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मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मुद्राराक्षसम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mudrarakshasam Natakam with Hindi Commentary

by महाकवि विशाखदत्त

DevanagariSanskritpublished488 pages

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तथा चाणक्य की चारित्रिक विशेषताओं का सम्यक् अध्ययन करने पर चाणक्य ही प्रस्तुत नाटक का नेता (नायक) सिद्ध होता है । नाटककार विशाखदत्त का अभिमत भी चाणक्य को ही नायक मानने की ओर परिलक्षित होता है । नाटक में स्थान-स्थान पर ऐसे संकेत उपलब्ध होते हैं कि जिनसे चाणक्य का ही नेता होना युक्तिसंगत प्रतीत होता है । छठे अंक में उसकी नीति का एक उद्धरण देखिये :—

“जयति जयनसज्जं या अकृत्वा च सैन्यं
प्रतिहतपररक्षा आर्यचाणक्यनीतिः ॥” ६।१॥

यदि फल प्राप्ति सम्बन्धी बात को ही प्रमुख मान लिया जाय तो भी चाणक्य का ही नायक होना सिद्ध हो जाता है क्योंकि नन्द वंश को समूल नष्ट कर देने सम्बन्धी प्रतिज्ञा की पूर्ति कर लेने के अनन्तर शिखाबन्धन रूप फल का भोक्ता वही है ।—वह स्वयं कहता है :—

“पूर्णप्रतिज्ञेन मया केवलं बध्यते शिखा ॥” ७।१७ ।

चाणक्य के इस कथन से ही उसका नायक होना स्वयं प्रतिध्वनित होता है । राक्षस को विवश कर चन्द्रगुप्त का मन्त्री बनाने रूपी फल की प्राप्ति भी चाणक्य को ही हुई है ।

नायक में जिन गुणों का होना अपेक्षित है, वे सभी चाणक्य में विद्यमान हैं । इसके अतिरिक्त नायक का चरित्र सम्पूर्ण नाटक में क्रमशः विकास को प्राप्त होता जाय, यह भी आवश्यक है । ऐसा क्रमिक विकसित चरित्र चाणक्य का ही दृष्टिगोचर होता है, चन्द्रगुप्त का नहीं । चन्द्रगुप्त के चरित्र का तो विकसित स्वरूप प्रायः नगण्य रूप में ही परिलक्षित होता है । अतः इस आधार पर भी चाणक्य का ही नायक होना सिद्ध होता है ।

नाटक का “मुद्राराक्षस” नाम भी इसी पक्ष की पुष्टि करता है । “मुद्रया गृहीतो राक्षसो यस्मिन् तत् मुद्राराक्षससन्नाम नाटकम्” । चाणक्य ने ही मुद्रा का प्रयोग किया है । उसी की सफल राजनीति का यह चमत्कार है कि मुद्रा के द्वारा राक्षस पकड़ा ज

नाटककार विश ने से पूर्व लिखे गये “अभिज्ञानशाकुन्तल” तथ