मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary
by महाकवि विशाखदत्त
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स्वीकार कीजिये। लाचार होकर राक्षस शस्त्र ग्रहण कर लेता है। इसी समय एक पुरुष आकर सूचना देता है कि भद्रभट, भागुरायण आदि के द्वारा कैदी के रूप में बँधा हुआ मलयकेतु द्वार पर उपस्थित है। किन्तु चाणक्य उस पुरुष से कहता है कि अब इस बारे में राक्षस से निवेदन करो। राक्षस द्वारा यह कहे जाने पर कि मैं मलयकेतु के समीप कुछ समय तक रह चुका हूँ, अतः इसके प्राण न लिये जायं; चन्द्रगुप्त मलयकेतु को जीवनदान देता है तथा उसे अपने पैतृक राज्य पर स्थापित करा देता है।
तदनन्तर चाणक्य चन्दनदास को सभी नगरों का 'जगत्-सेठ' बना देता है। वह दुर्गपाल एवं विजयपाल को बुलाकर आदेश देता है कि हाथी-घोड़ों को छोड़कर सभी लोगों को बन्धन-मुक्त कर दिया जाय। अब केवल मेरी शिखा का ही बन्धन हो क्योंकि मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण हो चुकी है। यह कहकर वह अपनी चोटी (शिखा) बाँध लेता है।
अन्त में राक्षस भरतवाक्य द्वारा चन्द्रगुप्त को पुनः आशीर्वाद देता है।
इतिवृत्त (कथावस्तु) सम्बन्धी सूक्ष्म आलोचना—इस भाँति इसकी कथा-वस्तु का अध्ययन करने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि मुद्राराक्षस का इतिवृत्त (कथावस्तु) वस्तुतः चातुर्यपूर्ण एवं सुसम्बद्ध तथा सप्रयोजन है। जो व्यक्ति प्रथम बार ही मुद्राराक्षस का अध्ययन कर रहा हो अथवा उसका अभिनय देख रहा हो उसे छठे अङ्क तक विभिन्न क्रिया-कलापों का, कार्यों के घात-प्रतिघातों का, राजनैतिक दाँव-पेंच सम्बन्धी युद्धो का, विश्रृङ्खलित-सा प्रतीत होने वाला जाल-सा प्रतीत होगा। किन्तु जैसे-जैसे मुख्य कथानक आगे की ओर बढ़ता जायगा वैसे ही वैसे सम्पूर्ण विश्रृङ्खलित कार्य-कलाप एक दिशा की ओर अग्रसर होते हुये दृष्टिगोचर होगा तथा सप्तम अङ्क में पहुँचकर वे सभी कार्य-कलाप एकत्रित होकर प्रयोक्ता को अभीष्ट फल प्रदान करते हुये दिखलाई देंगे। सम्पूर्ण क्रिया-कलाप राक्षस को ही वश में करने हेतु किया गया प्रतीत होता है तथा अन्त में परिणाम भी यही होता है कि राक्षस चाणक्य के समक्ष आत्म-समर्पण कर देता है।
मुद्राराक्षस का छोटे से छोटा भी ऐसा कार्य अथवा पात्र नहीं है जो कथानक को आगे बढ़ाने में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान न करता हो अथवा