से, सो त्याग से त्याग का फल प्राप्त रूप ही केवल, पल-पल
स्वरूप प्रभु संशय से परे ही नाम उच्चारण के फल से पार हो गये, संशय
का त्याग विश्वास से; नाम रूप नाम उच्चारण फल केवल कल्याणकारी नाम फल
केवल से, फलदायक फल से फल त्याग संन्यास रूप ही फल कर्म संन्यास कर्म
त्याग फल से प्रभु शरण प्राप्त रूप ही फल प्राप्त रूप श्रेष्ठ श्रेष्ठ से श्रेष्ठ
ही! नाम ही केवल सार, सो ही सार है; सो उच्चारण केवल प्रभु शरण नाम
सार ही, तो नाम जप से श्रेष्ठ नाम जप ही से प्रभु रूप ज्ञान मात्र फल हो
ही; पल-पल नाम जपते हृदय स्थित प्रभु का पल-पल रूप प्रभु नाम व रूप
भगवान स्वरूप ध्यान ही हृदय स्थित स्वरूप का नाम जप से प्रभु व प्रभु
रूप नाम उच्चारण से भगवान स्वरूप भगवान रूप भगवान ही हो जाते
मात्र प्रभु रूप हो जाते हैं।
इस प्रकार स्पष्ट शब्दों में पल-पल भगवान नाम का ध्यान ही हर मनुष्य को हर
प्रकार के संशय से परे हटाकर उनके लिए केवल शांति स्वरूप होगा।

57

चित्र में देवनागरी लिपि के सभी अक्षर फ़ॉन्ट/ग्लिफ़ लोड न होने के कारण रिक्त चौकोर बॉक्स (Tofu/Missing glyphs ▯) के रूप में दिखाई दे रहे हैं, जिस कारण मूल पाठ को पढ़ा जाना संभव नहीं है।

केवल विराम चिह्न तथा पृष्ठ संख्या ही दिखाई दे रहे हैं (पृष्ठ संख्या: 58)।

समाज का रूपक भी शायद ऐसा ही; समाज की धारणा ही तो सब रूप सब भाव
का सार ले शांत हो सब में सम हो सदा सब प्रकार सुखी सब रूप सब भाव बने? भाव तो
सब आभासी?
पर पहले तो भाव सब का सब नाश हो; व्यक्तिगत का अभाव बिना सब
समष्टि स्वाधीनता ही तो बिना आधार महल सब का सब ढाना मात्र रहा
रूपक का यह भाव पहले सब का तो सब स्वाधीनता अपने ऊपर हो, सो
सब का रूप सब का नाश सब प्रकार होकर सब को शांति मिले, सब समता
सब का समष्टि रूप दु--सह रूप सदा सदा रहे? अरे न! रूप का नाम रूप
सब को मिला कर सब नाश का उपाय सदा रूप--हीन बने... ? तो ही
रूपक का सब रूप सब प्रकार सब नाश करे; हे रूप न! रूप न बने न ही
ना बने रूप मात्र नाम रूप से सब रूप सब प्रकार से सब रूप से स्वाधीन
रहे; रूप से सदा सब प्रकार का सुख हो; रूप से स्वाधीनता का भोग हो
सदा; सब ही सब प्रकार का आनंद का कारण बने; प्रकृति का अनुराग सदा रहे;
स्वाधीनता का रूप तो स्वाधीनता द्वारा सब
प्रकृति द्वारा सब का सब रूप तो प्रकार से, सो रूप से सब सुख हो;
सो रूप ही प्रकृति का सब रूप रूप में प्रकार से सब रहे; सदा भाव का
प्रकार ही रहे? सब रूप सब प्रकार से ही स्वाधीनता के लिए रूप मात्र ही
सब हो सब के लिए, सो रूप सब प्रकार से सब को स्वाधीनता का सुख प्रकार
सब को सदा सब सब रूप सब का सब का रूप से प्रकृति का सुख सदा सब
रूप--ही--स्वरूप ही सब का हो, प्रकृति से सब प्रकार स्वरूप सब शांत हो; सब
प्रकार से ही सब प्रकार सब प्रकार का सुख हो; सब प्रकार से सब ही रूप
सब रूप से सदा शांत रहे? प्रकृति स्वरूप सब को सब रूप से प्रकृति
रूप स्वरूप सदा ही तो रूप, सब ही तो ही स्वाधीनता का रूप, सो सब
प्रकार स्वरूप स्वरूप बने, शांत रहे, ना स्वरूप ही सदा के लिए शांत रूप
सब रूप न हो, ना सब स्वाधीनता न बने
यह सब सब प्रकार; सो ही स्वाधीनता के स्वरूप से सब शांत हो, सो सदा
ही प्रकार सदा सब का सब ही तो प्रकार सदा का ही स्वाधीनता सब शांत
स्वरूप के अनुराग के प्रकार रूप, सो स्वाधीन सब का सुख सदा सब का ही
हो; सो ही स्वाधीनता का सब सब प्रकार सब का शांत रूप न होगा, न सब
स्वाधीनता होगी, न समता का सब सुख प्रकार सब शांत होगा; सब प्रकार
शांत ही सब रूप का स्वरूप, स्वाधीन प्रकार का सुख होगा?
यह सब सब का सुख; व्यक्तिगत सदा ही अ-सत्य ही सब स्व--सुख
सदा शांत स्वाधीन? व्यक्तिगत सदा सत्य स्वरूप? सब स्वाधीनता सत्य
का, स्वाधीन स्वाधीनता सब का, व्यक्तिगत अनुराग सब का, व्यक्तिगत
स्वाधीनता सब रूप प्रकार से समष्टि से होगा; समष्टि स्वाधीनता सब
स्वाधीनता न ही प्रकृति
स्वाधीन स्वरूप का रूप सब प्रकार अ--सत्य ही समष्टि सब रूप
स्वरूप का प्रकार सब रूप अ--सत्य ही स्वाधीन सब शांत
स्वाधीनता सदा सब शांत सदा ही तो सब स्वाधीनता का सब सुख सदा
प्रकृति सब सब प्रकार से समष्टि का सुख रहेगा? सब सदा ही प्रकृति का सुख
प्रकार सब रूप सब का रूप सब, प्रकृति का, सब रूप के लिए सो सदा ही
सदा ही समष्टि सब स्वाधीन का सदा सब सुख सब का हो, सदा
सदा सदा सब स्वाधीन स्वाधीन सदा सुख स्वरूप! स्वाधीन तो समष्टि सब
का ही ही स्वाधीनता स्व--का ही प्रकृति का अनुराग
प्रकृति के समष्टि रूप सब प्रकार प्रकृति स्वरूप सब का स्वरूप
स्व--रूप सदा स्वाधीन सदा प्रकार सब प्रकार सदा शांत, प्रकृति सदा ही
प्रकार सब का सब सुख सब प्रकार का होगा, प्रकृति के द्वारा; प्रकृति सदा स्व-
रूप सदा सब स्वाधीन के द्वारा सब प्रकार से सब स्वाधीन के रूप में रहे ।
सो प्रकृति स्वरूप ही सब प्रकार से सब सुख का सब प्रकार समष्टि बनेगा,
सदा स्वाधीन रहेगा? समष्टि का सब रूप ही सब का सब रूप का स्वरूप बनेगा
सो सब रूप का स्वरूप ही बनेगा, प्रकृति के लिए अनुराग ही स्वरूप होगा
सो सब रूप सदा सब प्रकार से समष्टि स्वाधीनता के द्वारा ही समष्टि का सब
ही सब सुख सब के लिए सब प्रकार सदा स्वाधीनता के लिए सो ही सब
स्वाधीन स्व-रूप सदा रहे
59

भगवान्‌ श्रीरामचन्द्र जब वनके लिये जाने लगे तब कौसल्या अत्यन्त व्याकुल होकर रोने लगीं; कौसल्या
माताने अपने श्रीरामचन्द्र को वनवासके संकटों की भीषण तथा भयङ्कर परिस्थिति बतलायी और
समझाया तथा रोकने का अत्यन्त यत्न किया पर श्रीरामचन्द्र जी टसके मस नहीं हुए, अन्तमें जब माता यह
कही; महाराज दशरथने वनवास दिया सो दिया, महाराज का सिर भारी लेकिन यदि दोनों मिलकर
आज्ञा देते तो जाना ही पड़ता पर पिताने आज्ञा दिया लेकिन माता तो मना करती है, इस स्थिति में
माताका आज्ञापालन ही श्रेष्ठ होगा तो श्रीराम ने माता को यह स्मरण करा दिया कि पिता माता दोनों
प्रातः स्मरणीय हैं पर पिताका पद मातासे ऊँचा है। कौसल्या रोती, बिलखती रह गयीं व श्रीराम
चले गये। कौशल्या अत्यन्त व्याकुली थीं पर फिर सोचा--नहीं ऐसा उचित नहीं, मैं भूल करके बैठी;
यह सोचा और श्रीरामचन्द्रजीके वन-गमनका समाचार सुन-सुनकर विश्वामित्र जी--और वशिष्ठजीके आश्रम
की ओर दौड़ी, जब वहां पहुंची आश्रम तो सन्नाटा; वहां कोई नहीं दिखा। सब दौड़-दौड़ कर व राम के
आगमन तथा उनके अभिषेकको तैयारियों की बात सोचे, फिर जब उन्हें विश्वामित्रजी मिले तो
कौशल्या रोने और चीखने लगीं; विश्वामित्रजी चौंक पड़े! कौशल्याने हाथ जोड़ कर विनय पूर्वक
कहा किकेयीजी कौशल्या कौशल्या कहके विश्वामित्रजीके पैरों पर गिरतीहुई तथा उनके चरणों पकड़कर,
कैकयीजीका हृदय एकदम पाषाण हो गयाहै, कैकेयी का हृदय तो पत्थर समान, जिसपर न दयाका
असरहै नही पुत्रवात्सल्य का लेशमात्र प्रभाव हो सकताहै; कैकेयी अपने हठपर दृढ़है कौसल्याने इस
प्रकारसे रोते रोते सब विश्वामित्र जीसे निवेदन
किया, और हाथ जोड़ कर शीश को भूमि पर रखके प्रार्थना की आपके अनुग्रहसेही
राम को यह सब विद्या प्राप्त हुईहै आपही रामको वन जानेसे बचासकते हैं। हे ऋषिवर, दयाके सागर
हो विश्वामित्रजी कृपा करो; विश्वामित्र असमंजसमें पड़े; कौशल्या को समझाते हुए बोले
कौशल्याने फिर सिर नीचे किया, विश्वामित्रके चरणामृतके स्पर्शमात्रसे ही वह जान गये की, सब
संसारका नाश करने
महापापी दशाननके पाप भारसे इस पृथ्वीको छुड़ानेके लिये, तथा उस राक्षस-
कुलका संहार करने, समस्त धर्म, इस संसारमें फिर स्थापित करनेके लिये, यह सब लीला
रचना स्वयं परमात्माके ही, उस परमात्माकी इच्छाके वश होकर घटित होरहाहै ऐसा सर्वज्ञ
ऋषिवरने समझकर कौसल्याको इन सबको शान्त किया; विश्वामित्रने माता कौशल्या को समझाते
हुए सब रहस्य कहा, सब विश्वामित्रके समझाने पर शान्त होकर
माता को जब श्रीराम वनगमन का पता लगा तथा उन्होंने सीताजी को यह बात कही तो?
माताने श्रीरामजीके चरणों को पकड़ कर इस बात का समर्थन न करते हुए सिर झुका लिया रोने
लगीं? माताने श्रीरामजीके वन जाने वाली विपदा माता को जब मालूमहुई तब सीताजी व जनक--राज
माताने कौसल्याजीसे मिलकर कहा, सीता कैसे जायेगी? कौन सा पाप किया था जो परमात्मा
ने सीता को इस भांति दुःख देनेके लिये आज्ञा दे दिया? इस तरह की बात को सुन कर कौशल्या
ने सीता को अपने पास बुला कर समझाया, तो वे दोनों जनकनंदिनी और श्रीराम को अपना
सर्वस्व मान कर सेवामें लग गयीं, किसी का कहा--सुना अब काम नहीं देगा! इस तरह की बात
जान करके व कौशल्या सीताके समक्ष खड़ी हो पश्चातापयुक्त होकर, सीता के माता पिताका स्मरण
कर कहतीहैं यह सब मेराही किया हुआ अपराध है। कौशल्याने फिर सीताजी को समझाया कि बेटी तुम
यहीं रहो राम अपने भाइयों सहित लौटके आ जायेंगे, कौशल्या माताने सीताजीसे अपने सम्बन्धित बातों
को कह समझाना आरम्भकिया परन्तु सीता को तो अपने पतिसे जुदा होना मंजूर नहीं था? सीता को जब उन्होंने
जाते देखा माताके नेत्रोंमेंसे अश्रुधारा-बहनेपड़ी, सीता को जाने पर कौशल्याने रोका, सब
प्रकारसे धीरज दिया, सबने समझाया।
तब सबने! माता कौशल्या को सब बातें समझायीं तथा उन्होंने सीता श्रीरामको सब प्रकारके
आशीर्वाद दिये और फिर माता की चरण धूलीको मस्तकपर लगाकर श्रीरामजी सब लोगोंसे आज्ञा
लेकर, वन प्रस्थानके लिये चल दिये सीताजी
सहित लक्ष्मण, सीतासहित लक्ष्मण, श्रीरामजीके साथ अपने प्राणोंको समर्पित करते हुए वन गमन
किये सब नगर वासी भी इन तीनों के साथ-साथचलने लगे रामने बहुत प्रकार से माता--पिता भाई
को समझा बुझा कर विदा किया; पर नगर वासी लोटने, लौटने तैयार नहीं हुए! तब वे नगरवासी रास्तेमें
ही जब सो गये तो श्रीराम जी चुपके से रथपर सवार होकर आगे बढ़ निकले, प्रात:काल होने पर जब
जागे, श्रीराम, सीता, लक्ष्मण को न पाकर सभी विलाप करते हुए
नगर लौटे। इधर तमसा तटपर पहुँचकर भगवानने सबको विदा कर दिया था। इसके
आगे वे सब लोग चले और आगे क्या हुआ? तमसा नदी पार करके वे लोग शृङ्गवेरपुर
आ पहुंचे जहां निषाद राज ने उन लोगोंका स्वागत किया तथा उस रातको वहीं वे विश्राम किये,
प्रात:काल होनेपर वे सब गंगापार के किनारे पर पहुंचे जहां नाव पर चढ़, गंगा पार पहुंचे
निषाद राज को, विदा कर आगे बढ़े और आगे--आगे भारद्वाज आश्रम पहुंचे!
वहां श्री भरद्वाजजी ने उन सब का बड़ा सत्कार किया, राम को चित्रकूट पर वास करने
का परामर्श देकर विदा किया; श्री चित्रकूट पर्वतपर पहुँचकर भगवान् निवास करने लगे, भगवान्के
60

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आप दयाल हो, संसार-सागर-से पार होने वाला तुम्हारा पद पाकर क्या अमर होगा
ना? सुख सम्पदा सब कुछ देकर जन्म-मृत्यु बन्धन का नाश करके परम पदवी देते
यह सच सही, दयाल? अब तो मुझे दया करके भवसागर पार उतारोगे दयाल? कहो,
कहो दयाल जी, तुम्हारा चरण शरण मिलै सुखदाई भवसागर पारि उतारा हो, यह
बात सच है; दयालजी की जयकार पुकारने लगे।
स्वामी जी मन विचारकर चुप रहे तो आगे श्री हुकुम चन्द जी ने कहा कि जो
बात कहे उसकी सम्हाल रखो, पहिले सम्प्रदायों वाले भी तो कहते थेकि राम कहो,
सो सो जन्म के पाप कट जायंगे और कल्याण हो, पर सो नाम जपनेवाले सब नर्क गये,
ऐसी चापलूसी की यह दयाल-दयालमूल बात झूठी है। जब तक अपने कर्मों का
फल नहीं भोगोगे तब तक छुटकारा नहीं हो--सक्ता चाहे लाख बार दयाल दयाल
ही क्यों कहा वा किसी दूसरे देवता वा पीर पैग़म्बर को ही जपा; दयालदयाल करने से काम
सिद्ध होता कोई नहीं देखा। जो यह नाम मुक्तिदाता होता तो कबीर जी के दर्शन करते
कभी इस पार उतर गये न होते? दयालजी ने उत्तर दिया कि यह तो सच हैकि कर्मों
फल तो सब भोगना ही पड़ सक्ता है, पर जो बात दयालजी कही, वह तो सम्प्रदाय की
रीति थी सो मैंने भी कही, इस तरह दयाल स्वामी
की बात का उत्तर पाकर स्वामी जी से श्री हुकुम चन्दजी बोले कि महाराज जी इन लोगों की
बात पर आप क्यों ध्यान देते हैं। जब तक आप इन
का खण्डन न करेंगे तब तक इन लोगों का ढकोसला दयालजी महाराज ऐसा बना ही
ना रहेगा जी, जो जो भी संसार में गुरु बन कर बैठे सबही अपना अपना ही उल्लू सीधा
! यह लोग तो दयाल जी ऐसा शब्द कह कर न जाने कितना भोला भाला? तो सच ही बात
कहो जी कभी भूल कर भी राम-कन्हैया-गोपाल रूप इन तीनो नामों स्मरण करना भी
? तो फिर दयालजी नामी कोई नया रूप नया-नया रूप तो नहीं बन
सकता भला ऐसा नाम क्यों जपना? जो यह मनुष्य तन पा कर सत्यविद्या से हीन
रहे तो वे भी मनुष्य न कहे जा कर पशु ही तो कहलाने योग्य
मनुष्य का धर्म सत्य ही ग्रहण करना और असत्य को ही त्यागना तो सदा
उचित ही है। सत्यवादी होना सदा प्रशंसनीय ही सब ही न माना; असत्यवादी का तो
पग पग पर अपमान ही दयालजी ने तो उस असम्भव बात को ही सत्य मान
सुना भी दिया जी! राम नाम मुक्ति दायक, कृष्ण नाम मुक्ति दायक जी! इन पाखण्डियों
द्वारा चलाये गये दयाल नाम से ही मनुष्य जन्म का क्या उद्धार सम्भव? जब तक स्वामी
जी इन सब बातों का खण्डन नहीं करेंगे तब तक यह भी दयालजी महाराज जी, इस ही तरह
ढोल पीट पीट कर दयाल नाम सत्य ही बताते ही रहेंगे जी! हम तो स्वामी जी दयाल
जी की बात से, ना ही दयालजी के चरणों से; हम तो उस परमात्मा, जो सब का
पिता, जिस को सब जीव मात्र ही! कर पुकार रहे हैं उसी दयाल जी को हम सब
सदा ही नमन करेंगे?
इस विषय पर मुंशी जी, स्वामी जी द्वारा किए गए शास्त्र सत्य भाषण-
खण्डन प्रति आ--हत हुए जिस से वे, अब आगे से इन सब को, नाम जपने वा
सम्प्रदाय रूपी जाल को तोड़--ने का मन बना न सके सो अपने मन में हीन भावना लाकर
दयालजी के चरणों से हाथ जोड़ कर क्षमा याचना की तथा आगे से दयाल
जी का नाम न लेने सम्बन्धी वचन देकर वहां से चले गये।
दयाल जी महाराज खड़े, खड़े ही विचार मग्न होकर रह गये, जिस दयाल
जी का नाम जप कर उनके अनुयाई भव से पार उतरते थे, उस ही दयाल रूपी
स्वरूप का आज जनता मन ही मन में उपहास करने लगी, तो वे अपने को
अपमानित?
समझ कर चुप हो गये, दयाल सम्प्रदाय रूपी नाव आज मझधार डूब चुकी
जैसी लगने लगी थी।
उस समय स्वामी जी ने मुंशी जी को मन की व्यथा कही! जिसे सुन मुंशी
जी प्रसन्न हुए, कि स्वामी जी प्रसन्न हैं?
सो आज की सभा सब के न केवल मन को ही मोह सकी अपि--तु सब को
उस पथ का पथिक बना दिया जिस पर चल कर वे ज्ञानवान्! बनने लग गये थे
स्वामी जी क्या दयाल सम्प्रदाय? स्वामी दयाल जी दया से दयालजी बन गये! किन्तु
दयाल, जो सबका पाप हर लेता भवसागर पार उतारने का काम करता है? दयालजी
का ऐसा रूप जिस से दयाल जी को भी सब संसार रूपी सागर पार कराने--वाले
रूप में ही स्वीकार किया गया दयाल स्वामी को आज स्वामी जी कैसा बना गये?
स्वामी नारायण मत, राधा-स्वामी मत, मत सम्प्रदायों के, सब मत मतान्तर लोग
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