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मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished120 पृष्ठ

तीन लोक में मन का राज

तीन लोक में मन का राज


तीन लोक में मनहिं विराजी, ताहि न चीहनत पंडित काजी

इस मन की सीमा देखते हैं। मन ब्रह्माण्ड का राजा है; अतः इसकी सीमा कोई छोटी नहीं है। भौतिक शक्तियों द्वारा इस मन से पार कभी भी नहीं पाया जा सकता। वैज्ञानिक लोग अभी मंगल ग्रह तक भी नहीं पहुँच पा रहे हैं। यदि वैज्ञानिक लोग पारपाइन्डर जैसे यान के माध्यम से स्वर्ग तक भी जाना चाहें तो पृथ्वी से स्वर्ग तक की दूरी को देखते हुए ऐसा यान करीब 500 साल में भी वहाँ नहीं पहुँच सकता, चाहे वो एक ही गति से क्यों न चलता रहे। यदि किसी पैदा हुए बच्चे को पूरी व्यवस्था के साथ उस यान में सुरक्षित भेज दिया जाए तो वह बच्चा बूढ़ा होकर मर भी जाएगा, लेकिन वहाँ नहीं पहुँच पाएगा। फिर मन की सीमा तो बड़ी विशाल है।

मन की सीमा को जानने के लिए इस ब्रह्माण्ड की संरचना को समझना होगा। जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है। हमारी जंघाओं के नीचे सात लोक हैं, जिन्हें सात पाताल भी कहा जाता है—अतल, वितल, सुतल, तलालत, महातल, रसातल और पाताल। इसके ऊपर फिर सात लोक और हैं। पहले गुदा द्वार पर सिद्ध-लोक है। यहाँ पर गणेश जी का वास है। यहाँ मात्र इच्छा से सब कार्य होते हैं। इसके बाद शिशिन्द्रिय पर ब्रह्म-लोक है। यहाँ ब्रह्माजी और सावित्री जी का वास है। सृजन का कार्य यहीं से है। इसके ऊपर फिर विष्णु लोक है, जो नाभि स्थान पर है। यहाँ विष्णु जी सहित लक्ष्मी जी का वास है। स्वर्ग

इसी को कहते हैं। फिर ऊपर हृदय स्थान पर शिव-लोक है। यहाँ शिवजी सहित पार्वती का वास है। इसी स्थान से ही 70 प्रकार की धुने पैदा होती हैं। जो कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग आवाज़ों में सुनाई देती हैं। संहार का कार्य यही से है। जब हमें गुस्सा आता है तो हृदय से ही आता है। इसके ऊपर कण्ठ स्थान पर शक्ति-लोक है। यहाँ पर आद्य-शक्ति का वास है। यही माया है। फिर आज्ञा चक्र पर आत्म-लोक है। यहाँ आत्मा रहती है। इसके ऊपर सहस्रसार चक्र पर निरंजन-लोक है। यहाँ इस ब्रह्माण्ड का राजा मन रहता है। यही काल-पुरुष है। सात-सात करोड़ योजन एक से एक चक्र पर दूरी है। इस प्रकार इस मन की बड़ी विशाल सीमा है।

यह संसार काल-पुरुष का देश है। यहाँ पर कुछ भी आत्मा के हित में नहीं है। वो सबको यहाँ पर दुख दे रहा है। लोग अवतारों की महिमा गाते हैं, पर साहिब कह रहे हैं कि वो भी उसी की सीमा में हैं। तीन-लोक में जो भी है, सब काल के दायरे में है।

यह हरदो यहाँ काल पुरुष के हैं हिजारे ।
हर सिम्त व हर जाय में यम जाल पसारे ॥
यक लोक व यक वेद दो दरिया के किनारे ।
सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
चलती है यहाँ तेग व तलवार दो धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब काल का ही है। हर शै में उसका जाल फैला हुआ है। दुनिया के सब लोग उस क्रूर के काबू में हैं। इसलिए हे हंस! तू हमारे देश में चल। आगे कह रहे हैं—

जब भूल गया आदम को आपही आपा ।
पावन्द हुवा तिफली जवानी व बुढ़ापा ॥
सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा ।
है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥

जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरीरे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब पर मौत का साया मण्डरा रहा है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आग लगी हुई है, जिसमें सारा संसार जल रहा है। इसलिए इस जलते हुए संसार को छोड़ और हमारे देश में चल।

यह पूरी दुनिया मन की है। मन इस संसार का राजा है,
इसलिए उसी की हुकूमत चल रही है।

जिसकी हुकूमत होती है, उसी का राज होता है, उसी का हुकूम चलता है। देखते हैं कि दुनिया में काल-पुरुष की हुकूमत चल रही है क्या? थोड़ा चिंतन करें तो लगेगा कि चल रही है। जिस भी पार्टी की सत्ता होती है, उसी का हुकूम चलता है। कैबिनेट में बड़े मनिस्टर होते हैं। बिजली के महकमें के लिए अलग मंत्री है, रक्षा के लिए अलग मंत्री है। लगता है कि पूरी हुकूमत चला रहे हैं। क्या इस तरह मन की हुकूमत हमारे अन्दर चल रही है? लग रहा है कि हम सबके अन्दर एक ऐसी सत्ता की हुकूमत चल रही है, जो हमेशा हमारे विरुद्ध चल रही है।

स्कूलों में सरकार की हुकूमत है। वो चाहें तो स्कूल 7 बजे खुलेंगे, वो चाहें तो 8 बजे खुलेंगे। इस तरह दुनिया में निरंजन की हुकूमत चल रही है। वो कैसे कर रहा है हुकूमत?

मनहिं निरंजन सब पर छाए ॥

उसकी ताकत है कि उसके हर आदेश का पालन होता है। आखिर कुछ जान सकते हैं कि कैसे चलता है? वो हरेक चीज़ करवा सकता है। कैसे? जैसे सी.एम. का शासन चल रहा है। मन की हुकूमत कैसे चलती है? यह ब्रेन को संदेश देता है। जितने भी मिनीस्टर हैं, सी.एम. के अधीन हैं। इस तरह मन के भी बड़े मिनीस्टर हैं। मन ने कहा कि फ़लाने को तमाचा मारो। यह आज्ञा कैसे पालन हुई? मन ने यह चीज़ बुद्धि को बताई। बुद्धि क्या है? यह बुद्धि भी मन है। उसने विचार किया कि गाली बकी थी इसने। बुद्धि ने क्रोध को बुलाया, कहा कि सुनो, यह

काम करना। गुस्से का मिनीस्टर है—क्रोध। संदेश दिया। उकसाना ज़रूरी था वहाँ। नहीं आता क्रोध तो नहीं मारना था। इनका कोई कसूर नहीं है। पुलिस वालों को आदेश मिला कि मारो तो उनका कसूर नहीं है, आदेश का पालन कर रहे हैं। इस तरह इनका कसूर नहीं है। इन्होंने आदेश माना। इसके भी एस.पी. हैं। इन्द्रियों पर देवता हैं; सब इसकी बात मान रहे हैं। मन ने कहा कि आम खाना है। हरेक बात का पालन होता है। मन ने कहा कि धन चाहिए। क्या कर रहा है? बॉस है, किनारे बैठकर नेटवर्क चला रहा है। माफिया है।

जीव के संग मन काल रहाई। अज्ञानी नर जानत नाहीं ॥

धन चाहिए। ऐसे नहीं आयेगा। बुद्धि ने लोभ को कहा—हाय पैसा, हाय पैसा। दिल में समा जायेगा। सरकार ने कहा कि फ़लाना काम करना है। सभी जुट जाते हैं कार्यकता। बुद्धि एक बार आदेश दे दे कि चाँटा मारना है, हाथ तैयार हो जायेंगे। यह काम हो जायेगा। पाँच चीज़ें विशिष्ट हैं। पाँचों इसमें बड़े मंत्री हैं। इनके सैकेट्री हैं, पूरा परिवार है। जो कहा, वो करना-ही-करना है, नहीं तो शांति नहीं है। चाहे-अनचाहे करना ही है, क्योंकि मन का आदेश है।

मोह आया। मोह का मिनीस्टर ब्रेन में बैठेगा, कहेगा कि बेटे के लिए यह कर, वो कर। आदमी सोचता है कि तारे तोड़ लाऊँ। मिनीस्टरों ने कार्यकर्ताओं को अधिकार दे रखे हैं। इस तरह इनके पास हथियार हैं, दिख नहीं रहे हैं।

मन जो चाहता है, वो करता है। यही दुश्मन बना देता है। इसकी तह में जायेंगे तो यह सेना बहुत है। मन की सेना बड़ी तगड़ी है।

जैसे सैकेट्री हैं, तहसीलदार हैं, कमीशनर हैं, थाना है, चौकियाँ हैं, फिर बाजारों में सिपाही खड़े हैं। पूरे एरिए को पकड़ा है। इस तरह मन तीन-लोक का राजा जो है। यह इसे सही में मिला है। पॉवर मिला है। काम, क्रोध आदि भी इसी के हैं।

मन का हर एक आदेश पालन किया जाता है। जो भी चाहता है,

करवा लेता है। इस मन की हुकूमत बहुत बड़ी है। मन एक संदेश देता है। सभी इंद्रियाँ इस आदेश का पालन करती हैं। मन के चार रूप हैं—मन, बुद्धि, चित और अहंकार। चारों ये मन के रूप हैं। यह बुद्धि आदेश देती है कि फ़लाने को तमाचे लगाने हैं तो हाथ, शरीर, आत्मा सभी उस मन की आज्ञा का अनुकरण करते हैं। मन के मिनीस्टर हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दंभ। इनकी बड़ी सेना है। जैसे शासन संचालित होता है, ऐसे ही मन का पूरा नेटवर्क है। जो ऊपर से संदेश आया, नीचे तक सभी उस आदेश का पालन करते हैं। इस तरह मन के आदेश का सभी पालन करते हैं। उदाहरण के लिए बुद्धि ने कहा कि इसने हमें अच्छा नहीं कहा, इसे मारो। तो आदेश देती है। हाथ मारने के लिए तेज़ी से चल पड़ते हैं। फिर यह काम कैसे होता है? क्रोध के साथ हिंसा भी आ जाती है। हिंसा क्रोध की पत्नी है। अविचार उसका पुत्र है और घृणी उसकी बहू है। परिवार इतना खतरनाक है। हिंसा रानी कहती है कि मज़ा आ रहा है, मारो। इतना आनन्द आता है कि विवेक नहीं होता है। अविचार उसका पुत्र है। जब भी क्रोध आता है लगता है कि शांति तभी मिलेगी, जब मारेंगे। गुस्से में कभी गाली बकता है। शांति के लिए बकता है। सकून मिलता है। यह कैसा सकून था कि किसी को चोट पहुँचाने से शांति मिली! यह हिंसा क्रोध की पत्नी थी। तब अविचार भी आ जाता है, कुछ नहीं सोचने देता है। वो कहता है कि लगे रहो। फिर घृणा आ जाती है। परिवार खतरनाक है। देखते हैं तो हरेक इंसान में ये चीज़ें मिल रही हैं। इसका मतलब है कि मन का नेटवर्क बहुत बड़ा है। साहिब ऐसे ही नहीं कह रहे—

तीन लोक में मनहिं विराजी। ताहि न चीहृत पंडित काजी ॥

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