मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
About this granth
Mirabai, the sixteenth-century Krishna devotee associated with the royal house of Mewar, is one of the most loved voices of the bhakti movement. Her padas addressed to "Giridhar Gopal", in a mix of Rajasthani, Braj and Gujarati, have travelled widely in oral and devotional tradition.
This volume is the Meera Brihat Pad Sangrah (मीराँ बृहद् पदावली), whose title page names Padmavati "Shabnam" as compiler. It was published by Lok Sevak Prakashan, Banaras, and distributed by Sahitya Bhavan Ltd., Allahabad; the imprint gives Samvat 2004 and 2006. The introduction notes that almost every song bearing Mira's name used to be accepted as hers, and presents this collection as part of a newer effort to gather her authentic padas.
The songs are grouped by theme: the guru and the company of saints, love for Giridhar Gopal and descriptions of his form, the pain of separation, Mira's replies to the Rana and the poison episode, phag and Holi songs, and surrender and detachment, with a biographical section at the start. It runs to about 365 pages.
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३५
२
किरपा भई सतगुर अपने की बेर बेर, हरि नाँव१ लियो री।
हिरणाकुस प्रल्हाद सतायो, जार अगन बिच डाल दियो री।
राज छाँड दियो नाँव न छाँड़ियो, खम्भ फाड़ प्रभु दरस दियो री।
माता को उपदेस भयो जब, राज छाँड धुजी बन मे गयो री।
मारग मे मिल गए नारद मुनि, तब से धुजी अटल भयो री।
सागर ऊपर सिला तिराई, दुष्ट रावण कूँ मार लियो री।
सीता सहित अवधपुर आयै, भगत बिभीषण राज दियो री।
सब भगतन की सहाय करी प्रभु, मेरी बेर कहाँ सोय गयो री।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बसी बजा के मोहि लियो री।
॥४००॥†
पद के प्रथम पंक्ति से सतमत का प्रभाव स्पष्ट हो उठता है,
परन्तु शेष पद से वैष्णव प्रभाव ही स्पष्ट लक्षित होता है।
३
प्रीत मत तोडो गिरधर लाल।
तुम ही साहुकार तुम ही बोहोर, ब्याज भूल मत जोडो।
साँवरियाँ के कारणे मै तो बाग लगायो, काचा कलियाँ मत तोडो।
साँवरियाँ के कारण मे तो सेज बिछाई, सूनी सेज मत छोड़ो।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, इमरत मे विष मत घोरो।
॥४०१॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबध का निर्वाह नही हुआ है। श्री
सूर्यकरण जी चतुर्वेदी के मतानुसार भी यह पद मीराँ विरचित नही
प्रतीत होता।
१ नाम।
२३६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
४
नन्द को बिहारी म्हारे हियडे बस्यो छै।
कटि पर लाल काछनी काछे, हीरा मोती वालो मुकुट धर्यो छे।
गहिर ल्यो डाल कदम की, ठाडी गोहज मो तन हेरि हस्यो छे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, निरखि दृगन मे नीर भर्यो छे।
॥४०२॥†
पद की तृतीय पंक्ति सर्वथा अर्थहीन है।
५
मिथुला, कर पूजन की त्यारी।
धूप दीप नैवेद्य आरती, सबही सौज लेआ री।
बहु विध सूं पंकवान बनाकर, करो भोग की त्यारी।
जीमेली१ म्हारो पिया गिरधारी, साधां ने बेग बुला री।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर चरणा पर बलिहारी। ॥४०३॥
पाठान्तर १,
मिथुला, सुन यह बात हमारी।
राज भोग की समै३ हुई है, बेग२ थाल सजला री।
छप्पन भोग छतीसो विजन, सीतर जल की झारी।
धूप दीप नई वेद४ आरती, कीजे वेग त्यारी।
धरिये भोग विलम्ब नही कीजिये, मेरी मान पियारी।
जीमे म्हाँरो प्यारो गिरधर, साधा ने बेग बुलारी।
उपर्युक्त पद विशेष विचारणीय है। किसी अन्य को आज्ञा देकर
पूजन की त्यारी करने की अभिव्यक्ति इस पद की विशेषता है। यहाँ
“मिथुला” सम्बोधन भी किस के प्रति हुआ है यह एक विचारणीय
प्रश्न है।
१ भोजन करेगा, २ शीघ्र, ३ समय, ४ नैवेद्य।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३७
६
मन मोह्यो रे बसीवाला।
काँधे कमरिया हाथ लकुटिया, मारियो नैना के भाल।
यक बन ढूँढी सकल बन ढूँढे, कहूँ नही पायो नन्दलाल।
मोर मुकुट पीताम्बर राजे, कानन कुडल छबी बिसाल।
मीराँ प्रभु गिरधर जू की प्यारो, आनि मिल्यो प्यारी गोपाल।
॥४०४॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सम्बन्ध का निर्वाह नही हुआ है।
७
वाह वाह रे मोहन प्यारे, कहाँ चले जादू करि के।
रुप सरूप सलोनी सी डारी, मेरो मन लीनू हर के।
मोर मुकुट सिर छत्र बिराजै, नख पर गिरवर धर के।
दमन कियो नाग काली को, आप घुसे मघ सर के।
फण फण निरत करत यदुनन्दन, अमै कियौ बग बद के।
सब ब्रजलोग छाँडि निज घरकूँ, जाई बसे तर गिर के।
सात दिवस लग सूँड धार, जल इन्द्र पखो पग डर के।
कातिग¹ मास बाल सब मिल कै, नाचै जल मे तिर के।
चोर चोर पुनि बगल डार कै, जाय चढ़े छल करि के।
वृन्दावत की कुज गलिन मे, रास रच्यो छल बल के।
मीरां के प्रभु हरि अविनासी, पानै पडी गिरिवर के ॥४०५॥
पदाभिव्यक्ति असंगत है।
८
पाछो रथ फेरो द्वारका रारा।
सूरज तलफे चदा तलफे, तलफे. नोलख तारा।
१ कार्तिक।
२३८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
गऊ भी तलफे बाच्छा भी तलफे, तलफे गुवाल बिचारा।
जोगी भी तलफे जगम भी तलफे, तलफे समदर खारा।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तुम जीते हम हारा ॥४०६॥†
ऐसी पदाभिव्यक्ति अन्य पदो से सर्वथा भिन्न पडती है।
अन्तिम पंक्ति और शेष पद मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह भी नही
हुआ है।
९
मैया ले थारी लकरी, ले थारी कांवरी,
बछिया हू न जाऊ री।
सग के ग्वाल बाल सब बलिभद्र कूं मोकलो।
⁃ एकलो बन मे डराऊ री।
सघन बन मे कछु खबर नहि परे।
सग के ग्वाल सब मोहे डरावे रे।
दादुर मोर पछी यूं रटे, कृष्ण कृष्ण कहि मोहि खिजावे।
माखन तो बलिभद्र को खिलायो, हमको पिलाई खाटी छाछडी।
वृन्दावन के मारग जातां, पाऊ¹ मे चेभत झीनी काकरी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल तोरी आँख री॥४०७॥†
उपर्युक्त पद का भाषा और भाव के आधार पर गुजराती
पदो से गहरा समन्वय है। गुजराती भाषा का प्रभाव भी स्पष्ट है।
प्रथम अर्द्धांश की भावाभिव्यक्ति का सूरदास के पदो से गहरा साम्य है।
पद की छठी पंक्ति का शेष पद से पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही होता।
अन्तिम पंक्ति द्वितीयार्द्ध सर्वथा अर्थविहीन है। ऐसे पदो को गेय
परम्परा का फल मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
१०
आज अनारी ले गयो सारी, बैठी कदम के डारी हो माय।
म्हारी गैल² फर्यो गिरधारी, हे भाय आज अनारी ले गयो सारी।
१ पैर, २ पीछे।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २३९
मै जल जमुना भरन गई थी, आगयौ कृष्ण मुरारी हे माय ।
ले गयो सारी अनारी हॉररी, जल मे उभी उघारी हे माय ।
सखी साइनी मोरी हँसत है, हँसि हँसि दे मोहि तारी हे माय ।
सास बुरी अरु नणद हठीली, लरि लरि दे मोहि तारी हे माय ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, चरण कमल की बारी हे माय ॥४०८॥†
११
वाटड़ली निहारा जी हरि ठाढौ ।
आप नही आवत पतियाँ नाही मेलत, छाती करी हरि ठाढी¹ ।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, जमुना बहै छै नाडी ।
आप जाय मथुरा मे बैठे, प्रीत रली उहाँ बाढी ।
हम को लिखि लिखि जोग पठावत, आप दूलह कुबज्या भई लाढी² ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, कहा करै जमुना आडी । ॥४०९॥
लगभग ऐसे ही पद गुजराती भाषा के पदो मे भी मिलते हैं।
अन्तिम पंक्ति का द्वितीयांश अर्थविहीन है।
१२
मोरी गलियन मे आवो जी घनश्याम ।
पिछवाडे आए हेला³ दीजी, ललित सखी हे म्हारो नाम ।
पैया परत हूँ बिनती करत हूँ, मत कर मान गुमान ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तेरे चरण मे ध्यान । ॥४१०॥
१ कठिन, मजबूत, २ दूसरी पत्नी, ३ पुकार।
२४० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
विभिन्न भाषाओं में प्राप्त पद
१
कुबज्या ने जादू डारा री, जिन मोहैं श्याम हमारा ।
झरमर झरमर मेहा बरसे, झुक आये बादल कारा ।
निरमल जल जमुना को छाँडो, जाय पिया जल खारा ।
शीतल छाँय कदम की छोडी, धूप सहा अति भारा ।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, बाही प्राण पियारा ॥४११॥†
कही कही प्रथम पक्ति के द्वितीयांश का निम्नांकित पाठान्तर
भी प्राप्त है -- “बिना भाल सुर मारा”।
२
मेरे प्यारे गिरिवरधारी जी, दासी क्यो बिसार डारी ।
द्रोपदी की लाज राखी, सब दुख सो निवारी ।
प्रल्हाद पैज पारी, नृसिंह देह धारी ।
भीलनी के झूठे बैर खाये, कछु जात न बिचारी ।
कुब्जा सो नेह लायो, और गोतम की नारी तारी ।
प्यासी फिरो दरस बिन तलफो, मोहे काहे बिसारी ।
न्यासी फिरो दरस बिन तलफो, मोहे काहे बिसारी ।
मीरा के प्रभु दरसन दीजो, गिरिधर अपनी ओर निहारी ।
॥४१२॥
३
छैल, गैल मत रोकै तू हमारी रे ।
चाल कुचाल चलो जिन चंचल, ऐसी अनीती तैने करमी विचारी रे ।
सखी सग की देखत ठाढी, चरचा करेंगी सब पुरनर नारी रे ।
१ रास्ता ।
२४२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
जो कोई ल्यावै श्याम वैद कूँ, तो उठि बैठूँ हसिके री ।
भृकुटि कमान वान बाँके लोचन, मारत हिय कसिके री ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, कैसो रहो घर बसि के री ॥४१५॥†
पाठान्तर १,
हे माँ बड़ी बड़ी आँखियन वारो साँवरो, मो तन हेरत हँसि के ।
भौंहैं कमान वान वाके लोचन मारत हियरे कसि के ।
जतन करो, जतन लिख बाँधो, ओषध लाऊ घसि के ।
ज्यो तोको कछु और बिथा हो, नाहिन मेरो बसि के ।
कौन जतन करो मेरी आली, चदन लाऊ घसि के ।
जन्तर मन्तर॒ जादू टोना, माधुरी मूरत बसि के ।
साँवरि सूरत आनि मिलावो, ठाडी रहूँ मै हँसि के ।
रेजा रेजा भयो करेजा, अदर देखो धसि के ।
मीराँ तो गिरधर बिन देखे, कैसे रहे घर किस के ।†
उपर्युक्त पाठ की अभिव्यक्ति मे असंगति है । 'चन्द्रसखी' के
नाम पर भी एक ऐसा ही पद प्रचलित है —
हँस के री, माँ री, मेरा मन ले गये आँखनवारो क्वारो, हँसि के ।
भौंहे कवान वान जाके, लोचण मेरे हिवड़े मार्या कस के ।
रेजा रेजा भयो करेजा मेरो, भीतर देखो धस के ।
जतन करो, जन्तर लिखि ल्यावो, ओखद लावो घस के ।
रोम रोम विष छाय रह्यो है, कारो खायो डस के ।
जो कोई मोहन आनि मिलावै, गले मिलूँगी, हँस के ।
चन्द्रसखी भज बालंकृष्ण छबि, क्या रे करु घर बस के ।
६
अंब नही जाने दूँ गिरधारी, थारे म्हारे प्रीत लगी अति भारी ।
बाँको मुकुट काछनी सुन्दर, ऊपर जरद किनारी ।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४३
गल मुतियन की माल बिराजे, कुन्डल की छवि न्यारी ।
बाँकी मो कजरारे नैना, अलकै छुट रहि कारी ।
मद मद मुरली धुन बाजत, मोही बृज की नारी ।
क्षुद्र घटिका कटि सोहै, भुज पर बाजू धारी ।
कडा भरहरी सुधर नेवरी, नूपुर की गुणकारी ।
दुरजन लोग हँसो क्यो ने मोसो, दे दे कर कर तारी ।
मीराँ प्रभु की भई दिवानी, प्रेम मगन मतवारी ॥४१६॥†
पद की सातवी पंक्ति अर्थहीन प्रतीत होती हैं। आठवी पंक्ति
की अभिव्यक्ति और शेष पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह
नही होता। यह पद श्री जगतश्रवण जी के पुजारी जी की जबानी
लिखा गया है। सूर्यकरण जी चतुर्वेदी के मतानुसार इस पद को इस
रूप मे प्रामाणिक नही माना जा सकता है।
७
मेरी चूनर भिजावे, मेरे भिजे अगी पाक।
नन्द महर जी को कुअर कन्हैया, जान न देऊगी मै आज ।
पट पकर के फगवाँ ल्यूँगी, मुख भी डोगी उगराज ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सदा रहो सिरताज ॥४१७॥†
पद की तीसरी पंक्ति सर्वथा अर्थ-विहीन है।
८
जागो मोहन प्यारे ललना, जागो बसीवार।
रजनी बीती भोर भई है, घर घर खुले किवारे ।
गोपी दधि मथुन करियत है, कंगन के झनकारे ।
उठो लाल जी भोर भयो है, सुर नर ठाढै द्वारे ।
ग्वाल बाल सब करत कोलाहल, जय जय शब्द उचारे ।
माखन रोटी हाथ मे लीन्ही, गऊअन के रखवारे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, शरण आये कूँ तारे ॥४१८॥†
२४४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद की प्रथम और अन्तिम पंक्ति के निम्नांकित पाठान्तर भी
मिलते हैं।
“प्रथम पंक्ति . “जागो बसीवारे ललना, जागो मेरे प्यारे।”
अन्तिम पंक्ति . “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, तरण आया कूं तारे।”
अभिव्यक्ति के विचार से इस अन्तिम पंक्ति का प्रथम पाठ ही
उपयुक्त सिद्ध होता है।
९
तुम सो तो मन लाग रह्यो, तुम जागो मोहन प्यार।
भोर भई चिडिया चह्चाई, कागा बोले कारे।
कामनिया ने चीर सभाले, घर घर खुले किवारे।
सारी गऊएँ निकसाई, यमुना लेकर संग ग्वाल रे।
ग्वाल बाल सब द्वारे ठाडे, ठांई हार तिहारे।
घर घर ग्वालन दही बिलोवे, कर कगन झनकारे।
वस्त्र आभूषण तन पर धारो, पागियाँ पेच सवारे।
या ब्रज के प्रभु भूषण तुम हो, तुम ही प्राण हमारे।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, आयी शरण तिहारे ॥४१९॥†
अन्तिम पंक्ति के द्वितीयाश का निम्नांकित पाठान्तर भी मिलता
है। “तुम हो प्राण हमारे।” ऐसी स्थिति मे आठवी और नवी पंक्ति
के द्वितीयाश एक ही हो जाते है । पाचवी पंक्ति का द्वितीयाश
अर्थहीन् है।
१०
सखी मेरो कानूडो, कलेजे की कोर।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल की झकझोर ।
विन्द्रावन की कुज गलिन मे, नाचत नद किसोर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कंवल चितचोर ॥४२०॥†
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४५
११
रे री कौन जाति पनिहारी।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, बीच मिले गिरधारी।
सुन्दर वदन नयन मृग मानौँ, विधाता आप सर्वारी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, तुम जीते हम हारी ॥४२१॥†
पदाभिव्यक्ति मे सगति का अभाव है।
१२
गागर ना भरन देत तेरो कान्ह माई।
हँसि हँसि मुख मोड़ि मोड, गागर छिटकाई।
घूघट पट खोल देत, साँवरो कन्हाई।
जसुमति तै भली बात, लाल कों सिखाई।
नगर डगर झगरो करत, रारि तो मचाई।
हौ तो बीर जमुना तीर, नीर भरन धाई।
गिरधर प्रभु चरण कमल, मीराँ बलि जाई ॥४२२॥†
पद की छठी पक्ति मे प्रयुक्त "बीर" शब्द का अर्थ जुडता नही
है। "गिरधर प्रभु चरण कमल, मीराँ बलि जाई।" जैसी टेक भी
इस पद की विशेषता है।
१३
कमल दल लोचना, तैने कैसे नाथ्यो भुजग।
पेसि पियाला काली नाग नाथ्यो, फण फण निर्त अकरत।
कूद परियो न डर्यो जल माँही, और कारी नहि सक।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, श्री वृन्दावन चन्द ॥४२३॥†
१४
मन अटकी मेरे दिल अटकी हो, मुकट लटक मेरे मन अटकी।
माथे खोर चन्दन की, सेला है पीरे पटकी।
२४६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
शंख गदा पद्म विराजै, गुंज माल मेरे हिये अटकी।
अन्तरधान भये गोपिन मे, सुध न रही जमुना तटकी।
पात पात वृन्दावन ढूँढै, कुज कुज राधा लटकी।
जमुना के तीरे धेनु चरावै, सुरत रही वशी वट की।
फूलन के जामा कदम की छैया, गोपिन की मटुकी पटकी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जानत हो सब के घटकी ॥४२४॥†
पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है। चतुर्थ और सातवी पक्तियाँ
अर्थ-विहीन ही प्रतीत होती है, अत पद की प्रामाणिकता सहज
सदिग्ध है।
१५
यदुबर लागत है मोहि प्यारो।
मथुरा मे हरि जन्म लियो है, गोकुल मे पग धारो।
जन्मत ही पूतना गति दीनी, अधम उधारन हारो।
यमुना के तीर धेनु चरावै, ओढे कामलो कारो।
सुन्दर बदन दल लोचन, पीताम्बर पर वारो।
मोर मुकुट मकराकृत कुडल, कर मे मुरली धारो।
शंख चक्र गदा पद्म विराजै, संतन को रखवारो।
जल डूबत ब्रज राखि लियो है, कर पर गिरिवर धारो।
मीराँ प्रभु गिरिधर नागर, जीवन प्राण हमारो। ॥४२५॥
१६
भज केशव गोविन्द गोपाल हरि हरि, राधेश्याम पहिरे बनमाला।
मथुरा मे हरि जन्म लियो है, गोकुल फुलै नन्दलाला।
गोपी के कन्हैया बलभद्र जी के भैया, भक्त वच्छल प्रभु प्रतिपाला।
पूतना को जननी गति दीन्ही, अधम उधारन नन्दलाला।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहैं, गल बैजन्ती माला।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४७
यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे, मुरली बजावे नन्दलाला ।
वृन्दावन हरि रास रच्यो है, मीराँ की करौ प्रतिपाला ॥४२६॥
१७
या मोहन के मै रूप लुभानी ।
हाट बाट मोहि रोकत टोकत, या रसिया की मै सारी न जानी ।
सुन्दर बदन कमल दल लोचन, बाँकी चितवन मद मुसकानी ।
यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे, बसी मे गावे मीठी बानी ।
तन मन धन गिरधर पर वारू, चरण कमल मीराँ लपटानी ।
॥४२७॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है ।
१८
अब मै शरण तिहारी जी मोहि राखो कृपा निधान ।
अजामिल अपराधी तारे, तारे नीच सदान ।
जल डूबत गजराज उबारे, गणिका चढी विमान ।
और अधम तारे बहुतेरे, माखन सन्त सुजान ।
कुब्जा नीच भीलनी तारी, जाने सकल जहान ।
कहं लगि कहूँ गिणत नही आवै, थकि रहै वेद पुरान ।
मीराँ कहै मै शरण रावरी, सुनियो दोनों कान ॥४२८॥
१९
सुण लीजो बिनती मोरी , मै सरन गही प्रभु तोरी ।
तुम तो पंतित अनेक उधारे , भव सागर ते तार्यो ।
में सब का तो नाम नही जानूं, कोई कोई भक्त बखानो ।
अम्बरीष सुदामा नामी पहुचाये, निज धाम्र ।
ध्रुव जो पाँच बरस को बालक, दरस दियो घनस्यामा ।
धना भक्त का खेद जमाया, कबिरा बैल चराया ।
२४८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
सबरी के झूठे बेर खाये, काज किए मन भाये ।
सदना ओ सैना नाई को तुम लीन्हा अपनाई ।
कर्मा की खीचडी तुम खाई, गनिका पार लगाई ।
मीराँ प्रभु तुम्हारे रंगराती, जानत सब दुनियाई । ॥४२९॥
उपर्युक्त दोनो पदो की प्रथम पक्ति का भाव-भाषा साम्य
विचारणीय है ।
२०
तुम बिन मोरी कौन खबर ले गोबरधन गिरधारी ।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल की छबि न्यारी रे ।
भरी सभा मे द्रोपदी ठारी, राखो लाज हमारी रे ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरण कमल बलिहारी रे ॥४३०॥
२१
देखत राम हँसे, सुदामा, कूँ देखत राम हँसे ।
फाटी तो फुलडियाँ, पॉव उभाडे चलते चरण धसे ।
बालपने का मीत सुदामा , अब क्यो दूर बसे ।
कहा भावज ने भेट पठाई, तदुल तीन पसे ।
कित गई प्रभु मोरी टूटी टपरिया, हीरा मोती लाल कसे ।
कित गई प्रभु मोरी गऊवन बछिया, द्वार बिच हस्ती फँसे ।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, सरणा तोरे बसे । ॥४३१॥
२२
गोकुल के बासी, भले ही आये गोकुल के बासी ।
गोकुल की नारी , देखत आनन्द सुख रासी ।
एक गावत एक नाचत, एक करत हॉसी ।
पींताम्बर के फेटा बॉधे, अरगजा सुबासी ।
गिरिधर से सुनवल ठाकुर, मीराँ सी दासी ॥४३२॥ †
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४९
पदाभिव्यक्ति अस्पष्ट है। अन्तिम पक्ति की भाषा शैली विशेष
विचारणीय है।
२३
आये आये जी महाराज आये।
तज बैकुठ तज्यो गरुडासन, पवन वेग उठ ध्याये।
जब ही दृष्टि परे नन्दनन्दन, प्रेम भक्ति रस प्याये।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चरन कमल चित ल्याये ॥४३३॥†
पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह नही हुआ है। प्रथम
दो पक्तियो से गज-उद्धार की कथा लक्षित होती है, परन्तु तीमरी और
चौथी पक्तियो की अभिव्यक्ति सर्वथा भिन्न पड़ती है।
२४
कोई ना जाने हरिया तारी गती, कोई ना जाणे।
मिट्टी खात मुख देख जशोदा, चौदह भुवन भरिया।
पडी पाताल वाली नाग नाथ्यो, सूर ने¹ शशी डरिया।
डूबत ब्रज राखिलियो है, कर गोबर्धन धरिया।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, शरणे आयो तो तारिया ॥४३४॥
पद पर गुजराती प्रभाव स्पष्ट है।
२५
निपट विकट ठौर, अटके री नैना मेरे।
सुख सम्पति के सब कोई साथी, विपति परे सब अटके।
तजि खगराज छुडायो, हाथी टेर सुने नही कहूँ अटके।
मीराँ के प्रभु गिरिधर को, तजि मूरख अनत ही मरवो।
॥४३५॥†
१ और।
२५० मीराँ-बृहद्-पद-सग्रह
पद मे पूर्वा पर संबध का निर्वाह नही हुआ है, इतना ही नही
तीसरी और चतुर्थ पंक्ति मे विरोधाभास भी बहुत स्पष्ट है। तृतीय
पंक्ति का प्रथमाश अर्थ-हीन है, अन्तिम पंक्ति के अन्तिम शब्द “मरवो”
का अर्थ नही लगता, अत उपयुक्त नही प्रतीत होता। उपर्युक्त
परिस्थिति मे पद को प्रामाणिक मानना सम्भव नही।
२६
जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड़चो माई।
तब से परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोरन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै।
कुडल की अलक झलक कपोलन पर छाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।
कुटिल तिलक भाल चितवन मे टोना।
खंजन अरु मधुप मीन भूले मृग छोना।
सुन्दर अति नासिका सुग्रीव तीन रेखा।
नटवर प्रभु वेष धरे रूप अति विशेषा।
अधर बिम्ब अरुण नैन मधुर मन्द हाँसी।
दसन दमक दाडिम दुति अति चपलासी।
छुद्र घटिका किकनी अनूप धुनि सुहाई।
गिरिधर के अग अग मीरा बलि जाई। ॥४३६॥
पाठान्तर १,
जब से मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड़चो भाई।
जमुना जल भरन गई, मोहन पर दृष्टि गई।
गागंर भरि गृह चली, भवन न सुहाई।
गृह काज भूलि गई, सुधि बुधि बिसराई।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५१
सास नन्द उलझि परी, जाऊ कहाँ भाई।
मोरन की चन्द्रकला कीरीट मुकुट सोहै।
केसर के तिलक ऊपर तीन लोक मोहै।
कानन मे कुडल कपोलन पर छाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।
काछनि कटि सोहै, पग नूपुर बिराजै।
गिरधर के अग अग मीराँ बलि जाई।
पाठान्तर २,
जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पड़्यो भाई।
तब ते परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोर मुकुट चंद्रिका सु सीस मध्य सीहै।
केसरि को तिलक ऊपर तीन लोक मोहै।
साँवरो त्रिभग अंग चितवन मे टोना।
खजन जौ मधुप मीन भूले मृग छौना।
अधर बिम्ब असन नयन मधुर मद हाँसी।
दसन दमक दाडिम दुति दमके चपला सी।
छुद्र घटिका अनूप नुपुर धुनि सोहै।
गिरिधर के चरणकमल मीराँ मन मोहै।
पाठान्तर ३,
जब ते मोहि नन्दनन्दन दृष्टि पर्यो भाई।
तब तैं परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोरन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै।
कुडल की अलक झलक कपोलन परछाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।
भृकुटि कुटिल चपल नयन मधुर मद हाँसी।
२५२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
दसन दमक दाडिम द्युति दमकै चपलासी ।
कबु कठ भुज बिलासे ढीव तीन रेखा ।
नटवर को भेष भानु सकल गुण विशेषा ।
क्षुद्र घट किकनी अनूप धुन सुहाई ।
गिरिधर के अग अग मीराँ बलि जाई ।
पाठान्तर ४,
जब ते मोय नन्दनन्दन दृष्टि पड़्यो भाई ।
हरि की कहा कहौं सुन्दरता बरनी नही जाई ।
मोरन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै ।
केसर को तिलक् भाल तीन लोक मोहै ।
कुडल की अलक झलक कपोलन पर छाई ।
मानो मीन सरवर तज मकर मिलन आई ।
भृकुटि कुटिल अति विसाल चितवन मे टौना ।
खजन और मधुप मीन मोहै मृग छौना ।
नासिका अति अनूप मद मद हाँसी ।
दसन बरन दामिनि द्युति चमकत चपलासी ।
कुंभुक कंठ भुज विशाल गिरिव तीन रेखा ।
नटवर को भेख मानो सकल गुण विसेषा ।
क्षुद्र घटिका अति अनूप किकनि धुन सवाई ।
(उस) गिरिधर के अंग अंग मीराँ बलि जाई ।
उपर्युक्त पाठ के विभिन्न पाठान्तरो मे कुछ शब्दो का ही हेर फेर
है। यद्यपि प्रत्येक पाठ मे कुछ शब्द निरर्थक है तथापि कही भी
भाव मे कोई विशेष अन्तर नही पडने पाया है।
२७
(१) कोई स्याम मनोहर ल्यो रे, सिर धरे मटकिया डोले ।
\ दधि को नाँव बिसर गई ग्वालन, हरि ल्यो हरि ल्यो बोले ।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५३
(iv) मीरॉ के प्रभु गिरिधर नागर, चेली भई बिन मोले।
(iii) कृष्ण रूप छकी है ग्वालिन, और ही और बोले। ।।४३७।।
उपर्युक्त पद मे तीसरी पंक्ति मे ही टेक आ जाता है। चतुर्थ
पंक्ति को यदि तृतीय पंक्ति के स्थान पर रख कर तृतीय पंक्ति को ही,
अन्तिम पंक्ति बना दिया जाना अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। ऐसा
करने पर द्वितीय और अन्तिम पंक्ति की भाव-धारा मे व्यवधान भी
नही पड़ेगा और मीराँ के पदो की परम्परा का भी निर्वाह हो जावेगा।
तृतीय पंक्ति के द्वितीयांश के प्रारम्भ मे 'चेली' शब्द के बदले 'चेरी'
शब्द का होना अधिक संगत प्रतीत होता है।
२८
या ब्रज मे कछु देख्यो री टोना।
ले मकुटी सिर चली गुजरिया, आगे मिले बाबा नन्दजी के छोना।
दधि को नाम बिसर गयो प्यारी, ले लेहुरी कोई स्याम सलोना।
वृन्दावन की कुज गलिन मे, आँख लगाई गयो मन मोहना।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सुन्दर स्याम सुघर सलोना। ।।४३८।।
उपर्युक्त तीनो पद विशेष विचारणीय है। इन तीनो की भाषा
साहित्यिक है, भाव मे भी साहित्यिक उपमाएँ व चमत्कार है। इन
पदो पर ब्रजभाषा मे प्राप्त वैष्णव साहित्य का गहरा प्रभाव बहुत
ही स्पष्ट हो उठता है।
२९
शिव मठ पर सोहैं लाल ध्वजा।
कौन कै सोहै हरी पीरी चुनरियाँ, कौन के सोहै भसम गोला।
गौरी कै सोहै हरी पीरी चुनरियाँ, शिव के सोहै भसम गोला।
कौन शिखर पर गौरी विराजै, कौन शिखर पर बम भोला।
उत्तर शिखर पर गौरी विराजे, दक्षिण शिखर पर बम भोला।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, प्रभु के चरन पर चित मोरा।।।४३९।।†
२५४ मीराँ-वृहद्-पद-संग्रह
३०
शिव के मन माँही बसी कासी।
आधी काशी बामन बनिया, आधी कामी सन्यासी।
काह करण को ब्राह्मण बनिया, काह करन को सन्यासी।
नेम धरम को ब्राह्मण बनिया, तप करने को सन्यासी।
कौन शिखर पर गौरी विराजै, कौन शिखर पर अविनासी।
उत्तर शिखर पर गौरी विराजै, दक्षिण शिखर पर अविनासी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरी चरणन पर मै दासी। ॥४४०॥†
उपर्युक्त पद की पाँचवी और छठी पक्तियाँ प्रथम पद की पाँचवी
और छठी पक्तियो की पुनरुक्ति मात्र हैं।
३१
वे न मिले जिनकी हम दासी।
पात पात विन्द्रावन ढूँढचो, ढूँढि फिरी सिगरी मै कासी।
कासी को लोग बडो बिसवासी, मुष मे राम बगल मे फासी।
आधी कासी मे बामण बनिया, आधी कासी बड़े सगसी।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, हरि चरणा की रहो मै दासी ॥४४१॥†
इस पद की तीसरी पंक्ति पद स० २८ की दूसरी पंक्ति की
पुनरुक्ति ही प्रतीत होती है। “सगसी” कोई शब्द नही है। सम्भव
है कि “सन्यासी” का ही अशुद्ध रूप चल गया हो।
इन तीनो ही पदो को भाव और भाषा के ही आधार पर प्रक्षिप्त
कहना ही उपयुक्त प्रतीत होता है। अभिव्यक्ति मे ही वह भावातिरेक
और गाम्भीर्य नही है जो मीराँ के पदो की विशेषता है। प्राप्त
अधिकांश पदो की भाषा शैली का भी इन पदो की भाषा शैली से
कोई साम्य नही बैठता। इतना ही नही, पदाभिक्तियो मे भी पूर्णतया
पूर्वापर सबंध का निर्वाह नही हुआ है।
३२
नमो नमो तुलसी महारानी, नमो नमो हरि की पटरानी।
जाके दरस परस अघ नासै, महिमा वेद पुरान बखानी।
वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५५
शाखा पत्र भेज री कोमल, श्रीपति चरण कमल लपटानी।
धनि तुलसी पूरब तप कीन्हौ, शालिग्राम भई पटरानी।
शिव सनकादिक अस ब्रह्मादिक ,खोजत फिरे महामुनी ज्ञानी।
छप्पन भोग धरे हरि आगे, बिन तुलसी प्रभु एक न मानी।
धूप दीप नैवेद्य आरती, पुष्पन की वर्षा वर्षानी।
प्रेम प्रीति करी हरि बस कीन्ही, साँवरी सूरत हृदय हुलसानी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति दान मोहि दियो महारानी।
॥४४२॥†
पद के द्वितीयार्द्ध मे अर्थ सगति का विशेष अभाव है। शिव
और काशी वर्णन के पदो की तरह इस पद को भी भाव और भाषा
के आधार पर प्रक्षिप्त मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
३३
अजी ये लला जू आज गोकुल वासी।
गोकुल वासी प्राण हमारे, हाँ ललाजी, श्याम आये, भला।
श्याम सुन्दर अविनासी।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, हाँ लला जी, बीच ये भला।
बीचे नदी यमुना सी।
यमुना के तीरे धेनु चरावे, हाँ लला जी, हाथ लिये नौलासी।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे, हाँ लला जी, सग दुलहिन राधा सी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हाँ ललाजी, तुम ठाकुर मै दासी।
॥४४३॥†
भाव भाषा के आधार पर प्रक्षिप्त ही प्रतीत होता है। इस शैली
का यही एक पद प्राप्त है। पद मे पूर्वापर सबध और अर्थ सगत
का अभाव है। "यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे" जैसी अभिव्यक्ति
की पुनरुक्ति अन्य कई पदो की तरह इसमे भी हुई है।
३४
नागर नन्दा रे भुगट पर वारी जाऊँ नागर नन्दां।
वनस्पति मे तुलसी बडी है, नदीयन मे बड़ी गंगा।