मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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‘मृच्छकटिक’ जैसे रूपकों ( नाटको ) का अध्ययन किया होगा तथा उनसे प्रभावित हुए होगे। इन दोनो में क्रमशः अंगूठी सम्बन्धी तथा मिट्टी की गाडी सम्बन्धी छोटी सी घटनाये ही नाटको की कथावस्तु में निर्णायक सिद्ध हुई हैं। ऐसी घटनाओ सम्बन्धी तत्त्वो का प्रवर्त्तन नायक द्वारा ही हुआ करता है। नायक-नायिका अथवा नायक-प्रतिनायक ही इस प्रकार की घटनाओं के दो छोर सिद्ध हुआ करते हैं। ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ की अँगूठी सम्बन्धी घटना ही नायक एव नायिका के चरित के विकास में प्रमुख है। इसी भांति ‘मृच्छकटिक’ में मिट्टी की गाड़ी ही नायक, नायिका एव प्रतिनायक के चरित को विकसित करती है। इसी प्रकार ‘मुद्राराक्षस’ मे भी मुद्रा सम्बन्धी घटना ही चाणक्य ( नायक ) एव राक्षस ( प्रतिनायक ) के चरित्रो को विकसित करने का प्रमुख आधार है। अत इस नाटक का नायक चाणक्य को ही समझा जाना अधिक समीचीन प्रतीत होता है।
चरित्र-चित्रण—चरित्र-चित्रण की दृष्टि से इस नाटक को अनूठा ही कहा जा सकता है। नाटककार ने चरित्रो के विकास को एक नवीन रूप में चित्रित करने का सफल प्रयास किया है। यदि इस नाटक में अन्य विशेषतायें न होती, केवल चरित्र-चित्रण ही होता तब भी यह नाटक ग्राह्य एव उपादेय होता। इस नाटक में अधिकांश पात्र युगल रूप मे चित्रित किये गये हैं। दो पात्रो के पारस्परिक विरोध तथा सघर्ष में ही प्रत्येक पात्र का चरित्र विकसित हुआ है। जैसे—कूटनीति के प्रयोक्ता चाणक्य और राक्षस, परस्पर विरोधी गुणो को धारण करने वाले राजा चन्द्रगुप्त तथा राजा मलयकेतु, भागुरायण और सिद्धार्थक। चाणक्य को नन्दवंशीय राजाओ के प्रति प्रबल प्रतिशोध की भावना से युक्त चित्रित किया गया है। वह उनके समूल विनाश के लिए उद्यत है। उसका सर्वाधिक कृपापात्र चन्द्रगुप्त है। किन्तु राक्षस की स्थिति पूर्णतया इसकी उलटी ही दृष्टिगोचर होती है—वह नन्दवश के प्रति सच्ची श्रद्धा एव भक्ति से परिपूर्ण है। वह चन्द्रगुप्त को नष्ट कर राज्य को पुन नन्दवंशीय राजाओ को दिलवाने का इच्छुक है। वह चाणक्य द्वारा प्रयुक्त नीति से सघर्ष करने वाला है।
नाटककार विशाखदत्त ने ऐसे चरित्रो की उद्भावना की है जो कि नाटकीय होते हुए भी वास्तविक प्रतीत होते हैं, यथार्थ होते हुए भी जो आदर्श हैं,