मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
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Read in contextवैष्णव-प्रभाव द्योतक पद २४३
गल मुतियन की माल बिराजे, कुन्डल की छवि न्यारी ।
बाँकी मो कजरारे नैना, अलकै छुट रहि कारी ।
मद मद मुरली धुन बाजत, मोही बृज की नारी ।
क्षुद्र घटिका कटि सोहै, भुज पर बाजू धारी ।
कडा भरहरी सुधर नेवरी, नूपुर की गुणकारी ।
दुरजन लोग हँसो क्यो ने मोसो, दे दे कर कर तारी ।
मीराँ प्रभु की भई दिवानी, प्रेम मगन मतवारी ॥४१६॥†
पद की सातवी पंक्ति अर्थहीन प्रतीत होती हैं। आठवी पंक्ति
की अभिव्यक्ति और शेष पदाभिव्यक्ति मे पूर्वापर सबन्ध का निर्वाह
नही होता। यह पद श्री जगतश्रवण जी के पुजारी जी की जबानी
लिखा गया है। सूर्यकरण जी चतुर्वेदी के मतानुसार इस पद को इस
रूप मे प्रामाणिक नही माना जा सकता है।
७
मेरी चूनर भिजावे, मेरे भिजे अगी पाक।
नन्द महर जी को कुअर कन्हैया, जान न देऊगी मै आज ।
पट पकर के फगवाँ ल्यूँगी, मुख भी डोगी उगराज ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, सदा रहो सिरताज ॥४१७॥†
पद की तीसरी पंक्ति सर्वथा अर्थ-विहीन है।
८
जागो मोहन प्यारे ललना, जागो बसीवार।
रजनी बीती भोर भई है, घर घर खुले किवारे ।
गोपी दधि मथुन करियत है, कंगन के झनकारे ।
उठो लाल जी भोर भयो है, सुर नर ठाढै द्वारे ।
ग्वाल बाल सब करत कोलाहल, जय जय शब्द उचारे ।
माखन रोटी हाथ मे लीन्ही, गऊअन के रखवारे।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, शरण आये कूँ तारे ॥४१८॥†