मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
by पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार)
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Read in contextहिन्दी अनुवाद २६
देवसोमा-स्वामी ! पृथ्वी घूम रही है, घूम रही है। सामने गिरने
वाली हूँ, अब मुझे सम्हालिए ।
कपाली- प्यारी ! ठीक है। [सहारा देता हुआ गिरने का अभिनय
करके] प्यारी ! सोमदेवा ! क्या तुम नाराज हो ? (क्योंकि) मैं सहारा
देने के लिए पास आ रहा हूँ (और) तुम दूर होती जा रही हो ।
देवसोमा-हाँ, सोमदेवा को गुस्सा आया तो तुम्हारे सिर से नमस्कार
करके मनाने पर भी दूर होती जा रही है ।
कपाली-निस्संदेह तुम ही सोमदेवा हो । (सोचकर) नहीं, देवसोमा ।
देवसोमा-स्वामी ! वैसी प्यासी सोमदेवा को मेरे नाम से बुलाना
उचित नहीं है ।
कपाली-आर्ये ! मेरे नशे के कारण यह शब्दों के उलट-फेर का
दोष है ।
देवसोमा-अच्छा तो तुम अपराधी नहीं हो ।
कपाली-यह मेरे ऊपर मदिरा का प्रभाव कैसे हो रहा है ? अच्छा,
अच्छा, आज से मदिरा पीना छोड़ता हूँ।
देवसोमा-स्वामी ! नहीं, नहीं, मेरे कारण व्रतभङ्ग करके तप को
तोड़ना ठीक नहीं । (पैरों पर गिर पड़ती है ।)
कपाली-(हर्ष से उठाकर, आलिङ्गन करके) नमः शिवाय ।
मदिरा पीनी चाहिए, प्रियतमा का मुख देखना चाहिए, स्वभाव से
सुन्दर तथा विकृत वेष पहनना चाहिए, जिन्होंने ऐसा यह मोक्ष का मार्ग
दिखाया वह भगवान् शिव दीर्घजीवी हों ॥७॥