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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

श्री सद्गुरुवेनमः

मनहिं निरंजन सबै नचाए

दूजे शब्द जु पुरुष परकासा । निकसे कूर्म चरण गहि आसा ॥
तीजे शब्द भयेजु पुरुष उच्चार। ज्ञान नाम सुत उपजे सारा ॥
टेकी चरण सम्मुख है रहेऊ । आज्ञा पुरुष द्वीप तिन्ह दएऊ ॥
चौथे शब्द भये पुनि जबही । विवेक नाम सुत उपजे तबहीं ॥
आप पुरुष किये द्वीप निवासा । पंचम शब्द सो तेज परकासा ॥
पांचव शब्द जब पुरुष उच्चार। काल निरंजन भो औतारा ॥

— सतगुरु मधु परमहंस जी

<!-- image: श्री सद्गुरु वे नमःसत्यसाहिब बन्दगी — Logo featuring a sunburst design with the text 'श्री सद्गुरु वे नमः' at the top and 'सत्य' in the center. To the left is 'साहिब' and to the right is 'बन्दगी'. -->

सन्त आश्रम रॉजड्री, पोस्ट राया, ज़िला साम्बा ( जे. एण्ड के . )

मनहिं निरंजन सबै नचाए
— सतगुरु मधुपरमहंस जी

प्रचार अधिकारी

— राम रतन, जम्मू

© SANT ASHRAM RANJRI (J & K)

ALL RIGHTS RESERVED

<table border="1"> <tr> <td>First Edition</td> <td>—</td> <td>April, 2011</td> </tr> <tr> <td>Copies</td> <td>—</td> <td>5000</td> </tr> </table>

Website Address.

www.sahibbandgi.org

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E-Mail Address.

*[email protected]

Editor

Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri
Post -Raya, Distt.-Samba (J & K)
Ph. (01923) 242695, 242602

विषय सूचि

पृष्ठ संख्या

<table><tr><td>1. तेरा बैरी मन</td><td>5</td></tr><tr><td>2. मन का स्वरूप</td><td>13</td></tr><tr><td>3. मन के रूप</td><td>16</td></tr><tr><td>4. मन का परिवार</td><td>22</td></tr><tr><td>5. मन की अवस्थाएँ</td><td>37</td></tr><tr><td>6. तीन लोक में मन का राज</td><td>41</td></tr><tr><td>7. अष्ट कमल पर मन धाए</td><td>46</td></tr><tr><td>8. मन की तपस्या</td><td>53</td></tr><tr><td>9. मन के अवतार</td><td>66</td></tr><tr><td>10. मन के 12 पंथ</td><td>84</td></tr><tr><td>11. मन का तोड़</td><td>86</td></tr><tr><td>12. ध्यान में मन की बाधा</td><td>96</td></tr><tr><td>13. साखियाँ और सब्द</td><td>100</td></tr><tr><td>14. दो शब्द संगत की ओर से</td><td>113</td></tr><tr><td>15. गुरु और सतगुरु में अंतर</td><td>115</td></tr><tr><td>16. कबीर साहिब जी को निरंजन ने अपना<br>परिचय देते हुए कहा</td><td>117</td></tr></table> <!-- image: Three decorative floral or geometric symbols arranged horizontally. -->

दो शब्द

सत्याद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥

एक बार मैंने 'इंडिया टूडे' में एक लेख पढ़ा, जो वर्ष का महावाक्य था। राष्ट्रपति रीगन के पी. ए. ऐलेक्जेंडर ने वो लेख लिखा था। उसने लिखा था— “मुझे यूँ लगता है कि हम सब धरती पर जीने वाले लोग एक शैतानी ताकत के हाथ में खेल रहे हैं। मुझे लगता है कि हम सबका संचालन एक शैतानी ताकत करती है। वो ताकत जब भी चाहे, धरती पर रहने वाले सभी मनुष्यों की बुद्धि को एक साथ एक ही दिशा में घुमा सकती है। वो ताकत पुरी दुनिया के लोगों के विचार बदल सकती है। मुझे ऐसा लग रहा है, वो शक्ति हम सबको विनाश की तरफ ले जा रही है।”

कितनी ऊँची बात लिखी थी। उसने मंथन किया होगा। मुझे लग रहा है कि उसने साहिब की वाणी पढ़ी होगी। अगर नहीं पढ़ा तो उसे धन्यवाद दूँगा कि इतनी ऊँची बात उसके दिमाग में आ गयी। साहिब तो कह रहे हैं—

मन तरंग में जगत भुलाना ॥

यह सारा संसार मन की तरंगों में बहे जा रहा है, मन के कहे अनुसार संसार में अनात्म कार्य किये जा रहा है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि किसी को भी मन समझ में नहीं आ रहा है। यही मन काल है। यही मन सबको विनाश की तरफ लिए जा रहा है। मन को न समझ पाने से सब अज्ञानवश पाप कर्मों में उलझ गये हैं, क्योंकि यही पाप-कर्म करवा रहा है। मन की ही भक्ति करते हुए सब काल के मुँह में जा रहे हैं, क्योंकि यह सत्य-पुरुष की सत्य भक्ति की तरफ किसी को आसानी से नहीं जाने दे रहा और अपनी ही भक्ति करवा रहा है।

अकथ कथा या मनहि की, कहैं कबीर समुझाय।
जो जाको समझा परै, ताको काल न खाय ॥

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