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निराले सद्गुरु

निराले सद्गुरु

Nirale Satguru

by साहिब बन्दगी

Source: Sahib Bandgi Sant Ashram Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Distt. Samba (J & K) (origin)

DevanagariHindipublished112 pages

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38साहिब बन्दगी

सबके दुख को समझते हैं आप

आपके पशु बड़े चेतन हैं। आपका मानना है कि आदमी तो फ़ालतू बोलता है, बेकार काम करता रहता है, कहीं तिनके तोड़ता है, कहीं कुछ, पर पशु नहीं। आप कहते हैं कि बच्चा क्यों रोता है, क्योंकि उसके पास भाषा नहीं है। वो अपने भाव रोकर व्यक्त करता है। सभी तो रोते हैं। क्यों? क्योंकि भाषा नहीं है।

आप अरनिया में सत्संग कर रहे थे तो एक भैंस चिल्ला रही थी। किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसे तो धूप में बाँध रखा था। वो परेशान थी। वो कह रही थी कि मैं छाया में नहीं जा पा रही हूँ, मुझे बाँध रखा है। आपने एक सत्संगी को धूप में खड़ा किया। एक मिनट बाद पूछा कि कैसा लग रहा है? उसने कहा कि बहुत कष्ट है। आपने उसी को वहाँ भेजा; कहा कि उस भैंस को खोलकर छाया में बाँधो; चाहे जिसकी भी भैंस हो। फिर आपने देखा कि उसे प्यास भी लगी थी। तो आपने एक को कहा कि बाल्टी लेकर जाओ और उसे पानी पिलाओ।

दुनिया के लोग तो तेरा-मेरा कर रहे हैं। यही बात है कि दूसरे से घृणा कर रहे हैं। अपनापन नहीं दिखा रहे हैं। आपको हर प्राणी अपना लगता है। संपूर्ण विश्व अपना लगता है। ये केवल कहने में ही नहीं; यही सत्य है। आपको सबकी पीड़ा अपनी लगती है। आपने यह फैसला भी किया है कि जो गाएँ बेघर हैं, उन्हें भी इकट्ठा करके उनकी सेवा करूँगा; किसी को लगा दूँगा उनकी सेवा में; कहूँगा कि यही मेरी सेवा मानना।

एक गाय गुरुद्वारे में थी, पर वो उनकी सेवा नहीं कर पा रहे थे। गाय गजब की थी। वो 20 किलो दूध देती थी। किसी ने कहा कि साहिब-बंदगी वालों को दे दो। 1993 में उन्होंने उसे 17 हज़ार में दिया। पैसे तो ज़्यादा थे, पर गाय अच्छी थी। उसने तीन बछड़ियाँ दीं; वो भी बड़ी ही प्यारी थीं, माँ की तरह थीं। बड़ी होकर वो भी बहुत दूध देने