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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages
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साहिब कह रहे हैं कि विचार करो ! यह मन बड़ा ही जालिम है । जिसका इस मन से पाला पड़ता है, वो ही इसे समझ सकता है । मन के कारण ही संसार का भ्रम दिखाई दे रहा है । इसी भ्रम में सब अटक के हैं । सगुण-निर्गुण दोनों मन का खेल है, जिसमें बड़े-बड़े चतुर भी अटक हुए हैं । ये 14 लोक भी मन ने ही पाँच तत्व और तीन गुण से बनाए हैं । 14 लोक में जीवों को फँसा दिया है, जिसे कोई समझ नहीं पा रहा है । जो कोई कहे कि उसने मन को मार लिया है, तो समझो कि झूठ बोल रहा है, क्योंकि मन की कोई रूप-रेखा नहीं है । यह तो एक पल में इतने रंग दिखाता है कि जो सपने भी नहीं देखे होते । यह 21 ब्रह्माणों में सब पर शासन चलाता है । जितने भी रस हैं, उन सब का भोग करने वाला मन राजा ही है, फिर उसे बस में कैसे किया जा सकता है ! सबके परे एक निःअच्छर नाम है, जब उसमें मन को लगाया जाता है, तब ही यह मन समझ में आता है । साहिब कह रहे हैं कि यह बात मैं बिलकुल सत्य कह रहा हूँ ।

यह मन जालिम जोर रे

बरजे नहीं माने, यह मन जालिम जोर रे ॥
जो कोई मन को पकड़ा चाहे, भागत साँकर तोड़ रे ॥
सुर नर मुनि सब पछि पछि हारे, हाथ न आवे चोर रे ॥
जो हँसा सतगुरु के होई, राखे ममता छोट रे ॥
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, बचो गुरु की ओट रे ॥

हे हँसा ! यह मन बड़ा जालिम और ताकतवर है, रोके नहीं रुकता । कोई उसे पकड़ने की कोशिश करे, वश में करने का प्रयास करे तो यह जंजीर तोड़ कर भाग जाता है । सुर, नर, मुनि सब इसे वश में करते-करते हार गये, पर यह चोर किसी के वश में नहीं आया । जो हँस सद्गुरु की शरण ग्रहण करता है, वो संसार की ममता को त्यागकर इसे अपने वश कर लेता है । इसलिए साहिब कह रहे हैं मेरी बात सुनकर उस पर विचार करो और सद्गुरु की शरण में आकर बच लो ।

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दो शब्द संगत की ओर से

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दो शब्द संगत की ओर से

आप जब इस संसार में आए, तब महाकलयुग शुरू हो गया था। आम आदमी ही नहीं, भक्ति करने वाला इंसान भी भटक चुका था। आपने आकर केवल धार्मिक क्रांति ही नहीं लाई बल्कि समाज सुधार का काम भी किया। जहाँ धर्म में व्यवसाय, राजनीति, रोमांस आदि ने स्थान ले लिया था, वहीं समाज में हिंसा, छल, कपट, ठगी, बेईमानी, चरित्रहीनता सहित अनेक बुराइयाँ अपनी चरम सीमा तक पहुँच रही थीं। कहीं सयाने बाबे हमारी माँ, बहन, बेटियों को नचा रहे थे तो कहीं नकली ज्योतिषि समाज को भटका रहे थे। आपने समाज को जगाया, बचो इनसे। इसके लिए आपको इस महाकलयुग में पाखण्डियों द्वारा बहुत निंदा झेलनी पड़ी।

कहीं उग्रवादी कहा गया। दुनिया भी कितनी भोली है, मान लिया। फौज में नौकरी करने वाले को उग्रवादी कहा। कितने बेवकूफ थे पाखण्डी। फिर मानने वाले तो भोले भाले थे, विचार भी नहीं किया। कहीं आपको मजनू कहा गया। आप तो किसी स्त्री को स्पर्श तक नहीं करते हैं और न ही आपने शादी की। यदि आपको जरूरत होती तो शादी कर लेते। यह भी किसी ने विचार नहीं किया। कहीं चमार कहा गया। आपके गुरु के लिए भी किसी की यह सोच रही थी। किसी ने उनकी जाति पूछी थी। आपके गुरु जी ने कहा कि जाति पाति पूछे न कोई। हरि को भजे सो हरि का होई।। तो उसने कहा कि यह तो रविदास जी ने कहा था, क्योंकि वे जाति से चमार थे। तब आपका दिल हुआ कि बता दूँ कि गुरु जी ब्राह्मण हैं, पर गुरु जी ने इशारे से मना कर दिया। बाद में कहा कि अपनी जाति बतानी ही नहीं है। आप तो स्वयं साहिब हैं, फिर आपकी जाति जो पूछे वो मूर्ख ही है। फिर पाखण्डियों ने आपको अनेक यातनाएं

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देने की कोशिश की, कहीं जहर दिया, कहीं जिंदा जलाने का प्रयास किया, कहीं तलवारों से मरवाने की कोशिश की, पर आपका कोई बाल भी बांका नहीं कर सका।

साहिब आए काल जगत में, निंदे सबही कोय।

महाकलयुग देत है दस्तक, पाखण्ड जय जय होय ॥

पर आप चुप नहीं हुए, जो संदेश समाज को शुरू से दिया, उससे कभी हटे नहीं, कहीं आपने अपने शब्दों में बदलाव नहीं लाया। महाकलयुग में आप अनेक यातनाएं सहते हुए समाज को बुराइयों से, पाखण्डियों से बचा रहे हैं। इस कलयुग में जो काम आप कर रहे हैं, न आज कोई कर रहा, न आगे कर पायेगा।

इस अनथक बेमिसाल शूरवीर सदगुरु मधु परमहंस जी के चरणों में अर्पण दो शब्द लिखने के लिए हमारी कलम नहीं रुक रही। जिसने 17 साल की आयु से ही भारत की थल सेना के महार गुप में रह कर अपनी देश सेवा के दौरान ही संसार के, भूले भटके लोगों को भक्ति का ठीक रास्ता दिखाने के लिए संत सम्राट् सदगुरु कबीर साहिब द्वारा दिया सच का प्रतीक, 'सत्य का झंडा' उठाया। निरंजन की भक्ति को छोड़कर सत्य पुरुष की भक्ति करने को कहा है।

मिठास के प्रतीक 'मधु' परमहंस जी के विशाल हृदय से निकलने वाली निर्मल धारा ने भक्ति के क्षेत्र में एक सैलाब व क्रांति ला रखी है। जिसने पाखण्डवाद को झंझोड़ कर रख दिया है। यही कारण है कि भक्ति के नाम पर पल रहे सभी तपके, इस अथक नौजवान के विरोध में नित्य नये जाल बनाये जा रहे हैं। कोई कुल्ले जला रहा है कोई लाखों की फिरोती देकर, कोई जहर आदि देकर उस परम सत्य के सैलाब को रोकने की कोशिश कर रहा है।

मगर कौन रोक पायेगा ! सतसंग करना उनका शौक है पेशा नहीं। सतसंग द्वारा वे जीवात्मा को चेतन करके उसे अमर लोक का नाम प्रदान कर रहे हैं। जो शिष्य की सोते, जागते सुरक्षा करता है और जीवात्मा मन

गुरु और सतगुरु में अंतर

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और माया से अजाद हो कर अमर-लोक चली जाती है। साहिब कहते हैं 'नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा'। इसीलिए साहिब बार-बार सुचेत करते हैं कि मैं बढ़ई वश नहीं कहता।

“जो वस्तु मेरे पास है वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।”

सतगुरु मारा तानि के, शब्द सुरंगे बान।
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ न गहुँ कमान ॥

<!-- image: Decorative separator consisting of four floral-like symbols. -->

पूरे संसार में गुरु और सतगुरु को एक ही सत्ता पर
स्थापत कर एक ही बात बोला जा रहा है।
आओ गुरु और सतगुरु के रहस्य को जाने

<table border="1"> <thead> <tr> <th>“गुरु”</th> <th>“सतगुरु”</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td> <ol style="list-style-type: none;"> <li>1. गुरु रास्ता बताने वाला है।</li> <li>2. गुरु का नाम लिखने, पढ़ने, बोलने और जपने में आता है।</li> <li>3. गुरु शास्त्रों की शक्शी देकर अपना तत्व स्थापत करता है।</li> <li>4. गुरु केवल काया-नाम का गयाता है।</li> <li>5. काया का नाम मुर्दा नाम है जो देही को दिया जाता है।</li> </ol> </td> <td> <ol style="list-style-type: none;"> <li>1. सतगुरु धुर पहुंचान वाला है।</li> <li>2. सतगुरु का नाम एक गुप्त पावर है जो जीवन भर आखरी सुआंस तक सेवक की सुरक्षा करती है यह गुप्त पावर जो लिखने पढ़ने बोलने में वही आता है।</li> <li>3. सतगुरु किसी शास्त्र का मुहताज नहीं है। वह अपने अनुभव से देखा हुआ तत्व स्थापत करता है।</li> <li>4. सतगुरु ही केवल विदेह-नाम का गयाता है।</li> <li>5. सतगुरु का नाम जिन्दा नाम है। जो सुरति को दिया जाता है।</li> </ol> </td> </tr> </tbody> </table>
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<table border="1"> <thead> <tr> <th>“गुरु”</th> <th>“सतगुरु”</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td> <p>6. गुरु की पहुँच केवल दशम-द्वार तक है।</p> <p>7. गुरु भक्ति केवल नाम-कमाई पर केंद्रित है।</p> <p>8. गुरु भक्ति केवल सगुण-निगुण दायरे तक ही सीमित है।</p> <p>9. गुरु तीन-लोक का गयाता है।</p> <p>10. गुरु आत्मा का गयान नहीं दे सकता।</p> <p>11. गुरु मुक्ति नहीं दे सकता।</p> <p>12. गुरु मन-माया की सीमा में बँधा हुआ व्यक्तित्व है।</p> <p>13. गुरु परमपुरुष का भेद नहीं जानता।</p> <p>14. गुरु किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से पार करने की क्षमता नहीं रखता।</p> <p>15. गुरु की पहुँच केवल निराकार सत्ता (काल निरंजन) तक ही है।</p> <p>16. गुरु द्वारा बताए हुए सभी देशों अथवा धुनों का जिकर किया जा सकता है।</p> </td> <td> <p>6. सतगुरु की पहुँच ग्यारहवें द्वार तक है।</p> <p>7. सतगुरु भक्ति पूरी तरह गुरु ‘कृपा’ पर केंद्रित है।</p> <p>8. सतगुरु भक्ति की सीमा अनन्त तक है, जो सगुण-निगुण से भी आगे है।</p> <p>9. सतगुरु चौथे-लोक का गयाता है।</p> <p>10. सतगुरु आत्मा का समर्पण गयान देता है।</p> <p>11. सतगुरु ही केवल पूर्ण-मुक्ति का दाता है।</p> <p>12. सतगुरु मन-माया की सीमा से ऊपर मुक्त एक अमर व्यक्ति तत्त्व है।</p> <p>13. सतगुरु खुद परमपुरुष में मिला हुआ और उन्हीं का तदरूप है।</p> <p>14. सतगुरु अपनी कृपा से किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से हमेशा के लिए पार करने की क्षमता रखता है।</p> <p>15. सतगुरु की पहुँच सीधा परमपुरुष तक है।</p> <p>16. सदगुरु के सार शब्द अथवा अमर लोक का खुलासा नहीं किया जा सकता।</p> </td> </tr> </tbody> </table>

कबीर साहिब जी को निरंजन ने अपना परिचय देते हुए कहा

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कबीर साहिब जी को निरंजन ने अपना परिचय देते हुए कहा

मैंं सिरजौं मैंं मारऊँ, मैंं जारौं मैंं खाऊँ ।
जल थल नभ में रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ ॥

मैंं ही अमरधाम परमपुरुष का पंचम शब्द पुत्र हूँ ।
मैंं ही विमूढ़ वरदान लेकर, परमपुरुष से शापित हूँ ।
मैंं ही आद्यशक्ति-सह-हँसों को ले कालपुरुष कहाता हूँ ।
मैंं ही निरंजन अमरधाम के मानसरोवर से निष्कासित हूँ ।

मैंं 'मन' ही आत्मरूप तीन लोक में वासित हूँ ॥
मैंं ही आद्यशक्ति का पति शरीरों का रचयिता हूँ ।
मैंं ही त्रिदेवों का पिता-गुरु और आराध्य हूँ ।
मैंं ही वायु ध्वनि से वेद-शब्द शून्य में ओंकार हूँ ।
मैंं ही वेदों में परमेश्वर और पंचतत्व आधार हूँ ।

मैंं 'मन' ही सृष्टि से परे रारंकार हूँ ॥
मैंं ही साकार-निराकार में विद्यमान हूँ ।
मैंं ही आलोकित ज्योतिस्वरूप सौर्य मण्डलों में व्याप्त हूँ ।
मैंं ही सप्त आकाश और सप्तसागर पाताल हूँ ।
मैंं ही सृष्टि रचना लघु-प्रलय महाप्रलय का आधार हूँ ।

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मैं 'मन' ही सकल सृष्टि का करतार हूँ॥

मैं ही शून्य मण्डलों से परे घनघोर अंधकार हूँ॥

मैं ही त्रिदेवों दशावतारों का विधाता ध्यान हूँ॥

मैं ही आत्म शक्ति के बन्धन का जीवों में कर्म विधान हूँ॥

मैं ही माया संग शरीरों में आत्मावरण और ज्ञान हूँ॥

मैं 'मन' ही जीवात्मा की गुण अवगुण पहचान हूँ॥

मैं ही शुभ अशुभ और पुण्य-पाप का सृजक हूँ॥

मैं ही तीरथ व्रत यज्ञ जप तप कर्म निर्माता हूँ॥

मैं ही धर्म अधर्म के जीवन कर्मों का व्याख्याता हूँ॥

मैं ही वैकुण्ठ और स्वर्ग-नरक कर्मफल प्रदाता हूँ॥

मैं 'मन' ही कर्म संचय स्रोत बन जाता हूँ॥

मैं ही एक उज्ज्वल पक्ष, दया करूणा का वरदान हूँ॥

मैं ही जीवों में तम रूप काम-क्रोध की खान हूँ॥

मैं ही तपस्वी ऋषि मुनि योगी का सिद्धिदाता हूँ॥

मैं ही मनुष्य की मनोकामना, सुख-दुःख हो जाता हूँ॥

मैं 'मन' ही जन्म-मरण के क्रम बनाता हूँ॥

मैं ही देव और दानवों का कर्ता जग संचालक हूँ॥

मैं ही योग ध्यान में सिद्धि निधियों का वाहक हूँ॥

मैं ही त्रिकुटि मध्य बसा, दसवें द्वार विराजित हूँ॥

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पुस्तक सूची

हिन्दी में

<table style="width: 100%; border-collapse: collapse;"> <tbody> <tr> <td style="width: 50%; vertical-align: top;"> 1. परा रहस्या<br> 2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु<br> 3. पावन प्रार्थनाएँ<br> 4. सद्गुरु चालीसा<br> 5. वार्षिक डायरी<br> 6. सद्गुरु भक्ति<br> 7. कहाँ से तू आया और कहाँ<br>     तुझे जाना रे?<br> 8. सत्संग सुधारस<br> 9. नाम अमृत सागर<br> 10. अमृत वाणी<br> 11. सद्गुरु नाम जहाज़ है<br> 12. चल हंसा सतलोक<br> 13. कोटि नाम संसार में तिनते<br>     मुक्ति न होय<br> 14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला<br>     कोय<br> 15. गुरु सुमित्रै सो पार<br> 16. तीन लोक से न्यारा<br> 17. सेहत के लिए ज़रूरी </td> <td style="width: 50%; vertical-align: top;"> 18. सहजे सहज पाइये<br> 19. रोगों से छुटकारा<br> 20. सद्गुरु महिमा<br> 21. भक्ति के चोर<br> 22. अनुरागसागर वाणी<br> 23. भक्ति सागर<br> 24. हरि सेवा युग चार है, गुरु<br>     सेवा पल एक<br> 25. सत्य नाम के सुमरते उबरे<br>     पतित अनेक<br> 26. काग पलट हंसा कर दीना<br> 27. कस्तूरी कुण्डल बसै मृग<br>     खोजे बन माहिं<br> 28. गुरु पारस गुरु परस है<br> 29. गुरु अमृत की खान<br> 30. शीश दिये जो गुरु मिले तो<br>     भी सस्ता जान<br> 31. मूल सुरति<br> 32. भृंग मता होय जिहि पास,<br>     सोई गुरु सत्य धर्मदासा </td> </tr> </tbody> </table>
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  1. मैं कहता हूँ आँखिन देखी
  2. गुरु संजीवन नाम बतावे
  3. नाम बिना नर भटक मरे
  4. रोगों की पहचान
  5. यह संसार काल को देशा
  6. न्यारी भक्ति
  7. साहिब तेरी साहिबी सब
    घट रही समय
  8. जाप मरे अजपा मरे अनहद
    भी मर जाए
  9. आयुर्वेद का कमाल रोगों के
    निदान में
  10. सुरति समानी नाम में
  11. सबकी गठरी लाल है, कोई
    नहीं कंगाल
  12. निन्दक जीवे युगन युग
    काम हमारा होय।
  13. निराले सदगुरु
  14. कुँजड़ों की हाट में हीरे का
    क्या मोल
  15. जीवड़ा तू तो अमर लोक का
    पड़ा काल बस आई हो
  16. मुझे है काम 'सदगुरु से
    जगत रूठे तो रूठन दे'
  17. जेहि खोजत कल्पो भये
    घटहि माहिं सो मूर
  18. आत्म ज्ञान बिना नर भटके
  19. बिन सतगुरु बाँचे नहीं
    कोटिन करे उपाय
  20. अँधी सुरति नाम बिन जानो
  21. सत्यनाम निज औषधि
    सदगुरु दर्ई बताय
  22. सेहत संजीवनी
  23. भक्ति दान गुरु दीजिए
  24. मन पर जो सवार है ऐसा
    ऐसा विरला कोई
  25. सत्यनाम है सार बूझौ सन्त
    विवेक करि
  26. रोग निवारक
  27. मुक्ति भेद मैं कहौं विचारी
  28. "तेरा बैरी कोई नहीं
    तेरा बैरी मन"
  29. सुरति का खेल सारा है
  30. सार शब्द निहअक्षर सारा
  31. करूँ जगत से न्यार
  32. बिन सत्संग विवेक न होई
  33. सत्य नाम को जनि कर दूजा
    देई बहा
  34. सुरत कमल सदगुरु स्थाना
  35. मनहिं निरंजन सबै नचाए
  36. सत्यपुरुष को जानसी
    तिसका सतगुरु नाम