Skip to content
SarvaKosh
मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

by भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव

DevanagariRajasthanipublished365 pages

Page 162 of 365

Read in context
Page 162

सघर्षाभिव्यक्ति १०३
ही मीराँ चित्तौड त्याग कर अपने पीहर, मेडते जाने का आग्रह करती
है। तत्पश्चात सहसा ही मीराँ द्वारा मेडता त्याग का भी वर्णन है।
मीराँ की मानसिक स्थिति के चित्रण से पद का अन्त हो जाता है।
एक इसी पद मे नही अपितु गृह-त्याग की स्थिति का चित्रण करनेवाले
प्राय सभी पदो मे ऐसा ही वर्णन मिलता है। “डावो तो मेल्यो मेडतो”
जैसी अभिव्यक्ति सभी पदो मे मिलती है। किस ओर पद से इस 'डांवो'
दिशा का ज्ञान हो यह जानना सरल नही प्रतीत होता। "सूधा
द्वारका जाय" "पुष्कर न्हावा जाय" "पेला पोखर जात" "पूठ दयी
चित्तोड" या "राणा जी पडया जूनागढ रे मारग ओ" जैसी
अभिव्यक्तियाँ मीराँ द्वारा की गयी यात्रा के मार्ग को इगित करती है।
प्राप्त सामग्री के आधार पर मीराँ द्वारा की गई वृँन्दावन की यात्रा
प्रामाणिक नही सिद्ध होती। इतना ही नही, यह भी लक्षित होता है
कि मीराँ चित्तौड त्याग कर मेडता जाती है और फिर एक दिन मेडता
भी त्याग कर द्वारिका की ओर पैर बढाती है।"
मीराँ का प्रामाणिक वृत्तान्त जानने के लिए इन विशेष पहलूओँ
पर खोज होना विशेष आवश्यक है।
१२
ओ ल्यो राणा जी देस थॉरो, बन मे कुटिया बनस्यां ।
राणा जी म्हेतो गोविन्द का गुण गास्यां ।
राणा जी म्हे तो साधा कं सग रहस्यां ।
राणा जी रूसे म्हारो कुछए न बिगडै, हर रूस्या मरजास्या ।
विष को प्यालो राणा जी भेज्यो, कर चरणामृत भी जास्या ।
सिसोदिया म्हे तो साधा के संग रहस्या ।
ओत्यो राणा जी म्हे तो गोविन्द का गुण गास्यां ।
सिसोदिया म्हे तो साधां ये संग रहस्यां ॥१७५॥
यह पद भी प्रथम पक्ति के आधार पर “राणाजी बोल्याँ मति
मारो" (पद सं० ३) का ही रूपान्तर प्रतीत होता है, परन्तु शेष पद मे
कोई साम्य नही है। मीराँ के साधु-संग का गहरा विरोध और तज्जन्य