कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context२७२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) पथि व्यन्तरे गूढदेशाभिगमने मैथुनार्थेन शङ्कितप्रतिषिद्धाभ्यां वा पथ्यनुसारेण सङ्ग्रहणं विद्यात् ।
(२) तालावचरचारणमत्स्यबन्धकलुब्धकगोपालकशौण्डिकानामन्येषां च प्रसृष्टस्त्रीकाणां पथ्यनुसरणमदोषः । प्रतिषिद्धे वा नयतः पुंसः स्त्रियो वा गच्छन्त्यास्त एवार्धदण्डाः । इति पथ्यनुसरणम् ।
(३) ह्रस्वप्रवासिनां शूद्रवैश्यक्षत्रियब्राह्मणानां भार्याः संवत्सरोत्तरं कालमाकाङ्क्षेरन् अप्रजाताः, संवत्सराधिकं प्रजाताः प्रतिविहिताः द्विगुणं कालम् । अप्रतिविहिताः सुखावस्था बिभृयुः, परं चत्वारि वर्षाण्यष्टौ वा ज्ञातयः । ततो यथादत्तमादाय प्रमुञ्चेयुः ।
(४) ब्राह्मणमधीयानं दशवर्षाण्यप्रजाता, द्वादश प्रजाता । राजपुरुषं आ आयुःक्षयादाकाङ्क्षेत । सवर्णतश्च प्रजाता नापवादं लभेत ।
( १ ) यदि कोई स्त्री मार्ग, जंगल या किसी गुप्त स्थान में अथवा किसी संदिग्ध या वर्जित पुरुष के साथ मैथुन के लिए घर से भाग निकले तो गिरफ्तार कर अपराध के अनुसार दण्ड दिया जाय ।
( २ ) गाने-बजाने वाले नट-नर्तक, भाट, मछियारे, शिकारी, कलवार तथा इसी प्रकार के वे पुरुष जो स्त्रियों को साथ रखते हैं; उनके साथ जाने में स्त्री को कोई दोष नहीं । मना करने पर भी यदि कोई पुरुष किसी स्त्री को साथ ले जाय या स्त्री ही स्वयं किसी पुरुष के साथ चली जाय, तो उन्हें आधा दण्ड दिया जाय । यहाँ तक रास्ते में किसी परपुरुष के साथ स्त्री के जाने ( पथ्यनुसरण ) के सम्बन्ध में विचार किया गया ।
( ३ ) स्त्रियों को पुनर्विवाह का अधिकार : जिन शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मणों की पुत्रहीन स्त्रियों के पति कुछ समय के लिए विदेश गए हों वे एक वर्ष तक, और पुत्रवती स्त्रियाँ इससे अधिक समय तक अपने पतियों के आने की इन्तजारी करें । यदि पति, उनके भरण-पोषण का पूरा इन्तजाम करके गए हों तो इससे दुगुने समय तक पत्नियां उनकी इन्तजारी करें । जिनके भोजन-वस्त्र का प्रबन्ध न हो, उनके बन्धु-बान्धवों को चाहिए, कि चार वर्ष या इससे अधिक आठ वर्ष तक, वे उनका प्रबन्ध करें । इसके बाद पहिले विवाह में दिए गए धन को वापस लेकर वे उस स्त्री को दूसरी शादी करने की छूट दे दें ।
( ४ ) अध्ययन के लिए विदेश गए ब्राह्मणों की पुत्रहीन स्त्रियां दस वर्ष तक और पुत्रवती स्त्रियाँ बारह वर्ष तक, अपने पतियों के आने प्रतीक्षा करें । किसी राजकार्य से बाहर गए पतियों की प्रतीक्षा उनकी स्त्रियाँ आयु-पर्यन्त करें । पति के प्रवासकाल में यदि किसी समानवर्ण पुरुष से किसी स्त्री का बच्चा पैदा हो जाय तो निन्दनीय नहीं है ।