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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

कवितावली ७४
तूँ रजनीचरनाथु महा, रघुनाथके सेवकको जनु हौं हौं ।
बलवान है स्वानु गलीं अपनीं, तोहि लाज न गालु बजावत साँहौं ॥
बीस भुजा, दस सीस हरौं, न डरौं प्रभु-आयसु-भंग तें जौं हौं ।
खेतमें केहरि ज्यों गजराज दलौं दल, बालिको बालकु तौ हौं ॥१३॥
तू निशाचरोंका महाराज है और मैं रघुनाथजीके सेवक सुग्रीव-
का सेवक हूँ । अपनी गलीमें तो कुत्ता भी बलवान् होता है ।
तुमको मेरे सामने गाल बजाते लाज नहीं आती । यदि मैं
श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाभङ्गसे न डरता तो तुम्हारा बीसों भुजाओं
और दसों सिरोंको उतार लेता । जैसे सिंह गजराजका दलन करता
है वैसे ही यदि युद्धक्षेत्रमें मैं तुम्हारी सेनाका दलन करूँ तभी तुम
मुझे बालिका बालक जानना ।
कोसलराजके काज हौं आजु त्रिकूट उपारि, लै बारिधि बोरौं ।
महा भुजदंड द्वै अंडकटाह चपेटकीं चोट चटाक दै फोरौं ॥
आयसभंगतें जौं न डरौं, सब भीजि सभासद श्रोनित घोरौं ।
बालिको बालकु जौं, 'तुलसी' दसहू मुखके रनमें रद तोरौं ॥१४॥
'कोसलराज श्रीरामचन्द्रजीके कार्यके लिये आज मैं त्रिकूट
पर्वतको ( जिसपर लंका बसी हुई है ) उखाड़कर समुद्रमें डुबा दे
सकता हूँ, लङ्का तो क्या, सारे ब्रह्माण्डको अपने दोनों प्रचण्ड
भुजदण्डोंकी चपेटसे दबाकर चटाकसे फोड़ दे सकता हूँ; यदि मैं
आज्ञा-भङ्गसे न डरता तो तुम्हारे सब सभासदोंको मसलकर लोहूमें
सान देता । मैं यदि बालिका बालक हूँ तो रणभूमिमे तुम्हारे दसों
मुँहके दाँतोंको तोड़ डालूँगा ।'