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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

मन का स्वरूप

मन का स्वरूप


मन सारी दुनिया को कठपुतली का नाच नचाया करता है। मन ही साहिब की सब निर्मल आत्माओं को बहुत लम्बे समय से शरीर रूपी पिंजड़े में भ्रमित किये हुए है। यही श्रद्धालुओं और सच्चाई की खोज करने वालों को आदिकाल से भटकाए हुए हैं; अतः आत्मा के कल्याण के लिए, इसे बन्धन से छुड़ाने के लिए हमें सर्वप्रथम मन के स्वरूप को जानना होगा।

विभिन्न पंथों, सम्प्रदायों और धर्मों से सम्बन्धित धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करने और उनके प्रचारकों और श्रद्धालुओं से वार्तालाप करने से पता चलता है कि कुछ पंथ और सम्प्रदाय ‘मन क्या है?’ प्रश्न के विषय में खामोश हैं। वे केवल इतना मानते हैं कि मन बहुत अद्भुत शक्ति का भण्डार है। यह काबू में नहीं आता। इसके विपरीत कुछ पंथों तथा सम्प्रदायों ने इस प्रश्न पर अपने-अपने ढंग से रोशनी डाली है, जिससे उनके विचारों में भिन्नता आ गई है।

आखिर ‘मन क्या है’ यह एक गम्भीर विषय बन जाता है। इस विषय में जो कुछ विचार प्रकट हुए हैं, वे इस प्रकार हैं।

कुछ विचारकों के मत में मन और आत्मा एक ही चीज़ हैं। वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन दोनों में कोई भी अन्तर नहीं। यह मन आत्मा की संकल्प- शक्ति है। वे यह तर्क देते हैं कि अगर मन आत्मा से भिन्न माना जाए तो फिर इसे शरीर का अंग मानना पड़ेगा और इन

हालात में शरीर के मिटने के साथ यह भी मिटेगा; परन्तु ऐसा होता नहीं। कुछ अन्य पंथों का मत है कि मन और आत्मा अलग-अलग चीज़ हैं। केवल मानव शरीर के अन्दर ही वे एक-दूसरे से बँध जाते हैं। मन की संगत के कारण ही आत्मा को पीड़ा उठानी पड़ती है; लेकिन जब किसी सद्गुरु के आशीर्वाद से यह गाँठ खुल जाती है तो आत्मा, जो ईश्वर का अंश है, वापिस अपने घर चली जाती है, जबकि मन, जो ब्रह्म का अंश है, त्रिकुटी में वापिस अपने स्थान पर चला जाता है।

यदि इन विभिन्न पंथों की विचारधाराओं का विचारपूर्वक अध्ययन किया जाए तो यही पता चलेगा कि मन के बारे में उनकी विचारधारा में कहीं-न-कहीं त्रुटि है। कहीं भी मन का स्वरूप स्पष्ट नहीं हो रहा। आओ, देखते हैं कि साहिब क्या कह रहे हैं, इस विषय में।

तन मन कौ खोजहु रे भाई, तन छुटे मन कहाँ समाई।
सनक सनन्दन ये दोनामां, भगति करी मन उनहुँ न जाना।
शिव विरंचि नारद मुनि ज्ञानी, मन की गति उनहुँ नहिं जानी।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण शेषा, तन भीतरी मन उनहुँ न देखा॥

कबीर साहिब कह रहे हैं कि हे भाईयो! इस मन की खोज करो। सोचो तो ज़रा कि तन के छूटने पर यह मन कहाँ चला जाता है! इस विषय को सनक, सनन्दन, जयदेव, नामदेव आदि महान् भक्त भी समझ नहीं पाए। इतना ही नहीं, 'शिव विरंचि नारद मुनि ज्ञानी, मन की गति उनहुँ नहिं जानी' यह कबीर साहिब क्या कह रहे हैं? ज़रा सोचो तो! कितनी बड़ी बात कह रहे हैं! इस विषय पर गम्भीरता से विचार करना होगा। लेकिन यहीं नहीं रुकेंगे, पूरी बात को समझना है।

अच्छा, यह तो समझ में आ रहा है कि यह मन जीवात्मा को ठगने के लिए एक निपुण ठग की तरह है। इसने बड़े-बड़े मुनियों, योगियों आदि को भी धोखा दिया है। योगियों ने अनेक प्रकार से ध्यान किया, अनेक प्रकार के जप-तप किये, शरीर को कष्ट दिया, शरीर सुखा

डाला, परन्तु फिर भी यह मन वश में नहीं हुआ, पकड़ में नहीं आया। आखिर यह मन है कौन? आगे आओ! देखो, साहिब क्या कह रहे हैं?

निराकार      मन      ही      को      जानो'

आगे कह रहे हैं—

मन हि सरूपी देव निरंजन, तोहिं रहा भरमाई।
हे हंसा तू अमर लोक का, पड़ा काल बस आई॥
पाँच पचीस तीन का पिंजड़ा, जा में तोहिं राखा भरमाई॥

पता चल रहा है कि मन निराकार है, निरंजन है। इसी ने निर्मल आत्मा को गन्दे से शरीर रूपी पिंजड़े में भ्रमित किया हुआ है। फिर एक स्थान पर साहिब चेता रहे हैं—

अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना॥

साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, ( ज्योति निरंजन ) जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बंध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है; दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह में डालता है; उसकी जीभ और चोंच जलती है और फिर वो उसे उगल देता है; पर दूसरे ही क्षण फिर-फिर उसे चन्द्रमा के भ्रम में बार-बार मुँह में डालता है और अंत में परम दुःख को प्राप्त होता है। साहिब कहते हैं कि इसी तरह संसारी मनुष्य निरंजन को ही अन्तिम सत्य मान बैठे हैं, संसार के अधिष्ठाता निरंजन की तरफ ही जा रहे हैं, उसी की भक्ति कर रहे हैं और अंत में परम दुःख को प्राप्त हो रहे हैं; क्योंकि वे आवागमन से छूट नहीं पा रहे और निरंतर निरंजन की चौरासी की चक्की में पिस रहे हैं।