मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
About this granth
Mirabai, the sixteenth-century Krishna devotee associated with the royal house of Mewar, is one of the most loved voices of the bhakti movement. Her padas addressed to "Giridhar Gopal", in a mix of Rajasthani, Braj and Gujarati, have travelled widely in oral and devotional tradition.
This volume is the Meera Brihat Pad Sangrah (मीराँ बृहद् पदावली), whose title page names Padmavati "Shabnam" as compiler. It was published by Lok Sevak Prakashan, Banaras, and distributed by Sahitya Bhavan Ltd., Allahabad; the imprint gives Samvat 2004 and 2006. The introduction notes that almost every song bearing Mira's name used to be accepted as hers, and presents this collection as part of a newer effort to gather her authentic padas.
The songs are grouped by theme: the guru and the company of saints, love for Giridhar Gopal and descriptions of his form, the pain of separation, Mira's replies to the Rana and the poison episode, phag and Holi songs, and surrender and detachment, with a biographical section at the start. It runs to about 365 pages.
वियोगाभिव्यक्ति ९१
खड़ी बोली
१
आली सावरे की दृष्टि मानो प्रेम कटारी है।
लागत बेहाल भई, तनं की सुधि बुधि गई।
तन मन व्यापो प्रेम, मानो मतवारी है।
सखियाँ मिलि दुइ चारी, बावरी सो भई न्यारी।
हो तो वाको नीके जानो, कुज की बिहारी है।
चन्द्र को चकोर चाहे, दीपक पतग दाहै।
जल बिन मीन जैसे, तैसे प्रीत प्यारी है।
बिनती करो है श्याम, लागो मै तुम्हारे पाम।
मीराँ प्रभु ऐसे जानो दासी तुम्हारी है ॥१६२॥†
भाव और भाषा दोनो के ही आधार पर पद की प्रामाणिकता संदिग्ध है।
२
जल्दी खबर लेना मेहरम मेरी।
जल बिना मीन मरे एक छन मे, एनै अमृत पाऊ तो झेरी झेरी।
बहुत दिनो का बिछोह घड़ा है, अब तो राखो नेडी नेडी।
चकोर को ध्यान लगो चन्दवा सो, नटवा को ध्यान लगी डोरी डोरी।
सन्त को ध्यान लगे राम प्यारे, भूख को ध्यान मेरी मेरी।
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, तुम पर सूरत मेरी ठहरी ठहरी ॥१६३॥†
संघर्षाभिव्यक्ति
राजस्थानी में प्राप्त पद
१
अब नहि बिसरुँ म्हारे हिरदै लिख्यो हरिनाम् ।
म्हारे सतगुरु दियो बताय अब नहि बिसरू रे ।
मीराँ बैठी महल मे, उठत बैठत राम ।
सेवा करस्यां साध की म्हारे और न दूजो काम ।
राणा जी बतलाया¹ कहू देणो जवाब ।
पण लागो हरिनाम् सूं म्हांरे दिन दिन दूनो लाभ ।
सीप भर्यो पाणी पिवे रे, टाक² भर्यो अन्न खाय ।
बतलाया बोली नही रे राणो जी गया रिसाय³ ।
विखरा प्याला राणा जी भेज्या, दीजो मीराँ हाथ ।
कर चरणामृत पी गई म्हारा सबल धणी⁴ के साथ ।
विष का प्याला पी गई भजन करे उस ठौर ।
थारी मारी ना मरूं म्हांरा राखनहार और ।
राणाजी मोपर कोप्यो रे, मारूं एकज⁵ सेल ।⁶
मार्या पिराछित लागसी दीजो म्हाने पीहर भेल ।
राणा मोपर कोप्यो रे रती न राख्यो भोद ।
ले जाती बैकुण्ठ मे, यो तो समझ्यो नही सिसोद ।
छापा तिलक बनाइया तजिया सब सिगार ।
म्न्हें तो सरणे राम के भल निन्दो संसार ।
१ बात करने का प्रयास किया. २ छटाँक भर, बहुत थोडा, ३ क्रुद्ध,
४ स्वामी, पति अर्थ में रूढ़िवाचक हो गयाँ हैं, ५ एक ही, ६ कटारी ।
संघर्षाभिव्यक्ति ९३
माला म्हारे दोवडी¹, सील बरत सिगार।
अब के किरपा कीजियो, हूं तो फिर बाँधू तलवार ।।१६४।।
कही कही इस पद के आगे निम्नाकित कुछ पक्तिया और भी
मिलती हैं —
रथा बैल जुताय के ऊटा कसिया भार।
कैसे तोडूँ राम सूं, म्हारो भो भो² रो भरतार।
राणो साड्यो मोकल्यो जाउँयो एके दौड।
कुल की तारण अस्तरी, या तो मुरड चली राठौर।
साड़िया पाछो फेरिया रे परत³ न देस्या पॉव।
कर सूरापण नीसरी म्हांरे कुछ राणे कुण राव।
ससारी निन्दा करै दुखियो सब ससार।
कुल सारो ही लाजसी मीराँ जो भया ख्वार।
राती माती प्रेम की विष भगत को मोड।
राम अमल माती रहै धन मीरा राठौड।
२
म्हारे हिरदे लिख्यो जी हरिनाम, अब नहि बिसरू।
मै तो हिरदे लिखियो जी गोपाल, अब र्नहि बिसरू।
हाथी घोडा बहो घणा माया केर न पार।
राज तजूं चितौड को गामडी है असी हजार।
साध हमारी आतमा मे साधन की देह।
रोम रोम मे राम रह्या ज्यो बादर मे मेह।
राती माती हरिनाम की बाँध भक्त को मोर।
राम अमल साखी फिरै धन मीरा-राठोर।
एक आडी गुरु गोविन्द खडा, एक आडी सब ससार।
१ दुलडी, २ जन्मजन्मान्तर, ³ लौटकर।
९४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
कैसे तोडूँ राम सों म्हारो भो भो रो भरतार ।
संसारी निन्दा करे, रूठो सब परवार१।
कुल सारोड लजाइयौ, मीरा बाई बहै अकरार२।
भक्त हीन पापी घणा राणा के दरबार ।
⁻ के तो विवग प्याला प्याय द्यो, के डाली कठहार ।
राणो जी विषण प्याला मोकल्यां३, दीज्यो मीरा रे हाथ ।
मे तो चरणामृत कर पी गइ अब थे जाणो म्हारा नाथ ।
मीरा विष का प्याला पी गई सोती खूँटी तान४।
म्हारो दरद दिवाणो सावरो, म्हाने दौडि जगावेलो आन ॥
॥१६५॥
इस पद के साथ निम्नांकित पंक्तिया और भी पाई जाती है।
राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊ ए माय ।
म मद भागिन करम अभागिन कीरत कैसे गाऊ ए माय ।
बिरह पिजड की बाड सखी री, उठकर जी हुलसाऊ ए माय ।
उपर्युक्त तीन पंक्तिया सत मत से प्रभावित एक अन्य पद का
प्रथमांश है। अत इनको तो इस पद से निश्चित रूपेण हटाया जा
सकता है।
३
म्हारे हिरदे लिखयो हरिनांव, अब मेना बिसरूं।
मीराँ गढ सूं उतरी जी छापा तिलक बणाय ।
पगा बजावता घूँघरूं जो हाथ बजावतां ताल।
माला कंठी दो लडो सील बरत सिणगार ।
जो कोई हिरदै बस जी, जो कोइ आवणहार ।
१ परिवार, २ बेकरार, सम्पूर्ण सीमाओ को तोडकर, ३ भेजा, ४ खूंटी
तानकर सोना, सर्वथा निश्चिन्त होकर सोना।
संघर्षाभिव्यक्ति ९५
राणो मन मे कोपियो जी मारो याके सेल१।
म्हारो तो पिराछित लागै जी, पीहर दो याको मेल ।
रथडा बैल जुपाइया२ जी, ऊटा कसियो भार ।
डावो३ छोडो मेडतो जी पेला४ पोषर५ जाय ।
राणा साडया मोकल्या जी, पाछा ल्यावो मोड ।
कुल की माडण६ हस्तरी७ जी, मुरड चली८ राठौड ।
मीराँ वचन उचेरिया९ जी गिरधर म्हारो मोड१० ।
थे पाछा जावो साडिया जी काने११ मोड़ो जोड१२ ।।१६६।। †
इस पद की अन्तिम कुछ पक्तियाँ विशेष विचारणीय है ।
उपर्युक्त तीनो ही पदो मे स्वानुभूति और अन्योक्ति का विचित्र
सम्मिश्रण हुआ है। बहुधा पुनरुक्ति भी हुई है। एक पद से व्यक्त होती
किसी घटना का दूसरे पद मे कोई स्पष्ट उल्लेख नही तथापि ऐसी कुछ
पक्तिया सभी पदो मे मिल जाती है, जिनसे कि उस घटना विशेष
का आभास मिल जाता है ।
भाव और भाषा के साम्य के आधार पर तीनो ही पद एक
दूसरे के गेय रूपान्तर प्रतीत होते है ।
४
मै तो सुमऱ्या छै मदन गोपाल, राणा जी म्हारो काई करसी ।
मीराँ बैठ्या महल मे जी, छापा तिलक लगाय ।
आया राणा जी महल मे जी, कोप कऱ्यो छै मन भाय१३ ।
मीराँ महला से उतऱ्या जी, ऊटा भार कसाय ।
१ कटार, २ जुतवाये, ३ बाँए, ४ सर्व प्रथम, ५ तालाब, ६ बनाने-
वाली, ७ स्त्री, ८ नाराज होकर चली, ९ उच्चारण किया, १० मोड
शब्द के तीन अर्थ होते हैं – लौटाना, सन्यासी का अवहेलनात्मक पर्यायवाची,
तोडना, ११ किसलिए, १२ जोडी या साथ, विशेषत दम्पति के अर्थ मे ही
'जोडी' शब्द व्यवहृत होता है। १३ मुन मे ।
६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
डावो' छोड़यो मेड़तो कोई सूधा' द्वारका जाय।
राणा जी सांड्_यो भेजिया जी, पाछा लावो घेर।
घर की नार इस्तरी चाली, चाली छे मुड राठोर।
लाजै पीहर सासरो जी, लाजै भाय र बाप।
लजे दूदा जी रो मेड़तो जी, कोई चोथी गढ चितौड़।
राणा जी विष का प्याला भेजिया जी द्यो मीराँ के हाथ।
कर चरणामृत पी गयाँ जी, आप जानो दीनानाथ।
पेया२ नाग छोड़िया- जी, छाडो मीरा के महल।
हिवड़े३ हार हिडोलिया,४ कोइ तुम जाणो रघुनाथ ॥१६७॥
“दूदा जी रो मेडतो” अभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा
द्वारा साप भेजे जाने का कथानक यहाँ दूसरे ही रूप मे दिया गया है।
आराध्य के प्रति “मदन गोपाल” सम्बोधन भी इस पद की विशेषता
है। इस पद का भी पहले तीनों पदो से गहरा साम्य है।
पाठान्तर १
में तो सुमर्या छै मदन गोपाल, राणो जी म्हांरो काई करसी।
मीराँ बैठी महल मे जी छाप। तिलक लगाय।
आया राणा जी महल म जी,कोप करियो छै मन माय।
मीराँ महैलाँ से उतऱ्या जी ऊटा कसिया भार।
डावो छोड्यो मेड़तो कोई सूधा द्वारका जाय।
राणा जी साड्_यो भेजियो जी पाछा ल्यावो दौड़।
घर की नार इस्तरी चाली, चाली मुड राठौड।
लाजै पीहर सासरो जी, लाजै माय र बाप।
लाजै दूदा जी रो मेडतो जी लाजै गढ चितोड।
विष का प्याला भेजिया जी, द्यो मीराँ के हाथ।
कर चरणामृत पी गयां जी, आप जाणो दीनानाथ।
१ सीधे, २ पिटारी, ३ हृदय पर, ४ झूला लिया।
संघर्षाभिव्यक्ति ६७
पेया नाग छोडियो जी, छोडो मीराँ महैल ।
हिवडे हार हिडोलिया जी, थे जाणो रघुनाथ ।
दोनो पाठान्तरो मे कुछ शब्दो का ही अन्तर है ।
इन पदो मे एक विचारणीय अभिव्यक्ति यह है कि मीराँ चित्तौड़
का त्याग करती है मेडता जाने के उद्देश्य से ही तथापि चली जाती है
तीर्थ-यात्रा हेतु । "मुरड चली राठोड" जैसी राणा की धारणा से
भी आभासित होता है कि मीराँ नाराज होकर गृह-त्याग कर अपने
पीहर "राठोड़" जा रही है।
"डॉवो तो मैल्यो मेडतो पेलाँ पोखर जाय" या "सूधा द्वारका
जाय।" जैसी अभिव्यक्तियो का विश्लेषण अद्यावधि प्राप्त वृतान्त क
आधार पर करना सम्भव नही । (देखे, "मीराँ, एक अध्ययन") ।
५
गढ से तो मीराँ बाई उतरी, करवा¹ लीना जी साथ ।
डॉवो तो छोड़्यो मीराँ मेडतो, पुस्कर न्हावा जाय ।
मेरो मन लाग्यो हर के नाम, रहस्या साधा के साथ ।
राणा जी ओठी² भेज्याँ, दीजो मीराँ बाई रे हाथ ।
घर की मानन³ अस्तरी, मुरड⁴ चली राठोड ।
लाजै पीहर सासरो, लाजै तेरो सो परवार ,
लाजै मीराँ जी थारा मायड बाप, चोथो वंश राठोड ।
मीराँ बाई कागद⁵ भेज्याँ, दीजो राणा जी रे हाथ ।
राणा जी समझ्यो नही, ले लाती बैकुन्ठा ।
सिसोदियो समझ्यो नही, ले जाती बैकुन्ठा ।
बागाँ मे बोली कोयलियाँ, बन मे दादुर मोर ।
१ मिट्टी का बना हुआ एक छोटा सा पात्र जो (पानी से भर कर)
पूजा करने, सती होने या ऐसे किसी शुभ अवसर पर व्यवहृत होता है।
२ पत्र, ३ बनाने वाली, ४ नाराज होकर, ५ पत्र ।
७
६६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
डावो छोड़यो मेडतो कोई सूधा१ द्वारका जाय ।
राणा जी साड्यो भेजिया जी, पाछा लावो घेर ।
घर की नार इस्तरी चाली, चाली छे मुड राठोर ।
लाजै पीहर सासरो जी, लाजै भाय र बाप ।
लाजै दूदा जी रो मेडतो जी, कोई चौथी गढ चितौड ।
राणा जी विष का प्याला भेजिया जी द्यो मीराँ के हाथ ।
कर चरणामृत पी गयाँ जी, आप जानो दीनानाथ ।
पेया२ नाग छोडिया जी, छाडो मीरा के महल ।
हिवडे३ हार हिडोलिया,४ कोइ तुम जाणो रघुनाथ ॥१६७॥
“दूदा जी रो मेडतो” अभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा
द्वारा सांप भेजे जाने का कथानक यहाँ दूसरे ही रूप मे दिया गया है।
आराध्य के प्रति “मदन गोपाल” सम्बोधन भी इस पद की विशेषता
है। इस पद का भी पहले तीनो पदो से गहरा साम्य है।
पाठान्तर १
मै तो सुमर्या छै मदन गोपाल, राणो जी म्हारो काईं करसी ।
मीराँ बैठी महल मे जी छापा तिलक लगाय ।
आया राणा जी महल मे जी,कोप करियो छै मन माय ।
मीराँ महैलाँ से उतर्या जी ऊटा कसिया भार ।
डावो छोडगो मेड़तो कोई सूधा द्वारका जाय ।
राणा जी साड् यो भेजियो जी पाछा ल्यावो दौड ।
घर की नार इस्तरी चाली, चाली मुड राठौड ।
लाजै पीहर सासरो जी, लाजै माय र बाप ।
लाजै दूदा जी रो मेडतो जी लाजै गढ चितौड ।
विष का प्याला भेजिया जी, द्यो मीराँ के हाथ ।
कर चरणामृत पी गया जी, आप जाणो दीनानाथ ।
१ सीधे, २ पिटारी, ३ हृदय पर, ४ झूला लिया ।
संघर्षाभिव्यक्ति ६७
पेया नाग छोड़ियो जी, छोड़ो मीराँ महल ।
हिवडे हार हिडोलिया जी, थे जाणो रघुनाथ ।
दोनो पाठान्तरो मे कुछ शब्दो का ही अन्तर है ।
इन पदो मे एक विचारणीय अभिव्यक्ति यह है कि मीराँ चित्तौड
का त्याग करती है मेडता जाने के उद्देश्य से ही तथापि चली जाती है
तीथ-यात्रा हेतु । "मुरड चली राठोड" जैसी राणा की धारणा से
भी आभासित होता है कि मीराँ नाराज होकर गृह-त्याग कर अपने
पीहर "राठोड" जा रही है ।
"डॉवो तो मैल्यो मेड़तो पेलाँ पोखर जाय" या "सूधा द्वारका
जाय ।” जैसी अभिव्यक्तियो का विश्लेषण अद्यावधि प्राप्त वृतान्त क
आधार पर करना सम्भव नही । (देखे, "मीराँ, एक अध्ययन") ।
५
गढ से तो मीराँ बाई उतरी, करवा¹ लीना जी साथ ।
डाँवो तो छोडचो मीराँ मेडतो, पुस्कर न्हावा जाय ।
मेरो मन लाग्यो हर के नाम, रहस्या साधा के साथ ।
राणा जी ओठी² भेज्यॉ, दीजो मीराँ बाई रे हाथ ।
घर की मानन³ अस्तरी, मुरड⁴ चली राठोड़ ।
लाजै पीहर सासरो, लाजै तेरो सो परवार ,
लाजै मीराँ जी थारां मायड बाप, चोथो .वंश राठोड ।
मीराँ बाई कागद⁵ भेज्यॉ, दीजो राणा जी रे हाथ ।
राणा जी समझ्यो नही, ले लाती बैकुन्ठा ।
सिसोदियो समझ्यो नही, ले जाती बैकुन्ठां ।
बागाँ मे बोली कोयलियाँ, बन मे दादुर मोर ।
१ मिट्टी का बना हुआ एक छोटा सा पात्र जो (पानी से भर कर)
पूजा करने, सती होने या ऐसे किसी शुभ अवसर पर व्यवहृत होता है ।
२ पत्र, ३ बनाने वाली, ४ नाराज होकर, ५ पत्र ।
७
६८ मीरॉ-बृहद्-पद-संग्रह
मीरॉरा ने गिरधर मलिया, नागर नन्द किसोर ।।१६८।।†
अन्तिम दोनो पक्तियो का शेष पद से समन्वय नही होता।
६
राणी जी महलां से ऊतरी, ऊटा कसियो भार ।
डॉवो तो राणी छोडयो मेडतो, पूठ¹ दयी चित्तौड ।
म्हारा रे भाई ओठियाँ², मीराँ ने लाओ ए समझाय ।
घर को मानन- राणी रूस गयॉ राठोड ।
म्हारा रे भाई साड़िया³ रे बीर, जाजै सौ सौ कोस ।
म्हारा रे भाई साडिया, रे तेरो ऊट पाछो⁴ ले जाय ।
इण राणा जी रे राज मा, जल पिवा रो दोस ।
म्हारी एक न मानी बात, राणा रे, ले जाती बैकुठ माँहि ।
बागॉ मे बोली कोयल जी, बन मे दादुर मोर ।
मीराँ ने गिरधर मिलिया, नागर नन्द किसोर ।।१६९।।†
भाव और भाषा के आधार पर इस पद को पूर्व पद (स० ५) का
गेय रूपान्तर कहा जा सकता है ।
७
काई थारो लागै छै गोपाल ।
गढ से तो मीराँ बाई उतर्र्या जी, हाथ मगद⁵ को थाल ।
औरा⁶ के तन अन धन लछमी, आप फिरो कगाल ।
ऊचा राणा जी रा गोखडा⁷ जी, नीची मीराँ बाई री साल⁸ ।
रमतां तो पायो मीरां कॉकरो, कोई सेवा सालिगराम ।
जहर पियालो राणा जी भेज्या, जी, द्यो मीराँ ने जाय ।
१ पीठ, २ पत्रवाहक, ३ ऊँट चलाने वाला, ४ लौटा कर । ५ मैदे से बना
हुआ एक तरह का लड्डू विशेष जो पूजा के काम आता है, या लडकी के विवाह
मे बनसारे मे दिया जाता है । ६ दूसरो के लिये, ७ अटारी, ८ कमरा ।
संघर्षाभिव्यक्ति ९९
कर चरणामृत मीराँ पी गई, कोई आप जाणो रघुनाथ ।
साँप पेटारा राणा जी भेज्या, द्यो मीरा ने जाय ।
कर खग वालो मीराँ बाई पहरियो, कोई हो गयो नोसर हार¹ ।
काढ कटारो राणाजी बैठिया, ल्यो मीरा ने मार ।
इन माराँ इन दोष लगे, कोई छत्री धरम धर जाय।
साँड्या² साडिया पलाण³ जो, म्है चालाँ सो सो कोस ।
राणा जी का देस मे, कोई जल पिवा रो दोस ।
मीराँ गिरधर रो रग राची, रँच न रक कलेस ।
अन्तिम पक्ति का निम्नाकित पाठान्तर भी पाया जाता है —
“मुख से बजावै मीराँ बाँसरी, कोई नाच रह्यो-मधुरेस ।”।।१७०।।
राजस्थान के ऊँटो की तीव्र चाल किसी समय विशेष प्रसिद्ध
थी ! मीराँ ने ऊँट जोत लाने के लिये कहा और ऊँट ले आया गया ।
इतने मे ऊँट चलाने वालो ने मुडकर जो देखा तो “मीराँ बाई रो देस”
ही दीखने लगा । ऊँट की तीव्र गति का चमत्कार पूर्ण वर्णन है।
८
ए मीराँ थांरो काई लागै गोपाल ।
राणो जी बूझै बात, काई थारो लागै गोपाल ।
सरप पिटारो राणो जी भेज्या, द्यो मीराँ के हाथ ।
ए मीराँ थारो भायलो गोपाल ।
मीराँ बैठी महल मे जी, छापा तिलक लगाय ।
बतलाया बोली नही रे, राणो जी रहयो बल खाय ।
काड कटारो खड्यो हुयो जी, अब बताय तेरो गोपाल ।
१ नोसर हार—एक तरह का बहुमूल्य हार जो अपनी बहुमूल्यता के कारण
सिर्फ राजघरानो के ही उपयुक्त समझा जाता है, २ ऊँट, ३ ऊँट पर जोते जाने
वाली काठी “पलाण” कहलाती है। इसका क्रिया रूप है “पलाण ज्यो” जिसका
अर्थ है, जोत लो ।
१०० मीराँ-बृहद् पद-संग्रह
मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जोत मे जोत मिलाय ॥१७१॥†
“ऐ मीराँ थारो भायलो गोपाल” पक्ति विशेष ध्यान देने योग्य
है। प्रथम पक्ति के आधार पर यह पद, पद स० ४ का पाठान्तर ही
ही प्रतीत होता है परन्तु शेष पदाभिव्यक्ति सर्वथा भिन्न पडती है।
९
राणा जी महल पधारिया जी, कर केस दिया साज ।
राणी जी पाछा फिर गया जी, राणो जी जान्या म्हासूँ लाज ।
राणो जी बूझे काई ओ लागै गोपाल ।
राणी जी मुजरा करो सनमुख उबास्या ।
म्हे छाँ राणी चितोड़ का, और बरब्साँगाँ थॉने राज ।
मीराँ ने बुझो काई ओ लागे गोपाल ।
साध सत हिरदे बसे, हथलेवो को लाग्यो पाप ।
राणा जी बूझे काई ओ लागै गोपाल ।
द्योढया मे बझो काई ओ लागै गोपाल ।
राणा जी खडग सवाँरिया ले खाडो तरवार ।
किसडी मीराँ ने राणो जी मारसी, हो गई एक हजार ।
मीराँ ने बूझो काई ओ लागै गोपाल ।
राणा जी बतलावै काई ओ लागै गोपाल ॥ १७२ ॥
पदाभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा जी के “महल”
मे पधारने पर 'राणी जी' के लौट जाने के कारण राणा को भ्रम होता
है। नववधू की लज्जा का यह भ्रम शीघ्र ही शका मे परिणत हो जाता
है और राणा यह जानने को उत्सुक हो उठते है कि “गोपाल” और
“राणी जी” के बीच क्या सबध है। मीराँ का उत्तर भी स्पष्ट है
“साध सत हिरदै बसै, हथलेवो को लाग्यो पाप”। अस्तु, राणा मीराँ
को मार डालने का एक बार फिर निष्फल प्रयास करते हैं।
इस पंद मे और पद सं० ५ मे गहरा साम्य है। दोनो ही पदो से
व्यक्त भावनाएँ और घटनाएँ एक सी हैं। अस्तु, बहुत सम्भव है कि
दोनो ही पद स्वतन्त्र पद न होकर एक ही पद के रूपान्तर मात्र हो ।
संघर्षोभिव्यक्ति १०१
१०
म्हाने बोल्याँ मति मारो जी राणा यो लैइ थारो देस ।
मीराँ महलाँ से ऊतरी कोई सात सहेल्या माय ।
खेलत पायो काँकरो कोई सेवा सालगराम ।
साध जी आया पावणा¹ कोई मीराँ के दरबार ।
जाजम² दीनो बैसणो³ कोई ढाल्यो⁴ दीनो ढाल⁵ ।
जैर पियालो राणां जी भेज्यो झ्झो मीराँ ने प्याय ।
कर चरणामृत पी गई मीराँ, थे जाणो दीनानाथ ।
साँप पिटारो राणा जी भेज्यो, दीज्यो मीराँ ने जाय ।
कर खगवालो⁶ पहिरियो कोई हो गयो नोसर हार ।
राणा जी कागद भेजियो कोई द्यो⁷ मीराँ ने जाय ।
साधॉ की सगत छोड़ द्यो मीराँ बैठो राण्या रे भाय ।
काढ कटारो राणा जी भेज्यो, दूजी भेजी तरवार ।
एक मीराँ की दोय करा, दो की हो गई च्यार ।
राणो मीराँ से यो कहे जी, किस्यो⁷ थाँरो भगवान ।
राज पाट सब छोडस्याँ कोई म्है भी भजा भगवान ।
कच्चो रग उड जाय जै छी, पक्को रंग नही जाय ।
मीराँ कै रग गोपाल को जी, अब छुटना को नाय ।
म्हॉने ताना मत मारो हो, राणा यो लेइ थारो देस ।
।।१७३।।†
प्राप्त इतिहास के अनुसार मेडता और उसके आसपास की भूमि
“मीराँ बाई रो देस” कहलाता है। अत उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति और
पदो से सर्वथा भिन्न पडती है। अन्य पदाभिव्यक्तियो के आधार पर
यही स्पष्ट होता है कि मेडता जाने के हेतु ही मीराँ चित्तौड त्याग
करती है। परन्तु मेडता न जाकर सीधे द्वारका चली जाती है। ज्यो
१ अतिथि, २ दरी, ३ आसन, ४ मूँज के बनाये हुए छोटे पलग, मचिया,
५ बिछा दिया, ६ सर्प, ७ कौन सौ।
३. विरह-वेदना एवं प्रेम-निवेदन
१०२ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
ही राणा को यह मालूम होता है त्यो ही वे सदेशवाहक को भेजकर मीराँ
को लौटाने का निष्फल प्रयास करते हैं। उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से
मीराँ का मेडता जाना ही सिद्ध होता है। इस तरह का विरोधाभास
उपस्थित करने वाला यही एक पद प्राप्त है। मीराँ द्वारा किया गया
गृह-त्याग मेडते से ही हुआ ऐसा वर्णन अन्य कुछ पदो मे भी मिलता है।
प्राप्त इतिहास मे यही एक ऐसा पहलू है जिस पर सभी विद्वान् एक स्वर
से सहमत है। साथ ही, यही एक ऐसा पहलू है जहाँ के प्राप्त वृत्तान्त
और प्राप्त पदो की अभिव्यक्ति मे समन्वय होता है। अस्तु पूर्वापर
सबध पर दृष्टि रखते हुए, यही पदाभिव्यक्ति विशेष प्रामाणिक
प्रतीत होती है।
११
गरुड चढ हरि आंए मीराँ के पास ।
आनन्द तूर बजाय के, पूरी मन की आस ।
राणा मोपर कोपियो, म्हॉरी तक तक सेज ।
लाज लागे छे म्हाँको, दीजो पीहर भेज ।
मीराँ महल से ऊतरी, राणे पकरियो हाथ ।
हथलेवा रो नात रो, परत न मानूं बात ।
मीराँ रथ सिणमार के, ऊँटा कसिया थात ।
डावो मेल्याँ मेडतो, पेलाँ पोखर जात ।
कुल की तारण अस्तरी, मुरड़ चली राठौड़ ।
राणा मो पर कोपिया, रती न राख्यो मोद ।
ले जाती बैकुण्ठ मे, समझ्यो नही सिसोद ।
मीराँ मुक्त दुहेलडी राम की, जैसे खाँडे की धार ।
कोई सन्त जन बिरला, ऊतरे भव कें पार ।
मीराँ ने प्रभु गिरिधर मिलियो, नागर नन्दकिसोर ।
तन मन् धन सब अरपिया चरण कमल की ओर ॥१७४॥†
पद मे पूर्वापर संगति का अभाव है। प्रथम दो पक्तियो की भाषा
खड़ी बोली से प्रभावित है। राजमहलो मे अप्रिय स्थिति के कारण
सघर्षाभिव्यक्ति १०३
ही मीराँ चित्तौड त्याग कर अपने पीहर, मेडते जाने का आग्रह करती
है। तत्पश्चात सहसा ही मीराँ द्वारा मेडता त्याग का भी वर्णन है।
मीराँ की मानसिक स्थिति के चित्रण से पद का अन्त हो जाता है।
एक इसी पद मे नही अपितु गृह-त्याग की स्थिति का चित्रण करनेवाले
प्राय सभी पदो मे ऐसा ही वर्णन मिलता है। “डावो तो मेल्यो मेडतो”
जैसी अभिव्यक्ति सभी पदो मे मिलती है। किस ओर पद से इस 'डांवो'
दिशा का ज्ञान हो यह जानना सरल नही प्रतीत होता। "सूधा
द्वारका जाय" "पुष्कर न्हावा जाय" "पेला पोखर जात" "पूठ दयी
चित्तोड" या "राणा जी पडया जूनागढ रे मारग ओ" जैसी
अभिव्यक्तियाँ मीराँ द्वारा की गयी यात्रा के मार्ग को इगित करती है।
प्राप्त सामग्री के आधार पर मीराँ द्वारा की गई वृँन्दावन की यात्रा
प्रामाणिक नही सिद्ध होती। इतना ही नही, यह भी लक्षित होता है
कि मीराँ चित्तौड त्याग कर मेडता जाती है और फिर एक दिन मेडता
भी त्याग कर द्वारिका की ओर पैर बढाती है।"
मीराँ का प्रामाणिक वृत्तान्त जानने के लिए इन विशेष पहलूओँ
पर खोज होना विशेष आवश्यक है।
१२
ओ ल्यो राणा जी देस थॉरो, बन मे कुटिया बनस्यां ।
राणा जी म्हेतो गोविन्द का गुण गास्यां ।
राणा जी म्हे तो साधा कं सग रहस्यां ।
राणा जी रूसे म्हारो कुछए न बिगडै, हर रूस्या मरजास्या ।
विष को प्यालो राणा जी भेज्यो, कर चरणामृत भी जास्या ।
सिसोदिया म्हे तो साधा के संग रहस्या ।
ओत्यो राणा जी म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां ।
सिसोदिया म्हे तो साधां ये संग रहस्यां ॥१७५॥
यह पद भी प्रथम पक्ति के आधार पर “राणाजी बोल्याँ मति
मारो" (पद सं० ३) का ही रूपान्तर प्रतीत होता है, परन्तु शेष पद मे
कोई साम्य नही है। मीराँ के साधु-संग का गहरा विरोध और तज्जन्य
१०४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
संघर्ष दोनो ही पदो से लक्षित होता है, तथापि दोनो ही पदो से विभिन्न
घटनाओ का आभास मिलता है ।
उपर्युक्त पद मे 'चुनरी' लौटा देने की अभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण
है क्योकि उससे मीराँ का सधवा होना ही सिद्ध होता है ।
१३
सुत्यो राणा जी निस भर नीद ओ,
कोई सुत्याँ ने सुपोणराणा जी ने आयो ।
साथियो रे भाई करो ए विचार ओ,
साथिडा हो काई म्होरी मेडतणी भगवाँ पहर लियाँ ।
सुपणो राणा जी आल जजाल ओ,
राणा जी पड्योरे जूनागढ रो मारग रे ।
राणा जी कोई दीप उगायो' मीराँ बाई के देस ।
बूझ्या राणा जी गायाँ रो ग्वाल ओ
कोई देस बताओ मीराँबाई रो, ।
ओई राणा जी मेडतणी रो देस,
कोई साल२ थोडा सख्व भोगना३ ओ ।
बूझ्यो राणा जी मालीडारो पूत,
कोई बाग बताओ मीराँ बाई रो,
ओई राणा जी मीराँ बाई रो बाग ।
कोई आम्बू तो पाक्याँ नीबूँ रस भर्या,
सामी मिल गई साधुडा री जमात ।
बीच मे तो मीराँ बाई घूमती ओ राम ।
मीराँ बाई थॉरो बिडद बतलायाँ,
मेडतणी बिडद' बतलायाँ म्हे थांने पूजस्यां ।
१ दीप उगायो—दीप प्रज्ज्वलित किया, भावार्थ—दिन भर चलने के
पश्चात् सायकाल पहुँचे, २ बजर भूमि, ३ भोगने योग्य ।
संघर्षाभिव्यक्ति १०५
मोडो१ लख्यो असल गवाँर ओ राणा,
पहेली तो लखतो बैकुँठा ले जाती ओ राणा।
॥१७६॥ †
१४
सुत्या राणा जी नीस भरी नीद, सुत्यो राणा ने सुपणो भी आयो।
थॉरी मीराँ मेडतणी भगवाँ लियो, मीराँ मेडतणी ए भगवाँ लियो ।
सुपणो तो है आल जजाल, मीराँ तो मेडतणी बैठी बाप के ।
उठो रे साथीडा कसलो घोडा जी, दिनडो उगास्याँ मीराँ जी के देस मे।
चाल्यो राणा जी ढलती सी रात, दिनडो उगायो मीराँ जी के देसमे।
खूँट्याँ टागो ए घुडला जी, तम्बूड़ा तना दो चम्पा बाग मे।
आयो आयो साधुडारो साथ, मायँ२ तो मीराँ आवे घूमती ओ राम।
छोडो ए मीराँ साधुडा रो साथ, लाजै पीहर और थॉरो सासरो।
नही छोडों साधुडा रो साथ, भल लाजो पीहर और सासरो।
ओढ़ो ए मीराँ दिक्खनी रा चीर*, भगवा तो बसतर ए छोड़ द्यो ।
बालूँ ए जालूँ थांरा दिक्खनी रा चीर, प्यारे लागे धोला बसतर ।
चुडलो तो पहरो ए हॉथी दाँत को, पहरो ए नोसर हार।
चुडलो तो मोलूँ३ गढ के काँगरे, तोडूूं ए नोसर हार।
आयी आयी राणा जी ने रीस,४ काढ कटारो मीराँ जी पर वायो।५
आयी आयी राणी जी ने रीस, एक मीराँ की सहस होय गयी ॥१७७॥†
पदाभिव्यक्ति की महत्ता स्पष्ट ही है। मेडते से ही मीराँ ससार
त्याग करती हैं। इस भावना की पुष्टि उपर्युक्त दोनो ही पाठो से
होती है। प्रथम पाठ मे राणा द्वारा मीराँ को "मेड़तणी" सम्बोधित
किया गया है, यह इस पद की विशेषता है।
१ बहुत देर मे, २बीच मे, ३ फोडूूं, ४ क्रोध, ५ फेका।
- दिक्खनीराचीर—दक्षिण मे बना हुआ वस्त्र जो अपनी बहुमूल्यता और
सौन्दर्य के कारण राजस्थान मे विशेष प्रसिद्ध था अस्तु यह मुहावरा विशेष बढ़िया
और बहुमूल्य वस्तु के लिये रूढ़िवाचक हो गया है।
१०६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद की शैली पूर्णतया वर्णनात्मक है। राजस्थानी लोकगीत की
शैली इन पदो से मिलती जुलती है। पहले पाठ मे राणा द्वारा 'मीराँ
बाई के देस' और राजस्थान का पता पूछा जाना भी विशेष रूपेण
विचारणीय है।
“ओढो ए मीराँ दिखनी रा चीर ˙ ˙ ˙ प्यारा लागे धोला
बसतर” पक्तियाँ भी विचारणीय है। कुछ पदो मे “धोला” वस्त्र का
और अन्य पदो मे “भगवा” वस्त्र का ही वर्णन मिलता है। नाथ
परम्परा प्रभावित अधिकांश पदो मे भगवा वस्त्र की चरचा है, तो सत
मत प्रभावित अधिकांश पदो मे “धोला” सफेद वस्त्र की ही चरचा है।
मतभेद और संघर्ष द्योतक कुछ पदो मे कही “धोला” वस्त्र का और कही
'भगवा' वस्त्र का दोनो का ही वर्णन समान रूप से है। एक ही पद मे
दोनो का वर्णन इस पद विशेष मे ही है। 'भगवा' और 'धोला' शब्दो के
बीच कौन प्रामाणिक और कौन प्रक्षिप्त है, यह कहना अद्यावधि
सम्भव नही।
१५
राणा जी क्याने राखो म्हासूं बैर।
थे तो राणा जी म्हाँने इसड़ा¹ लागो, ज्यूँ ब्रच्छन के केर।
महल अटारी हम सब त्याज्यो, त्याज्यो थारो बसनो सहर।
काजल टीकी राणा हम सब त्याग्या, भगवी चादर पहर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, इमरत कर दियो जहर ॥१७८॥
पाठान्तर १,
राणा जी थे क्याने राखो मोसूं बेर।
राणा जी म्हाँने असा लगत हो, ज्यों विरछन मे केर।
मास घर मेवाड मेडतो त्याग दियो थॉरो सहेर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हठ कर पी गई जहेर।
उपर्युक्त पाठकी तीसरी पंक्तिमे निम्नांकित पाठान्तर मिलता है :—
“थारै रूस्याँ राणा कुछ नही बिगडे, अब हरि कीनी महेर।
१ ऐसे।
सघर्षाभिव्यक्ति १०७
पाठान्तर २,
राणा म्हासूँ क्यो ने जी राखो बैर ।
मारू घर मेवाड मेडत्यों, सारा छोडया सहैर ।
आप राणा जी म्हॉने इसका·लागो, जैसा जगल मे कैर ।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, राम भरोसे पियो जहरै ।
दूसरा पाठ प्रथम पाठ का ही गेय रूपान्तर प्रतीत होता है। प्रथम
पाठ की ठेठ राजस्थानी भाषा द्वितीय पाठ मे ब्रजभाषा की ओर झुकती
प्रतीत होती है। जैसे 'म्हाँसू', 'मोसूं', 'इसडा लागो', 'असा लगत हो।'
द्वितीय पाठ की "मारू घर मेवाड मेडतो" अभिव्यक्ति प्रथम पाठ
से सर्वथा भिन्न पडती है। पूर्वापर सबंध देखते भी "मारू" शब्द का
प्रयोग अशुद्ध ही ठहरता है । शुद्ध रूपेण 'म्हाँरो' होना चाहिए ।
म्हाँरो का अर्थ है "मेरा" ।
इन सभी पाठो से समान रूपेण व्यक्त होनेवाली एक अभिव्यक्ति
“म्हाने इसडा लागो ज्यो बिरछन मे केर'।" विशेष विचारणीय है।
१ केर एक कटीला पेड जो राजस्थान के जगलो मे बहुतायत से
पाया जाता है। इसमे गोल गोल, छोटे हरे फल लगते हैं जो बहुत खारे
होते हैं। इन फलो मे छोटे छोटे बीज भी होते हैं। इनको नमक के पानी
मे एक लम्बे अरसे तक के लिए भिगो दिया जाता है, जिससे इसका
खारापन निकल जाता हैं तब इसको कूट कर बीज अलग कर दिया जाता
है और इसकी तरकारी या अचार बनाया जाता है। इस पेड के काटे
बहुत तीखे होते हैं। इसकी टहनियाँ काटकर खेत आदि के किनारे दो तीन
तीन फिट ऊची दीवार के रूप मे खडी कर दी जाती है, जिससे जानवर
आदि खेत खराब न कर सके । सुरक्षा के ख्याल से मकान के चारो तरफ
भी प्रात लोग इसको लगा देते है। इन झाडो को केर की झाडी कहते
हैं। झाडी शब्द ही इसके लिये रूढ़यार्थ हो गया है। इन झाडियो पर
भूत-प्रेत का निवास माना जाता हैं। अत सूर्यास्त के समय से कोई इनके
पास से गुजरता भी नही है। "इसडा लागो ज्यो ब्रच्छन मे "कैर" जैसी
अभिव्यक्ति से राणा के प्रति मीराँ की कटु और हीनतम भावनाए स्पष्ट
हो उठती है।
१०८ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
इस पद का एक और भी पहलू विशेष विचारणीय है। पदाभिव्यक्ति
से स्पष्ट है कि मीराँ ने गृह-त्याग कर दिया है किन्तु अब भी राणा को
मीराँ के प्रति उपालंभ है। अब भी राणा का मन मीराँ के
प्रति कठोर भावनाओ से पूर्ण है। मीराँ कराह उठती है कि जहर
पीने पर और घर छोड देने पर भी राणा का व्यवहार उनके प्रति
कठोर है। गृह-त्याग के बाद भी मीराँ के समक्ष राणा के बैर का प्रश्न
ही क्योकर उठ सका, प्राप्त वृतान्त यहाँ सर्वथा मौन है। अस्तु,
स्पष्ट ही है कि पद को प्रामाणिक मान लेने पर पदाभिव्यक्ति से व्यक्त
होती घटनाओ पर खोज होना नितान्त आवश्यक हो जाता है।
१६
सिसोद्या राणो, प्यालो म्हाँने क्यूँ रे पठायो।
भली बुरी तो मै नहि कीन्ही राणा क्यूँ है रिसायो।
थाने म्होने देह दिवी है ज्याँ रो हरि गुण गायो।
कनक कटोरे लै विष घाल्यो दयाराम भडो लायो।
अठी उठी१ तो मै देख्यो कर चरणामृत पायो।
आज कल की मै नाही राणा जद यह ब्राह्माण्ड छायो।
मेडतिया घर जन्म लियो है मीराँ नाम कहायो।
प्रहलाद की प्रतिज्ञा राखी खभ फाड बेगो धायो।
मीराँ कहे प्रभु गिरिधर नागर, जन को बिडद बढायो।।१७९।।†
पदाभिव्यक्ति मे संगति का अभाव है। "आज काल की मै नही"
जैसी अभिव्यक्ति के तुरन्त बाद ही "मेडतिया घर जन्म लियो है"
जैसी अभिव्यक्ति अमान्य ही हो उठती है। पद का प्रारम्भ होता है
राणा के प्रति सम्बोधन से और अन्त होता है कृष्ण की लीलाओ के
वर्णन से, यहाँ भी पूर्वापर सबंध की असबद्धता स्पष्ट हो उठती है।
पदाभिव्यक्ति से व्यक्त होती बाते विशेष विचारणीय है।
पदाभिव्यक्ति के अनुसार राणा की आज्ञा से मीराँ तक विष का प्याला
ले जाने वाला व्यक्ति का नाम दयाराम पांडे था। परन्तु मुंशी
१ यहाँ वहाँ—चारो तरफ।