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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

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DevanagariRajasthanipublished365 pages

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Page 308

वैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २५५
शाखा पत्र भेज री कोमल, श्रीपति चरण कमल लपटानी।
धनि तुलसी पूरब तप कीन्हौ, शालिग्राम भई पटरानी।
शिव सनकादिक अस ब्रह्मादिक ,खोजत फिरे महामुनी ज्ञानी।
छप्पन भोग धरे हरि आगे, बिन तुलसी प्रभु एक न मानी।
धूप दीप नैवेद्य आरती, पुष्पन की वर्षा वर्षानी।
प्रेम प्रीति करी हरि बस कीन्ही, साँवरी सूरत हृदय हुलसानी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, भक्ति दान मोहि दियो महारानी।
॥४४२॥†
पद के द्वितीयार्द्ध मे अर्थ सगति का विशेष अभाव है। शिव
और काशी वर्णन के पदो की तरह इस पद को भी भाव और भाषा
के आधार पर प्रक्षिप्त मानना ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है।
३३
अजी ये लला जू आज गोकुल वासी।
गोकुल वासी प्राण हमारे, हाँ ललाजी, श्याम आये, भला।
श्याम सुन्दर अविनासी।
इत गोकुल उत मथुरा नगरी, हाँ लला जी, बीच ये भला।
बीचे नदी यमुना सी।
यमुना के तीरे धेनु चरावे, हाँ लला जी, हाथ लिये नौलासी।
वृन्दावन की कुंज गलिन मे, हाँ लला जी, सग दुलहिन राधा सी।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हाँ ललाजी, तुम ठाकुर मै दासी।
॥४४३॥†
भाव भाषा के आधार पर प्रक्षिप्त ही प्रतीत होता है। इस शैली
का यही एक पद प्राप्त है। पद मे पूर्वापर सबध और अर्थ सगत
का अभाव है। "यमुना के नीरे तीरे धेनु चरावे" जैसी अभिव्यक्ति
की पुनरुक्ति अन्य कई पदो की तरह इसमे भी हुई है।
३४
नागर नन्दा रे भुगट पर वारी जाऊँ नागर नन्दां।
वनस्पति मे तुलसी बडी है, नदीयन मे बड़ी गंगा।