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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 8

१८- संशप्तक-सेनाओंके साथ अर्जुनका युद्ध और सुधन्वाका वध
१९- संशप्तकगणोंके साथ अर्जुनका घोर युद्ध
२०- द्रोणाचार्यके द्वारा गरुड़व्यूहका निर्माण, युधिष्ठिरका भय, धृष्टद्युम्नका आश्वासन, धृष्टद्युम्न और दुर्मुखका युद्ध तथा संकुल युद्धमें गजसेनाका संहार
२१- द्रोणाचार्यके द्वारा सत्यजित्, शतानीक, दृढ़सेन, क्षेम, वसुदान तथा पांचालराजकुमार आदिका वध और पाण्डव-सेनाकी पराजय
२२- द्रोणके युद्धके विषयमें दुर्योधन और कर्णका संवाद
२३- पाण्डव-सेनाके महारथियोंके रथ, घोड़े, ध्वज तथा धनुषोंका विवरण
२४- धृतराष्ट्रका अपना खेद प्रकाशित करते हुए युद्धके समाचार पूछना
२५- कौरव-पाण्डव-सैनिकोंके द्वन्द्व-युद्ध
२६- भीमसेनका भगदत्तके हाथीके साथ युद्ध, हाथी और भगदत्तका भयानक पराक्रम
२७- अर्जुनका संशप्तक-सेनाके साथ भयंकर युद्ध और उसके अधिकांश भागका वध
२८- संशप्तकोंका संहार करके अर्जुनका कौरव-सेनापर आक्रमण तथा भगदत्त और उनके हाथीका पराक्रम
२९- अर्जुन और भगदत्तका युद्ध, श्रीकृष्णद्वारा भगदत्तके वैष्णवास्त्रसे अर्जुनकी रक्षा तथा अर्जुनद्वारा हाथीसहित भगदत्तका वध
३०- अर्जुनके द्वारा वृषक और अचलका वध, शकुनिकी माया और उसकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन
३१- कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध तथा अश्वत्थामाके द्वारा राजा नीलका वध
३२- कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध, भीमसेनका कौरव महारथियोंके साथ संग्राम, भयंकर संहार, पाण्डवोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, अर्जुन और कर्णका युद्ध, कर्णके भाइयोंका वध तथा कर्ण और सात्यकिका संग्राम

(अभिमन्युवधपर्व)

३३- दुर्योधनका उपालम्भ, द्रोणाचार्यकी प्रतिज्ञा और अभिमन्युवधके वृत्तान्तका संक्षेपसे वर्णन
३४- संजयके द्वारा अभिमन्युकी प्रशंसा, द्रोणाचार्यद्वारा चक्रव्यूहका निर्माण
३५- युधिष्ठिर और अभिमन्युका संवाद तथा व्यूहभेदनके लिये अभिमन्युकी प्रतिज्ञा
३६- अभिमन्युका उत्साह तथा उसके द्वारा कौरवोंकी चतुरंगिणी सेनाका संहार
३७- अभिमन्युका पराक्रम, उसके द्वारा अश्मक-पुत्रका वध, शल्यका मूर्च्छित होना और कौरव-सेनाका पलायन
३८- अभिमन्युके द्वारा शल्यके भाईका वध तथा द्रोणाचार्यकी रथसेनाका पलायन