मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव
Page 165 of 365
Read in context१०६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह
पद की शैली पूर्णतया वर्णनात्मक है। राजस्थानी लोकगीत की
शैली इन पदो से मिलती जुलती है। पहले पाठ मे राणा द्वारा 'मीराँ
बाई के देस' और राजस्थान का पता पूछा जाना भी विशेष रूपेण
विचारणीय है।
“ओढो ए मीराँ दिखनी रा चीर ˙ ˙ ˙ प्यारा लागे धोला
बसतर” पक्तियाँ भी विचारणीय है। कुछ पदो मे “धोला” वस्त्र का
और अन्य पदो मे “भगवा” वस्त्र का ही वर्णन मिलता है। नाथ
परम्परा प्रभावित अधिकांश पदो मे भगवा वस्त्र की चरचा है, तो सत
मत प्रभावित अधिकांश पदो मे “धोला” सफेद वस्त्र की ही चरचा है।
मतभेद और संघर्ष द्योतक कुछ पदो मे कही “धोला” वस्त्र का और कही
'भगवा' वस्त्र का दोनो का ही वर्णन समान रूप से है। एक ही पद मे
दोनो का वर्णन इस पद विशेष मे ही है। 'भगवा' और 'धोला' शब्दो के
बीच कौन प्रामाणिक और कौन प्रक्षिप्त है, यह कहना अद्यावधि
सम्भव नही।
१५
राणा जी क्याने राखो म्हासूं बैर।
थे तो राणा जी म्हाँने इसड़ा¹ लागो, ज्यूँ ब्रच्छन के केर।
महल अटारी हम सब त्याज्यो, त्याज्यो थारो बसनो सहर।
काजल टीकी राणा हम सब त्याग्या, भगवी चादर पहर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, इमरत कर दियो जहर ॥१७८॥
पाठान्तर १,
राणा जी थे क्याने राखो मोसूं बेर।
राणा जी म्हाँने असा लगत हो, ज्यों विरछन मे केर।
मास घर मेवाड मेडतो त्याग दियो थॉरो सहेर।
मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हठ कर पी गई जहेर।
उपर्युक्त पाठकी तीसरी पंक्तिमे निम्नांकित पाठान्तर मिलता है :—
“थारै रूस्याँ राणा कुछ नही बिगडे, अब हरि कीनी महेर।
१ ऐसे।