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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages

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४० प्रेम-दर्शन
है; इस आत्मरतिमें नित्य स्थित रहनेको ही अव्यक्तोपासक
महानुभाव भक्ति कहते हैं। श्रीशंकराचार्यजीने कहा है—
मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी।
स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते॥
आत्मरूपसे प्रत्येक प्राणीमें श्रीभगवान् ही विराजमान हैं, अतः
उन सर्वात्मामें रति होना वस्तुतः भगवान्‌की भक्ति ही है और ऐसी
भक्ति करनेवालेको मुक्ति प्राप्त होनेमें कोई सन्देह नहीं।
नारदस्तु तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे
परमव्याकुलतेति ॥ १९ ॥
१९-परन्तु देवर्षि नारदके मतसे अपने सब कर्मोंको
भगवान्‌के अर्पण करना और भगवान्‌का थोड़ा-सा भी
विस्मरण होनेमें परम व्याकुल होना ही भक्ति है।
नारदजीको महर्षि व्यास, गर्ग और शाण्डिल्य-कथित भक्तिके
लक्षणोंसे कोई विरोध नहीं है। भगवान्‌की पूजा करना, भगवान्‌के
गुणगान करना और सर्वात्मरूप भगवान्‌में प्रेम करना उचित और
आवश्यक है। व्यासजीको तो भगवद्गुणगानमें श्रीनारदने ही लगाया
था। अतः इन लक्षणोंका खण्डन करने या इन्हें तुच्छ बतलानेके लिये
नहीं, परन्तु इन्हींको और भी पुष्ट करनेके लिये नारदजी इन सभी
लक्षणोंसे युक्त एक सर्वांगपूर्ण भक्तिका लक्षण निर्देश करते हुए कहते
हैं कि अपने समस्त कर्म, (वैदिक और लौकिक) भगवान्‌में अर्पण
करके प्रियतम भगवान्‌का अखण्ड स्मरण करना और पलभरके
लिये भी उनका यदि विस्मरण हो जाय (प्रियतमको भूल जाय) तो
परम व्याकुल हो जाना, यही सर्वलक्षणसम्पन्न भक्ति है। इसमें पूजा-
कथामें अनुराग और विश्वात्मा भगवान्‌में रति तो रहती ही है।
भगवान्‌ने श्रीमद्भगवद्गीतामें सब प्रकारके योगियोंमें इन्हीं लक्षणोंसे
युक्त भक्ति-योगीको सर्वोत्तम बतलाया है—