मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
About this granth
Mudrarakshasa (मुद्राराक्षसम्), "Rakshasa's Signet Ring", is Vishakhadatta's seven-act political drama, unusual in Sanskrit theatre for having statecraft rather than romance at its centre. After the fall of the Nandas, Chanakya sets out to win over Rakshasa, the loyal Nanda minister, as minister to Chandragupta Maurya. The plot turns on the capture of Rakshasa's seal, a staged quarrel between Chanakya and Chandragupta, a forged letter, and the breach between Rakshasa and his ally Malayaketu.
This edition carries a simple Sanskrit commentary, Hindi translation and notes by Tarinish Jha, Vyakarana-Vedantacharya, with a full introduction by Dr. Surendradev Shastri, head of Sanskrit at Town Degree College, Ballia. It was published by Ramnarayanlal Beniprasad, Allahabad; this copy is the third edition of 1983.
The introduction explains the kinds of poetry, the definition of a nataka, types of plot, and the origin and growth of Sanskrit drama, which makes the book well suited to students. It runs to about 488 pages.
( ६७ )
बड़े दुःख के साथ वह उत्तर देता है कि इस नगर में जिष्णुदास नामक एक सेठ है जो कि मेरा परम मित्र है। उसने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति दान में दे दी है और वह अग्नि में जल मरने के लिये नगर से बाहर चला गया है। अतः उसकी मृत्यु के समाचार को सुनने से पूर्व ही मैं अपना प्राणान्त कर देने के लिये फाँसी लगा रहा हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष के मित्र के मरने के कारण को जानना चाहता है। पुरुष बतलाता है—मेरे मित्र का एक अभिन्न मित्र चन्दनदास इसी नगर का निवासी है। उसने मन्त्री राक्षस के परिवार को अपने यहाँ छिपा रखा है। चाणक्य एवं चन्द्रगुप्त द्वारा बार-बार मांगे जाने पर भी वह राक्षस के परिवार को उनके संरक्षण में नहीं दे रहा है। अतः उसे फाँसी का दण्ड दिया गया है। इसी कारण उसका मित्र जिष्णुदास उसकी मृत्यु से पूर्व ही अपने को अग्नि मे भस्मसात् कर देना चाहता है। और मैं भी अपने मित्र जिष्णुदास के मरने से पूर्व ही मर जाना उचित समझता हूँ। यह सुनकर राक्षस उस पुरुष से कहता है कि तुम जाकर जिष्णुदास को मरने से रोको। मैं भी चन्दनदास के प्राणों की रक्षा अपनी तलवार से करूँगा। बाद में जब वह पुरुष यह जान लेता है कि यही मन्त्री राक्षस हैं तो वह उनके पैरों पर गिर जाता है और कहता है—"आप तलवार द्वारा चन्दनदास को बचाने का उपाय न करें क्योकि शकटदास सम्बन्धी घटना के पश्चात् बधिक लोग अत्यधिक सतर्क हो गये हैं। यदि वे लोग वध्यस्थल पर सशस्त्र आते हुये किसो को देख लेते हैं तो वध्य व्यक्ति को तुरन्त ही मार डालते हैं।" इसके अनन्तर वह पुरुष चला जाता है।
तदनन्तर राक्षस सोचता है कि चाणक्य महान् कूटनीतिज्ञ है। यदि उसने अपनी योजना के अनुसार शकटदास को मेरे समीप भिजवाया था तो उसको मारने के लिये नियुक्त वधिको को क्यों प्राणदण्ड दिया ? और यदि शकटदास उसकी योजना का अंग नहीं है तो उसने मेरे विरुद्ध ऐसा कूट-पत्र क्यों लिखा ?
इस भाँति सोचता हुआ राक्षस निश्चय करता है कि यदि शस्त्र-बल से चन्दनदास को बचाना कठिन है तो मैं उसके छुटकारे के लिये आत्मसमर्पण ही कर देना उचित समझता हूँ।
सप्तम अङ्क—वधिको के साथ वध्यवेष को धारण किये हुये चन्दनदास
( ६८ )
चला जा रहा है। उसके साथ उसकी स्त्री और बच्चे भी चल रहे हैं। एक वधिक आगे-आगे यह घोषणा करता हुआ चल रहा है कि हट जाना लोगो, हट जाओ। यदि तुम लोगो को अपने प्राण, धन-सम्पत्ति तथा परिवार से मोह हो तो विष के सदृश राजद्रोह से अपने को बचाये रहो।
वध्यस्थान पर पहुँचकर चन्दनदास अपनी पत्नी को समझाता है कि मुझे यह दण्ड किसी अनुचित आचरण के कारण नही दिया गया है, मित्र के कार्य से ही मुझे यह दण्ड मिला है। अतः यह रोने का समय न होकर प्रसन्नता का है। अब तुम वापिस घर जाओ। रुदन करता हुआ उसका पुत्र उसे प्रणाम करते हुये अपने भावी कर्तव्य के बारे में उससे पूछता है। चन्दनदास कहता है— "बेटा ! वहाँ जाकर रहना, जहाँ चाणक्य न पहुँच सके।" इतने में वधिक चन्दनदास से कहता है "सेठ जी ! शूली गढ चुकी है, तैयार हो जाइये।" यह सुनते ही चन्दनदास की पत्नी चिल्लाने लगती है—"लोगो, बचाओ रे बचाओ !" इसी समय राक्षस आकर वहाँ उपस्थित हो जाता है और वधिको से कहता है—"चन्दनदास को मत मारो और दुष्ट चाणक्य से कह दो कि राक्षस आ गया है वह यहाँ वध्यशाला में स्थित है।"
यह समाचार पाकर चाणक्य आता है। वह राक्षस के चरणो का स्पर्श कर प्रणाम करता है। राक्षस कहता है कि मैं चाण्डालों द्वारा छुआ जा चुका हूँ अतः मुझे न छुइये। यह सुनकर चाणक्य उसे बतलाता है कि ये चाण्डाल नहीं हैं। इनमें से एक तो आपका सेवक सिद्धार्थक है और दूसरा राजपुरुष है जिसका नाम भुसिद्धार्थक है। इन्हीं दोनों के द्वारा विश्वास उत्पन्न कर शकटदास द्वारा, बिना उसके कुछ भी जाने-बूझे, मैंने ही वह कूट-पत्र लिखवाया था। भद्रभट, जीवसिद्धि आदि सभी मेरे ही गुप्तचर हैं। जीर्ण उद्यान में फाँसी लगाने वाला पुरुष भी मेरा ही गुप्तचर था। यह सब कार्य मैंने आपसे चन्द्रगुप्त का सम्बन्ध स्थापित करने के निमित्त किया है।
इतने में चन्द्रगुप्त भी वहाँ आ जाता है और विनीत भाव से राक्षस को प्रणाम करता है। राक्षस उसे विजयी होने का आशीर्वाद देता है।
इसके पश्चात् चाणक्य राक्षस से कहता है कि यदि आप वस्तुतः चन्दनदास का जीवन चाहते हैं तो इस शस्त्र को ग्रहण कर चन्द्रगुप्त के मन्त्रि-पद को
( ६६ )
स्वीकार कीजिये। लाचार होकर राक्षस शस्त्र ग्रहण कर लेता है। इसी समय एक पुरुष आकर सूचना देता है कि भद्रभट, भागुरायण आदि के द्वारा कैदी के रूप में बँधा हुआ मलयकेतु द्वार पर उपस्थित है। किन्तु चाणक्य उस पुरुष से कहता है कि अब इस बारे में राक्षस से निवेदन करो। राक्षस द्वारा यह कहे जाने पर कि मैं मलयकेतु के समीप कुछ समय तक रह चुका हूँ, अतः इसके प्राण न लिये जायं; चन्द्रगुप्त मलयकेतु को जीवनदान देता है तथा उसे अपने पैतृक राज्य पर स्थापित करा देता है।
तदनन्तर चाणक्य चन्दनदास को सभी नगरों का 'जगत्-सेठ' बना देता है। वह दुर्गपाल एवं विजयपाल को बुलाकर आदेश देता है कि हाथी-घोड़ों को छोड़कर सभी लोगों को बन्धन-मुक्त कर दिया जाय। अब केवल मेरी शिखा का ही बन्धन हो क्योंकि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी है। यह कहकर वह अपनी चोटी (शिखा) बाँध लेता है।
अन्त में राक्षस भरतवाक्य द्वारा चन्द्रगुप्त को पुनः आशीर्वाद देता है।
इतिवृत्त (कथावस्तु) सम्बन्धी सूक्ष्म आलोचना—इस भाँति इसकी कथा-वस्तु का अध्ययन करने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राराक्षस का इतिवृत्त (कथावस्तु) वस्तुतः चातुर्यपूर्ण एवं सुसम्बद्ध तथा सप्रयोजन है। जो व्यक्ति प्रथम बार ही मुद्राराक्षस का अध्ययन कर रहा हो अथवा उसका अभिनय देख रहा हो उसे छठे अङ्क तक विभिन्न क्रिया-कलापों का, कार्यों के घात-प्रतिघातों का, राजनैतिक दाँव-पेंच सम्बन्धी युद्धो का, विश्रृङ्खलित-सा प्रतीत होने वाला जाल-सा प्रतीत होगा। किन्तु जैसे-जैसे मुख्य कथानक आगे की ओर बढ़ता जायगा वैसे ही वैसे सम्पूर्ण विश्रृङ्खलित कार्य-कलाप एक दिशा की ओर अग्रसर होते हुये दृष्टिगोचर होगा तथा सप्तम अङ्क में पहुँचकर वे सभी कार्य-कलाप एकत्रित होकर प्रयोक्ता को अभीष्ट फल प्रदान करते हुये दिखलाई देंगे। सम्पूर्ण क्रिया-कलाप राक्षस को ही वश में करने हेतु किया गया प्रतीत होता है तथा अन्त में परिणाम भी यही होता है कि राक्षस चाणक्य के समक्ष आत्म-समर्पण कर देता है।
मुद्राराक्षस का छोटे से छोटा भी ऐसा कार्य अथवा पात्र नहीं है जो कथानक को आगे बढ़ाने में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान न करता हो अथवा
( ७० )
जिसके अभाव में नाटक का कथानक अपूर्ण न रह जाता हो। इस नाटक में कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जिसकी कि अपनी स्वतन्त्र सत्ता हो। सभी कार्य परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। कथावस्तु की ऐसी सफल तथा चातुर्यपूर्ण योजना सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य के नाटकों में कठिनता से ही उपलब्ध होगी। सम्पूर्ण योजना का गठबन्धन ऐसा सुसम्बद्ध दृष्टिगोचर होता है कि कहीं भी शिथिलता का दर्शन होना सम्भव नहीं है। प्रो० वेबर के मतानुसार सम्पूर्ण संस्कृत-साहित्य में घटना-सामञ्जस्य का इससे उत्तम उदाहरण मिलना सर्वथा असम्भव ही है।
विशाखदत्त ने अङ्कों का विभाजन दृश्यों के आधार पर किया है। उनकी यह अपनी मौलिकता है। अन्य नाटकों में अङ्कों का विभाजन पात्रों को आधार मान कर किया गया है। प्रमुख पात्र प्रारम्भ से अन्त तक रङ्गमञ्च पर प्रायः बने रहते हैं। किन्तु मुद्राराक्षस में ऐसा नहीं हुआ है। इसमें दृश्यों को आधार मानकर अङ्कों का विभाजन किया गया है। इस दृष्टि से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कथावस्तु की योजना के साथ ही साथ दृश्य विधान भी विलक्षण तथा सुव्यवस्थित है।
मुद्राराक्षस का नेता (नायक)
इस नाटक में 'नेता' विषयक प्रश्न विवादास्पद है। कुछ विद्वान् इसका नेता (नायक) चन्द्रगुप्त को मानते हैं तथा कुछ चाणक्य को। चाणक्य को नेता मानने वालों की संख्या अधिक है।
साहित्य-शास्त्रीय सिद्धान्त के अनुसार फल का भोक्ता (अथवा प्राप्तिकर्त्ता) ही नेता कहलाता है। परम्परा भी इसी प्रकार की चली आ रही है। मुद्राराक्षस में भी फल का भोक्ता चन्द्रगुप्त है, राक्षस उसी का मन्त्री बनता है तथा अपनी सेवाओं को उसने चन्द्रगुप्त को ही अर्पित किया है। इसके विपरीत चाणक्य का अस्तित्व चाणक्य रूप में ही अवशिष्ट रह गया है। इस आधार पर कुछ विद्वानों ने चन्द्रगुप्त को ही मुद्राराक्षस का नायक स्वीकार किया है।
अधिकांश विद्वानों का कथन है कि परम्परा की दृष्टि से चन्द्रगुप्त को भले ही नेता मान लिया जाय किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से नेता के बारे में विचार करने पर
( ७१ )
तथा चाणक्य की चारित्रिक विशेषताओं का सम्यक् अध्ययन करने पर चाणक्य ही प्रस्तुत नाटक का नेता (नायक) सिद्ध होता है । नाटककार विशाखदत्त का अभिमत भी चाणक्य को ही नायक मानने की ओर परिलक्षित होता है । नाटक में स्थान-स्थान पर ऐसे संकेत उपलब्ध होते हैं कि जिनसे चाणक्य का ही नेता होना युक्तिसंगत प्रतीत होता है । छठे अंक में उसकी नीति का एक उद्धरण देखिये :—
“जयति जयनसज्जं या अकृत्वा च सैन्यं
प्रतिहतपररक्षा आर्यचाणक्यनीतिः ॥” ६।१॥
यदि फल प्राप्ति सम्बन्धी बात को ही प्रमुख मान लिया जाय तो भी चाणक्य का ही नायक होना सिद्ध हो जाता है क्योंकि नन्द वंश को समूल नष्ट कर देने सम्बन्धी प्रतिज्ञा की पूर्ति कर लेने के अनन्तर शिखाबन्धन रूप फल का भोक्ता वही है ।—वह स्वयं कहता है :—
“पूर्णप्रतिज्ञेन मया केवलं बध्यते शिखा ॥” ७।१७ ।
चाणक्य के इस कथन से ही उसका नायक होना स्वयं प्रतिध्वनित होता है । राक्षस को विवश कर चन्द्रगुप्त का मन्त्री बनाने रूपी फल की प्राप्ति भी चाणक्य को ही हुई है ।
नायक में जिन गुणों का होना अपेक्षित है, वे सभी चाणक्य में विद्यमान हैं । इसके अतिरिक्त नायक का चरित्र सम्पूर्ण नाटक में क्रमशः विकास को प्राप्त होता जाय, यह भी आवश्यक है । ऐसा क्रमिक विकसित चरित्र चाणक्य का ही दृष्टिगोचर होता है, चन्द्रगुप्त का नहीं । चन्द्रगुप्त के चरित्र का तो विकसित स्वरूप प्रायः नगण्य रूप में ही परिलक्षित होता है । अतः इस आधार पर भी चाणक्य का ही नायक होना सिद्ध होता है ।
नाटक का “मुद्राराक्षस” नाम भी इसी पक्ष की पुष्टि करता है । “मुद्रया गृहीतो राक्षसो यस्मिन् तत् मुद्राराक्षससन्नाम नाटकम्” । चाणक्य ने ही मुद्रा का प्रयोग किया है । उसी की सफल राजनीति का यह चमत्कार है कि मुद्रा के द्वारा राक्षस पकड़ा ज
नाटककार विश ने से पूर्व लिखे गये “अभिज्ञानशाकुन्तल” तथ
( ७२ )
‘मृच्छकटिक’ जैसे रूपकों ( नाटको ) का अध्ययन किया होगा तथा उनसे प्रभावित हुए होगे। इन दोनो में क्रमशः अंगूठी सम्बन्धी तथा मिट्टी की गाडी सम्बन्धी छोटी सी घटनाये ही नाटको की कथावस्तु में निर्णायक सिद्ध हुई हैं। ऐसी घटनाओ सम्बन्धी तत्त्वो का प्रवर्त्तन नायक द्वारा ही हुआ करता है। नायक-नायिका अथवा नायक-प्रतिनायक ही इस प्रकार की घटनाओं के दो छोर सिद्ध हुआ करते हैं। ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ की अँगूठी सम्बन्धी घटना ही नायक एव नायिका के चरित के विकास में प्रमुख है। इसी भांति ‘मृच्छकटिक’ में मिट्टी की गाड़ी ही नायक, नायिका एव प्रतिनायक के चरित को विकसित करती है। इसी प्रकार ‘मुद्राराक्षस’ मे भी मुद्रा सम्बन्धी घटना ही चाणक्य ( नायक ) एव राक्षस ( प्रतिनायक ) के चरित्रो को विकसित करने का प्रमुख आधार है। अत इस नाटक का नायक चाणक्य को ही समझा जाना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।
चरित्र-चित्रण—चरित्र-चित्रण की दृष्टि से इस नाटक को अनूठा ही कहा जा सकता है। नाटककार ने चरित्रो के विकास को एक नवीन रूप में चित्रित करने का सफल प्रयास किया है। यदि इस नाटक में अन्य विशेषतायें न होती, केवल चरित्र-चित्रण ही होता तब भी यह नाटक ग्राह्य एव उपादेय होता। इस नाटक में अधिकांश पात्र युगल रूप मे चित्रित किये गये हैं। दो पात्रो के पारस्परिक विरोध तथा सघर्ष में ही प्रत्येक पात्र का चरित्र विकसित हुआ है। जैसे—कूटनीति के प्रयोक्ता चाणक्य और राक्षस, परस्पर विरोधी गुणो को धारण करने वाले राजा चन्द्रगुप्त तथा राजा मलयकेतु, भागुरायण और सिद्धार्थक। चाणक्य को नन्दवंशीय राजाओ के प्रति प्रबल प्रतिशोध की भावना से युक्त चित्रित किया गया है। वह उनके समूल विनाश के लिए उद्यत है। उसका सर्वाधिक कृपापात्र चन्द्रगुप्त है। किन्तु राक्षस की स्थिति पूर्णतया इसकी उलटी ही दृष्टिगोचर होती है—वह नन्दवश के प्रति सच्ची श्रद्धा एव भक्ति से परिपूर्ण है। वह चन्द्रगुप्त को नष्ट कर राज्य को पुन नन्दवंशीय राजाओ को दिलवाने का इच्छुक है। वह चाणक्य द्वारा प्रयुक्त नीति से सघर्ष करने वाला है।
नाटककार विशाखदत्त ने ऐसे चरित्रो की उद्भावना की है जो कि नाटकीय होते हुए भी वास्तविक प्रतीत होते हैं, यथार्थ होते हुए भी जो आदर्श हैं,
( ७५ )
नाटक की प्रस्तावना में :—
“क्रूरग्रहः सकेतुः सम्पूर्णमण्डलमिदानीम्। अभिभवितुमिच्छति बलात्”
इन शब्दों को श्रवणकर और यह समझकर कि “शत्रु चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करना चाहता है” उसका क्रोध जाग्रत हो जाता है और वह तडपता हुआ कहने लगता है :—
“आः क एष मयि स्थिते चन्द्रमभिभवितुमिच्छति ?”
वह निरीह तथा स्वार्थहीन व्यक्ति है। इतने बड़े साम्राज्य का प्रधान मन्त्री होने पर भी उसे अपने मुख-समृद्धि की चिन्ता नहीं है। “सादा जीवन उच्च विचार” ही उसके जीवन का लक्ष्य है। चन्द्रगुप्त के कंचुकी के शब्दों में उसकी इस विशेषता का स्पष्ट परिचय मिलता है :—
“अहो ! राजाधिराजमन्त्रिणो गृहभूतिः !!-कुतः।
उपलशकलमेतद्भे दकं गोमयानां
वटुभिरुपहृतानां बर्हिषां स्तोम एषः।
शरणमपि समिद्भिः शुष्यमाणाभिरभि—
विनमितपटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम् ।।” ३।१५।।
निरीहाणामीशस्तृणमिव तिरस्कारविषयः ।।” ३।१६।।
उसने अपने प्रयत्न से समूल नन्दवंश का नाश कर चन्द्रगुप्त मौर्य को गद्दी पर बिठा दिया किन्तु फिर भी स्वयं निर्लिप्त ही रहा।
वह दैव (भाग्य) में विश्वास नहीं करता है। चन्द्रगुप्त के मुख से जब वह यह सुनता है कि नन्दवंश का विनाश दैव ने किया ( श्लोक सं० ३।२६ से पूर्व ) तो वह कहता है :—
“दैवमविद्वांसः प्रमाणयन्ति”।
इसके साथ ही उसे अपने पुरुषार्थ पर ही पूर्ण विश्वास है।
वह गुणग्राहक भी है। शत्रु के गुणों की भी प्रशंसा वह निःसंकोच भाव से करता है। वह राक्षस के गुणों से पूर्णतया प्रभावित है। इसीलिये वह यह जानता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधान मन्त्री यदि राक्षस को बना दिया जायेगा तो उसका शासनकाल पूर्ण शान्ति तथा निश्चिन्तता से बीतेगा तथा कोई अन्य राजा
( ८१ )
"देव" को ही मानता है, चाणक्य को नहीं—"देवं हि नन्दकुलशत्रुरसौ न विप्रः ॥" ६।७॥ इत्यादि ।
राक्षस में जहाँ इतने गुण हैं वहाँ उसमें कुछ कमियाँ भी हैं। वह दूसरों पर शीघ्र ही विश्वास कर लेता है। इसी कारण उसे पराजय का भी सामना करना पड़ा है। यदि वह सिद्धार्थक तथा जीवसिद्धि पर विश्वास न करता तो उसकी पराजय न हुई होती। उसमें अधिकतर उतावलापन भी दृष्टिगोचर होता है। बीती हुई घटना का विराघगुप्त द्वारा श्रवण करते-करते ही वह वर्तमान काल में उसे समझकर एकाएक कहने लगता है—
राक्षसः—[ शस्त्रमाकृष्य ससम्भ्रमम् ] मयि स्थिते कः कुसुमपुरमुपरोत्स्यति ? प्रवीरक ! प्रवीरक ! क्षिप्रमिदानीम्—
"प्राकारं परितः शरासनधरैः क्षिप्रं परिक्रम्यताम्
द्वारेषु द्विरदैः प्रतिद्विपघटाभेदक्षमैः स्थीयताम् ।
त्यक्त्वा मृत्युभयं प्रहर्तुमनसः शस्त्रोर्बले दुर्बले
ते निर्यान्तु मया सहैकमनसो येषामभीष्टं यशः ॥२।१३॥"
चाणक्य एवं राक्षस का तुलनात्मक चरित्र-चित्रण
नाटककार विशाखदत्त के मुद्राराक्षस में पात्रों का चरित्र प्रायः विरोध की पृष्ठभूमि के साथ चित्रित हुआ है। किन्तु उनका यह विरोध नाटककार की कल्पना-मात्र ही न होकर पात्रों की स्वाभाविकतापूर्ण चारित्रिक विशेषताओं से युक्त है। चाणक्य एवं राक्षस के चरित्र सम्बन्धी तुलनात्मक विवेचन में दोनों के साधर्म्य एवं वैधर्म्य की ओर दृष्टिपात करना आवश्यक है। पहले दोनों के साधर्म्य के बारे में विचारना उचित होगा—
कुल की दृष्टि से दोनों ही ब्राह्मण-कुल की शोभा हैं। दोनों ने अत्यन्त साहसपूर्ण योजनाओं का निर्माण किया है किन्तु साधनों की चिन्ता कभी नहीं की। चाणक्य चन्द्रगुप्त के राज्य को तथा राक्षस मलयकेतु को नन्दों की राजगद्दी पर आसीन कर उसे दृढ़ बनाने हेतु कृतसंकल्प हैं। एतदर्थ दोनों के द्वारा किये गये प्रयास पूर्णतया निःस्वार्थ हैं। दोनों कर्तव्यनिष्ठ होने के साथ ही साथ पूर्ण राजनीतिज्ञ, साहसी तथा बहुविध-साधन-सम्पन्न हैं। अपने-अपने उद्देश्यों की
मु० रा० भू०—६