निराले सद्गुरु
Nirale Satguru
by साहिब बन्दगी
Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)
Page 37 of 112
Read in contextनिराले सद्गुरु \hfill 37
अंत में ऐसे साथ देते हैं आप
रिहाड़ी (जम्मू) में रहने वाला विद्यासागर जब आपके पास एक दिन राँजड़ी में आया तो आपने कहा कि अब चलने की तैयारी कर लो, समय आ गया है, अब सुरति साहिब में ही रखना। बस, फिर क्या था! जैसे ही वो दिन आया, उसे अंदर से इशारा हो गया कि आज चलना है। उसने अपनी पत्नी को बता दिया कि आज साहिब मुझे लेने आ रहे हैं। जब आपने उसकी सुरति को खींचना शुरू किया तो उसने अपना सिर पत्नी की गोद में रख लिया और सब हाल बताने लगा। वो बताने लगा कि ऐसे-ऐसे साहिब मुझे ले जा रहे हैं। अब एक स्थान पर निरंजन से सामना भी हुआ। वो बताने लगा कि अब निरंजन का साहिब से युद्ध हो रहा है। साहिब के हाथ में मेरे नाम की ज्योति है जिसे निरंजन बुझाए जा रहा है जबकि साहिब उसे बार-बार जलाए जा रहे हैं। उसने बताया कि घोर तूफान चल रहा है, जहाँ यह युद्ध चल रहा है। आधा घण्टा इस युद्ध का विवरण देने के बाद उसने बताया कि अब निरंजन हार गया है और साहिब मुझे जिताकर ले चले हैं। इतने में उसका शरीर से जो तार जुड़ा हुआ था, वो टूट गया और आप उसे अमर लोक ले गये।
जब भी किसी नामी का अंतिम समय आता है तो आप उसका ऐसे ही साथ देकर निरंजन से बचाकर अमर-लोक ले जाते हैं। जब भी कोई आपको पुकार करता है, आप पहुँच जाते हैं। यह पुकार तभी हो पाती है, यदि पूरा विश्वास हो। इसलिए आप केवल विश्वास की ही माँग करते हैं। नाम तो है ही है। जिसके पास नाम है, उसका निरंजन कुछ बिगाड़ नहीं सकता है। पर सद्गुरु के बिना अमर-लोक नहीं जाया जा सकता है। इसलिए सद्गुरु का भरोसा चाहिए। नाम पाने के बाद भी यदि भरोसा नहीं किया तो अटक जाते हैं। यदि सद्गुरु का पूरा भरोसा हो तो आप ऐसे ही साथ देते हैं।
करता जो परतीत आपकी, लाता चरणों प्रीत।
काल निरंजन रोक न पाता, चलता भवजल जीत ॥