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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 206 of 770

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Page 206

२०४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

लौकिक कहा गया है—उनका अनुसरण मनुष्य करते हैं। षड्जस्वर देवताओंको और ऋषभस्वर ऋषि-मुनियोंको तृप्त करता है। गान्धारस्वर पितरोंको, मध्यमस्वर गन्धर्वोंको तथा पञ्चमस्वर देवताओं, पितरों एवं महर्षियोंको भी संतुष्ट करता है। निषादस्वर यक्षोंको तथा धैवत सम्पूर्ण भूत-समुदायको तृप्त करता है। गानकी गुणवृत्ति दस प्रकारकी है अर्थात् लौकिक-वैदिक गान दस गुणोंसे युक्त हैं। रक्त, पूर्ण, अलंकृत, प्रसन्न, व्यक्त, विक्रुष्ट, श्लक्ष्ण, सम, सुकुमार तथा मधुर—ये ही वे दसों गुण हैं। वेणु, वीणा तथा पुरुषके स्वर जहाँ एकमें मिलकर अभिन्न-से प्रतीत होते हैं और उससे जो रञ्जन होता है, उसका नाम 'रक्त' है। स्वर तथा श्रुतिकी पूर्ति करनेसे तथा छन्द एवं पादाक्षरोंके संयोग (स्पष्ट उच्चारण)-से जो गुण प्रकट होता है, उसे 'पूर्ण' कहते हैं। कण्ठ अर्थात् प्रथम स्थानमें जो स्वर स्थित है, उसे नीचे करके हृदयमें स्थापित करना और ऊँचे करके सिरमें ले जाना—यह 'अलंकृत' कहलाता है। जिसमें कण्ठका गद्गदभाव निकल गया है और किसी प्रकारकी शङ्का नहीं रह गयी है, वह 'प्रसन्न' नामक गुण है। जिसमें पद, पदार्थ, प्रकृति, विकार, आगम, लोप, कृदन्त, तद्धित, समास, धातु, निपात, उपसर्ग, स्वर, लिङ्ग, वृत्ति, वार्तिक, विभक्त्यर्थ तथा एकवचन, बहुवचन आदिका भलीभाँति उपपादन हो, उसे 'व्यक्त' कहते हैं। जिसके पद और अक्षर स्पष्ट हों तथा जो उच्च स्वरसे बोला गया हो, उसका नाम 'विक्रुष्ट' है। द्रुत (जल्दबाजी) और विलम्बित— दोनों दोषोंसे रहित, उच्च, नीच, प्लुत, समाहार, हेल, ताल और उपनय आदि उपपत्तियोंसे युक्त गीतको 'श्लक्ष्ण' कहते हैं। स्वरोंके अवाप-निर्वाप (चढ़ाव-उतार)-के जो प्रदेश हैं, उनका व्यवहित स्थानोंमें जो समावेश होता है, उसीका नाम 'सम' है। पद, वर्ण, स्वर तथा कुहरण (अव्यक्त अक्षरोंको कण्ठ दबाकर बोलना)—ये सभी जिसमें मृदु-कोमल हों, उस गीतको 'सुकुमार' कहा गया है। स्वभावसे ही मुखसे निकले हुए ललित पद एवं अक्षरोंके गुणसे सम्पन्न गीत 'मधुर' कहलाता है। इस प्रकार गान इन दस गुणोंसे युक्त होता है।

इसके विपरीत गीतके दोष बताये जाते हैं—इस विषयमें ये श्लोक कहे गये हैं। शङ्कित, भीषण, भीत, उद्घुष्ट, अनुनासिक, काकस्वर, मूर्धगत (अत्यन्त उच्च स्वरसे सिरतक चढ़ाया हुआ अपूर्णगान), स्थान-विवर्जित, विस्वर, विरस, विश्लिष्ट, विषमाहत, व्याकुल तथा तालहीन—ये चौदह गीतके दोष हैं। आचार्यलोग समगानकी इच्छा करते हैं। पण्डितलोग पदच्छेद (प्रत्येक पदका विभाग) चाहते हैं। स्त्रियाँ मधुर गीतकी अभिलाषा करती हैं और दूसरे लोग विक्रुष्ट (पद और अक्षरके विभागपूर्वक उच्च स्वरसे उच्चारित) गीत सुनना चाहते हैं। षड्जस्वरका रंग कमलपत्रके समान हरा है। ऋषभस्वर तोतेके समान कुछ पीलापन लिये हरे रंगका है। गान्धार सुवर्णके समान कान्तिवाला है। मध्यमस्वर कुन्दके सदृश श्वेतवर्णका है। पञ्चमस्वरका रंग श्याम है। धैवतको पीले रंगका माना गया है। निषादस्वरमें सभी रंग मिले हुए हैं। इस प्रकार ये स्वरोंके वर्ण कहे गये हैं। पञ्चम, मध्यम और षड्ज—ये तीनों स्वर ब्राह्मण माने गये हैं। ऋषभ और धैवत—ये दोनों ही क्षत्रिय हैं। गान्धार तथा निषाद—ये दोनों स्वर आधे वैश्य कहे गये हैं और पतित होनेके कारण ये आधे शूद्र हैं। इसमें संशय नहीं है। जहाँ ऋषभके अनन्तर प्रकट हुए षड्जके साथ धैवतसहित पञ्चमस्वर मध्यमरागमें प्राप्त होता है, उस निषादसहित