कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
४. किष्किन्धाकाण्ड (सुग्रीव मैत्री व लंका प्रस्थान)
'तुलसी' तमकि चलैं, राघौकी सपथ करें,
को करै अटक कपिकटक अमरषा ॥७॥
बहुत-से बड़े-बड़े भयंकर बानर और भालु इस प्रकार दौड़े
मानो अनेक वेष धारण किये काल ही क्रोधित हो दौड़ रहा हो। कोई
शिला, कोई पर्वत, कोई शाल, कोई ताड़ और कोई तमालके वृक्ष
तोड़ लाये और समुद्रको तोपने लगे। यह देखकर देवसमाज हर्षित
हुआ। दिशाओंके हाथी डोलने लगे, कच्छप और वाराह कलमला
गये, पहाड़ काँपने लगे और शेष दब गये। गोसाईंजी कहते हैं—
श्रीरामचन्द्रजीकी दुहाई देकर सब बानर तमककर चलते हैं। भला
ऐसा कौन है जो उस क्रोधभरे कपिकटकको रोक सके ?
आए सुक, सारनु, बोलाए ते कहन लागे,
पुलक सरीर सेना करत फहम हीं।
'महाबली बानर विसाल भालु काल-से
कराल हैं, रहें कहाँ, समाहिंगे कहाँ महीं' ॥
हँस्यो दसकंधु रघुनाथको प्रतापु सुनि,
'तुलसी' दुरावै मुखु, सूखत सहम हीं।
: रामके बिरोधें बुरो बिधि-हरि-हरहू को,
सबको भलो है राजा रामके रहम हीं ॥८॥
सुक और सारण [वानर-सेना देखकर] लौट आये हैं। उनके
शरीर कपिकटकका खयाल करते ही पुलकित हो गये। बुलाकर
पूछनेपर वे कहने लगे—'महाबलवान् बानर और विशाल भालु
कालके समान भयंकर हैं। वे न जाने कहाँ रहते हैं और पृथ्वीमें
७१ लंकाकाण्ड
कहाँ समायेंगे ।' श्रीरामचन्द्रका प्रताप सुनकर रावण हँसा ।
गोसाईं जी कहते हैं—डरसे उसका मुँह सूख गया है, (किन्तु वह)
उसे (हँसकर) छिपाता है। श्रीरामचन्द्रजीसे वैर करनेसे तो ब्रह्मा,
विष्णु और शिवका भी अहित होता है। सबकी भलाई तो महाराज
रामकी कृपामें ही है।
अङ्गदजीका दूतत्व
'आयो! आयो! आयो सोई बानरु बहोरि!' भयो
सोरु चहुँ ओर लंकाँ आएँ जुबराजकें।
एक काढैं सोंज, एक धोंज करें, 'कहा हैहै,
पोच भई,' महासोचु सुभटसमाजकें ॥
गाज्यो कपिराजू रघुराजकी सपथ करि,
मूँदे कान जातुधान मानो गाजें गाजकें।
सहमि सुखात बातजातकी सुरति करि,
लवा ज्यों लुकात तुलसी झपटें बाजकें ॥९॥
लंकामें युवराज (अङ्गदजी) के आनेपर वहाँ चारों ओर यही
शोर हो गया कि वही (लंका जलानेवाला) वानर फिर आ गया,
वही वानर फिर आ गया। कोई असबाब निकालने लगे और कोई
दौड़ने और कहने लगे कि 'भाई! बड़ा बुरा हुआ; न जाने अब
क्या होगा ?' इस प्रकार वीरसमाजमें बड़ी चिन्ता हो गयी। जब
कपिराज (अङ्गद) श्रीरामचन्द्रजीकी दोहाई देकर गरजे तो राक्षसों ने
कान मूँद लिये, मानो बिजलौ कड़की हो। वे लोग हनुमान्जीके
स्मरणकर डरके मारे सूख गये और ऐसे छिपने लगे जैसे बाजके
झपटनेपर लवा पक्षी छिप जाता है।
कवितावली ७३
तुलसीस बल रघुबीरजू कें बालिसुतु
ताहि न गनत, बात कहत करेरी-सी।
'बकसीस ईसजू की खीस होत देखिअत,
रिस काहें लागति, कहत हौं मैं तेरी-सी ॥
चढ़ि गढ़-मढ़ दृढ़, कोटकें कँगूरें, कोपि
नेकु धक्का देहिं, दैहैं ढेलनकी ढेरी-सी।
सुनु दसमाथ ! नाथ-साथके हमारे कपि
हाथ लंका लाइहैं तौ रहेगी हथेरी-सी ॥१०॥
तुलसीदासजीके स्वामी श्रीरामचन्द्रके बलपर बालिपुत्र अङ्गद
उस (रावण) को कुछ नहीं समझते और कड़ी-कड़ी बातें कहते
हैं कि 'आज शिवजीकी दी हुई सम्पत्ति नष्ट होती दिखायी देती है,
इससे तुम क्रोधित क्यों होते हो ? मैं तो तुम्हारे हितकी ही बात
कहता हूँ । हे रावण ! सुनो, हमारे स्वामीके साथके बंदर जब गढ़के
मकानोंपर और कोटके सुदृढ़ कँगूरोंपर चढ़ जायेंगे और क्रोधित
होकर जरा भी धक्का देंगे तो सब ढेलोंकी ढेरीके समान ढह जायेंगे।'
और उन्होंने लङ्कामें हाथ डाला तो वह हथेलीके समान सपाट
(चौपट) हो जायगी।
'दूषनु, बिराधु, खरु, त्रिसिरा, कबंधु बधे
तालऊ बिसाल बेधे, कौतुकु हे कालिको ।
एक ही बिसिख बस भयो बीर बाँकुरो सो,
तोहू है बिदित बलु महाबली बालिको ॥
'तुलसी' कहत हित, मानतो न नेकु संक,
मेरो कहा जैहैं, फलु पैहै तू कुचालिको ।
७३ लंकाकाण्ड
बीर-करि-केसरी कुठारपानि मानी हारि,
तेरी कहा चली, बिड़ ! तोसे गनै घालि को॥११॥
देखो, उन्होंने दूषण, विराध, खर, त्रिशिरा और कबन्धको
मारा, बड़े विशाल ताड़ोंका भी (एक ही बाणसे) छेदन किया—
ये सब उनके कलके ही कौतुक हैं। जिस महाबलशाली बालिका
बल तुझे भी विदित है, वह बाँका वीर भी उनके एक ही बाणके
अधीन हो गया। हम तेरे हितकी बात कहते हैं, परन्तु तू जरा भी
भय नहीं मानता; सो मेरा क्या जायगा, तू ही अपनी कुचालका
फल पावेगा। जो वीररूपी गजराजोंके लिये सिंहके समान हैं,
उन कुठारपाणि परशुरामजीने भी जिनसे हार मान ली, अरे नीच !
उनके सामने तेरी क्या चल सकती है? तेरे जैसोंको पासंगके
बराबर भी कौन गिनता है ?
तोसों कहौं दसकंधर रे, रघुनाथ विरोधु न कीजिए बौरै।
बालि बली, खरु दूषनु और अनेक गिरे जे-जे भीतिमें दौरै ॥
ऐसिअ हाल भई तोहि धों, न तु लै मिलु सीय चहै सुखु जौं रे।
रामकें रोष न राखि सकैं तुलसी बिधि, श्रीपति, संकरु सौ रे॥१२॥
'अरे दशकन्ध ! मैं तुझसे कहता हूँ, तू भूलकर भी रघुनाथ-
जीसे विरोध न करना। महाबली बालि और खर-दूषणादि जो वीर
दीवारपर दौड़े वे ही गिर पड़े। तेरी भी ऐसी ही दशा होनेवाली है;
नहीं तो, यदि सुख चाहता है तो जानकीजीको लेकर मिल। अरे,
श्रीरामचन्द्रके क्रोधसे सैकड़ों ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी रक्षा नहीं
कर सकते।
कवितावली ७४
तूँ रजनीचरनाथु महा, रघुनाथके सेवकको जनु हौं हौं ।
बलवान है स्वानु गलीं अपनीं, तोहि लाज न गालु बजावत साँहौं ॥
बीस भुजा, दस सीस हरौं, न डरौं प्रभु-आयसु-भंग तें जौं हौं ।
खेतमें केहरि ज्यों गजराज दलौं दल, बालिको बालकु तौ हौं ॥१३॥
तू निशाचरोंका महाराज है और मैं रघुनाथजीके सेवक सुग्रीव-
का सेवक हूँ । अपनी गलीमें तो कुत्ता भी बलवान् होता है ।
तुमको मेरे सामने गाल बजाते लाज नहीं आती । यदि मैं
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाभङ्गसे न डरता तो तुम्हारा बीसों भुजाओं
और दसों सिरोंको उतार लेता । जैसे सिंह गजराजका दलन करता
है वैसे ही यदि युद्धक्षेत्रमें मैं तुम्हारी सेनाका दलन करूँ तभी तुम
मुझे बालिका बालक जानना ।
कोसलराजके काज हौं आजु त्रिकूट उपारि, लै बारिधि बोरौं ।
महा भुजदंड द्वै अंडकटाह चपेटकीं चोट चटाक दै फोरौं ॥
आयसभंगतें जौं न डरौं, सब भीजि सभासद श्रोनित घोरौं ।
बालिको बालकु जौं, 'तुलसी' दसहू मुखके रनमें रद तोरौं ॥१४॥
'कोसलराज श्रीरामचन्द्रजीके कार्यके लिये आज मैं त्रिकूट
पर्वतको ( जिसपर लंका बसी हुई है ) उखाड़कर समुद्रमें डुबा दे
सकता हूँ, लङ्का तो क्या, सारे ब्रह्माण्डको अपने दोनों प्रचण्ड
भुजदण्डोंकी चपेटसे दबाकर चटाकसे फोड़ दे सकता हूँ; यदि मैं
आज्ञा-भङ्गसे न डरता तो तुम्हारे सब सभासदोंको मसलकर लोहूमें
सान देता । मैं यदि बालिका बालक हूँ तो रणभूमिमे तुम्हारे दसों
मुँहके दाँतोंको तोड़ डालूँगा ।'
७५ लंकाकाण्ड
अति कोपसों रोप्यो है पाउ सभाँ, सब लंक ससंकित, सोरु मचा।
तमके घननाद-से बीर प्रचारि कै, हारि निसाचर-सैनु पचा ॥
न टरै पगु मेरुहु तें गरु भो, सो मनो महि संग विरंचि रचा।
तुलसी सब सूर सराहत हैं, जगमें बलसालि है बालि-बचा ॥१५॥
तब अङ्गदजीने अत्यन्त क्रुद्ध हो सभामें पाँव रोप दिया।
इससे समस्त लंका सशङ्कित हो गयी, और उसमें सब ओर शोर
मच गया। मेघनाद-जैसे वीर तमक और ललकारकर उठे और
हारकर बैठ गये। सारी राक्षसी सेना भी पच मरी, परन्तु पैर न
टला। वह सुमेरुपर्वतसे भी भारी हो गया, मानो (उसे) ब्रह्माने
पृथ्वीके साथ ही रचा हो। गोसाईंजी कहते हैं—सब वीर प्रशंसा
करने लगे कि संसारमें एकमात्र बलशाली बालिपुत्र अङ्गद ही हैं।
रोप्यो पाउ पैंज कै, बिचारि रघुबीरबलु,
लागे भट समिटि, न नेकु टसकतु हैं।
तज्यो धीरु धरनीं, धरनीधर धसकत,
धराधरु धीर भारु सहि न सकतु हैं ॥
महाबली बालिकें दबत दलकति भूमि,
‘तुलसी’ उछलि सिंधु, मेरु भसकतु हैं।
कमठ कठिन पीठि घट्टा पर्यो मंदरको,
आयो सोई काम, पै करेजो कसकतु हैं ॥१६॥
अङ्गदजीने श्रीरामचन्द्रजीके बलको विचारकर प्रणपूर्वक पैर
रोपा। वीरगण जुटकर उसे उठाने लगे, परन्तु वह टससे मस नहीं
होता। पृथ्वीतकने धैर्य छोड़ दिया (जो धैर्यके लिये प्रसिद्ध है),